आरती का दम, बेटी नहीं हुनर में कम

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हेमेन्द्र क्षीरसागर एक जमाना था जब बेटियों को घर की चार दीवारियों में कैद रखकर चुल्हा-चक्की तक सीमित रखा जाता था, पढाई-लिखाई तो उनके लिए दूर की कौडी थी। धीरे-धीरे समय ने करवट बदली और बेटियां बेटों के साथ पढने लगी। यहां तक तो सब कुछ ठीक-ठाक चला किन्तुु कौशलता, कारीगिरी तथा तकनीकी दक्षता के… Read more »