मौन में पलने दो

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तुम मेरे संतृप्त स्नेह की शिल्पकार जैसे  भी  चाहो  तराशो  इसको, नाम दो, आकार दो, ….. पर शब्द  न दो, कि शब्दों  में  छिपे होते हैं भ्रम अनेक, छंटता है इनसे अनिष्ट छलावा, शब्द  छोड़  जाते  हैं   छलनी  मुझको, प्रिय, मैं अब स्नेह से नहीं स्नेहमय शब्दों से डरता हूँ ।   आओ, बैठो पास, और पास मेरे, कहो… Read more »