ये गली

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-रवि श्रीवास्तव- ये गली आख़िर कहां जाती है, हर दो कदम पर मुड़ जाती है। मुझे तलाश है उसकी, जिसे देखा था इस गली में, चल रहा हूं कब ये अरमान लिए दिल में। शायद इत्तेफ़ाक ले मुलाकात हो जाए, हर मोड़ पर सोचता हू मंजिल मिल जाए। सकरे रास्ते और ये दलदल, चीखकर कहते… Read more »