सामुदायिक सदभाव का सही आधार

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शंकर शरण दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम मौलाना वस्तानवी के गुजरात सम्बन्धी बयान को दूसरी तरह भी देखा जा सकता है। अब दो राय नहीं रह गई है कि पिछले नौ वर्ष में उस राज्य की सामाजिक-आर्थिक प्रगति स्पृहणीय है, कि हिन्दू-मुस्लिम दोनों उससे संतुष्ट हैं और अपने-अपने काम-धंधे लगे हैं। सामुदायिक सहयोग की यही… Read more »

कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150 जयन्ती पर विशेष- दीन-हीन का सम्मान पद है धर्म

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी हिंदी के बुद्धि‍जीवि‍यों में धर्म ‘इस्‍तेमाल करो और फेंको’ से ज्‍यादा महत्‍व नहीं रखता। अधि‍क से अधि‍क वे इसके साथ उपयोगि‍तावादी संबंध बनाते हैं। धर्म इस्‍तेमाल की चीज नहीं है। धर्म मनुष्‍यत्‍व की आत्‍मा है। मानवता का चरम है। जि‍स तरह मनुष्‍य के अधि‍कार हैं, लेखक के भी अधि‍कार हैं,वैसे ही धर्म के… Read more »

रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150वीं जयन्ती पर विशेष- सभ्यता और जीवन का महाकवि

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी रवीन्‍द्रनाथ की 150वीं जयन्ती के मौके पर उनके वि‍चारों और नजरि‍ए पर वि‍चार करने का मन अचानक हुआ और पाया कि‍ रवीन्‍द्रनाथ के यहां मृत्‍यु का जि‍तना जि‍क्र है उससे ज्‍यादा जीवन का जि‍क्र है। रवीन्‍द्रनाथ ने अपने लेखन से वि‍श्‍व मानव सभ्‍यता को आलोकि‍त कि‍या है, चारों ओर उनका यश इतने दि‍नों… Read more »