अखिलेश को भारी पड़ सकती है नेताजी की नाराजगी

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संजय सक्सेना समाजवादी पार्टी नये दौर से गुजर रही है। संगठन से लेकर सरकार तक का निजाम बदल गया है। शायद ही किसी ने कभी सोचा होगा कि नेताजी मुलायम के बिना समाजवादी पार्टी दो कदम भी आगे चल सकती है। शिवपाल के बिना संगठन चलाना आसान नहीं समझा जाता था,परंतु आज समाजवादी अखिलेंश यादव… Read more »

सत्ता केन्द्रित राजनीति और राष्ट्र हित

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सुरेश हिंदुस्थानी वर्तमान में देश में विधानसभा सीटों के हिसाब से सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव की तैयारियां चल रहीं हैं। इसमें चार प्रमुख राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस चुनाव मैदान में दम दिखाने के लिए उतावली दिखाई दे रहे हैं। सभी राजनीतिक दल कमोवेश सत्ता… Read more »

सबसे बड़ा सवाल कहां हैं मुलायम !

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संजय सक्सेना उत्तर प्रदेश में 17वीं विधान सभा के लिये हो रहे चुनाव कई मायनों में हट के नजर आ रहे हैं। सबसे खास बात यह है कि पिछले 25-30 वर्षो से यूपी की राजनीति जिन मुलायम ंिसंह यादव के बिना अधूरी समझी जाती थी,वह इस बार चुनावी परिदृश्य से पूरी तरह बाहर हो गये… Read more »

बिहार से यूपी तक पिछलग्गू बनती कांगे्रस

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दरअसल, 2009 के बाद से कांग्रेस का ग्राफ लगातार गिर रहा है। कांग्रेस के हाथ से राज्यों की सत्ता छिटक रही है। लिहाजा यूपी में सत्ता में होना कांग्रेस की राजनीतिक मजबूरी माना जा रहा है। कांग्रेस सत्ता में तो आना चाहती है। इसके अलावा एक मकसद बीजेपी को यूपी की सत्ता से दूर रखना भी है। कांगे्रस की दुर्दशा के कारणों पर नजर डाली जाये तो जटिल जातीय समीकरण वाले इस सूबे में कांग्रेस के पास अपना परंपरागत वोट बैंक नही बचा है। ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम अब कांग्रेस के वोटर नहीं रह गये हैं।

सपा का घमासान लोकतंत्र पर प्रहार

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उत्तरप्रदेश में चल रहा समाजवादी पार्टी का घमासान देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर करारा प्रहार कहा जा सकता है। राजनीतिक पार्टियां लोकतांत्रिक व्यवस्था का भले ही दम भरती हों, लेकिन इस प्रणाली का राजनीतिक दलों के नेता कितना पालन करते हैं, यह कई बार देखा जा चुका है। पूरी तरह से एक ही परिवार पर केन्द्रित समाजवादी पार्टी अलोकतांत्रिक रुप से आगे बढ़ती हुई दिखाई देने लगी है। समाजवादी पार्टी की खानदानी लड़ाई के चलते पिछले कई दिनों से समाचार पत्रों व विद्युतीय प्रचार तंत्र की मुख्य खबर बनी हुई है।

सपा के असमंजस में विकल्प की तलाश

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सुरेश हिन्दुस्थानी एक कहावत है कि दुश्मन से तो बचा जा सकता है, लेकिन जब अपने ही दुश्मन हो जाएं तो बचने की उम्मीद किसी भी तरीके से संभव नहीं होती। वर्तमान में समाजवादी पार्टी में कुछ इसी प्रकार के हालात दिखाई दे रहे हैं। जहां अपने ही दुश्मन बनकर आमने सामने आ चुके हैं।… Read more »

आखिरी बाजी!

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शिवशरण त्रिपाठी लखनऊ। अन्यान्न कारणों से समाजवादी पार्टी में अर्से से मची अंर्तकलह अंतत: बाप बेटे के बीच आकर केन्द्रित हो गई है। बीते एक सप्ताह में तेजी से घटे घटना क्रम का अंत क्या होगा उसका परिणाम जल्द ही आ जायेगा। आखिरी राजनीतिक बाजी बाप बेटे में किसके हाथ लगेगी यह तो अभी कह… Read more »

समाजवादी पार्टी में उत्तराधिकार की लड़ाई

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डा. राधेश्याम द्विवेदी मुगल साम्राज्य से प्रेरित पुरानी पीढ़ी बनाम नई पीढ़ीः-उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी में जारी पारिवारिक घमासान भी मुगलों की याद दिलाता है. पार्टी में बाप से बेटे व चाचा भतीजे की बगावत और पार्टी के अंदर एक दूसरे के खिलाफ साजिश और षड्यंत्र से मुगल साम्राज्य की स्मृति ताजी हो… Read more »

समाजवादी पार्टी में भाई-भाई का विरासत संघर्ष

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मार्च सन् 2012 में मुख्यमंत्री बनने पर अखिलेश यादव शुरू में साधना गुप्ता को कतई घास नहीं डालते थे। इससे मुलायम नाराज़ हो गए और अखिलेश को झुकना पड़ा। इस तरह साधना गुप्ता ने मुलायम के ज़रिए मुख्यमंत्री पर शिकंजा कस दिया और अपने चहेते अफ़सरों को मन पसंद पोस्टिंग दिलाने लगीं। ‘द संडे गार्डियन’ ने सितंबर 2012 में साधना गुप्ता की सिफारिश पर मलाईदार पोस्टिंग पाने वाले अधिकारियों की पूरी फेहरिस्त छाप दी, तब साधना गुप्ता पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आईं।

समाजवादी पार्टी अपने इस संकट के लिए अभिशप्त है

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अनुभवी मुलायम सिंह यादव इस बात को समझते हैं कि अगला विधानसभा चुनाव अखिलेश के चेहरे के सहारे ही लड़ा जा सकता है लेकिन उन्हें यह भी पता है कि अकेले यही काफी नहीं होगा. इसके लिए शिवपाल की सांगठनिक पकड़ और अमर सिंह के “नेटवर्क” की जरूरत भी पड़ेगी. इसलिये चुनाव से ठीक पहले मुलायम का पूरा जोर बैलेंस बनाने पर है. लेकिन संकट इससे कहीं बड़ा है और बात चुनाव में हार-जीत के गुणा-भाग से आगे बढ़ चुकी है. अब मामला पार्टी और इसके संभावित वारिसों के आस्तित्व का बन चूका है.