यशोदानंदन-४४

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माता अपने ही दिये गए आश्वासन के जाल में उलझ गई थी। देर तक श्रीकृष्ण का मुखमंडल एकटक निहारती रहीं। वहां दृढ़ निश्चय के भाव थे। अपनी भावनाओं पर काबू करते हुए माता ने स्वीकृति दे ही दी – “मेरे कन्हैया! मेरे श्यामसुन्दर! मेरे नटखट श्रीकृष्ण! मैं तुम्हें रोक नहीं सकती। जाओ, सत्पुरुषों के मार्ग… Read more »