बता दो.. शून्य का विस्फोट हूं!

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-गिरीश बिल्लोरे- दूरूह पथचारी तुम्हारे पांवों के छालों की कीमत तुम्हारी अजेय दुर्ग को भेदने की हिम्मत को नमन! निशीथ-किरणों से भोर तक उजाला देखने की उत्कंठा सटीक निशाने के लिये तनी प्रत्यंचा महासमर में नीचे पथ से ऊंची आसंदी तक की जात्रा में लाखों लाख जयघोष आकाश में हलचल को जन्म देती जड़-चेतन सभी… Read more »