है नाट्यशाला विश्व यह !

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है नाट्यशाला विश्व यह, अभिनय अनेकों चल रहे; हैं जीव कितने पल रहे, औ मंच कितने सज रहे ! रंग रूप मन कितने विलग, नाटक जुटे खट-पट किए; पट बदलते नट नाचते, रुख़ नियन्ता लख बदलते ! उर भाँपते सुर काँपते, संसार सागर सरकते; निशि दिवस कर्मों में रसे, रचना के रस में हैं लसे… Read more »