रक्स करतीं थालियां

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 डा. राज सक्सेना पी सुरा को मस्त होकर, मस्त फिरतीं प्यालियां | बैंगनों के घर में गिंरवीं,  रक्स  करतीं थालियां | कौरवों की भीड़, आंखें बन्द कर चलती  मिली, नग्नतम् सड़कों पे खुलकर, चल रहीं पांचालियां | एक अच्छी व्यंग्य कविता,को समझ पाए न लोग, एक हज़ल पर देर तक, बजती रही थीं तालियां |… Read more »