‘गोरा’ उपन्यास में पराधीन भारत की राष्ट्रीय चेतना का स्वरूप

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-कुमार कृष्णन- -गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर की जयंती पर विशेष- रवीन्द्र नाथ ठाकुर का उपन्यास ‘गोरा’, अंग्रेजी शासन में भारत की राष्ट्रीय चेतना का औपन्यासिक महाकाव्य है। यह उस कालखण्ड की रचना है, जब भारतीय समाज अपने जातीय गौरव से विछिन्न होकर या तो अपने कालचक्र के कारण या फिर पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव में आकर… Read more »