चुपचाप सा सुनसान सा !

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चुपचाप सा सुनसान सा ! चुपचाप सा सुनसान सा, मेरा जहान है लग रहा; ना कह कहे चुलबुला-पन, इतना नज़र आ पा रहा ! वाला कहाँ अठखेलियाँ, लाला कहाँ गुलडंडियाँ; उर उछलते पगडंडियाँ, मन विचरते कर डाँडिया ! सोचों बँधे मोचों रुँधे, रहमों करम पर हैं पले; आत्मा खुली पूरी कहाँ, वे समझ पाए रब… Read more »