दिखावे वाली विकास का गणित

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-आलोक कुमार-   नीतीश खुद को ‘ विकास पुरुष ’ के रूप में चाहे जितना पेश करें लेकिन उन्होंने विकास का कोई नया, ज्यादा समावेशी और टिकाऊ मॉडल नहीं पेश किया है। उनकी विकास नीति किसी भी रूप में केन्द्र की यूपीए सरकार से अलग नहीं है। बिहार में नीतीश कुमार के विकास के दावे ‘आधी… Read more »

बिहार में वर्तमान राजनीति, सिद्धांत और नैतिक चेतना से खाली

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-आलोक कुमार-    हर समय तुष्टीकरण व धर्मनिरपेक्षता का राग अलापने वाले हमारे प्रदेश (बिहार) के मुखिया ने जनता से जैसी दूरी बनाई है ऐसे मुखिया से कभी सुशासन की अपेक्षा की जा सकती है क्या ? बिहार का गिरता राजनैतिक स्तर और चुनावी राजनीति को ध्यान में रखकर की जा रही तुष्टीकरण का परिदृश्य… Read more »

‘आईने में सूरत देखने के बजाए तोड़ने में जुटे नीतीश’

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-आलोक कुमार-    एक अजीबोगरीब हताशा का माहौल है। बिहार के सत्ताधारी दल जनता दल (यूनाइटेड) में, लोकसभा चुनाव नजदीक हैं लेकिन संगठन से जुड़े समर्पित लोगों में कोई उत्साह नहीं दिखता। राज्यसभा चुनाव के लिए संगठन से जुड़े लोगों और कुछ रसूखदार नेताओं को नजरअंदाज कर जब से नीतीश जी ने अपनी ना समझ में… Read more »

सुशासन बाबू का नालन्दा व कल्याणबिगहा प्रेम

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-आलोक कुमार-     एक कुशल और सफ़ल शासक वही होता है जो व्यापक दृष्टिकोण रखता हो। बिहार में आज कहीं सही मायने में विकास हो रहा है तो वो नालन्दा है, उसमें भी विशेषकर कल्याणबिगहा। नालन्दा या कल्याणबिगहा के विकास से मुझे कोई गुरेज नहीं है लेकिन सिर्फ़ और सिर्फ़ नालन्दा और कल्याणबिगहा ही… Read more »

सरकारी बंगलों में “सत्ता- प्रायोजित” गोरखधंधा

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-आलोक कुमार-    बिहार के बहुप्रचारित सुशासन में सरकारी -सरंचनाओं का दुरुपयोग शासन की सहभागिता से धड़ल्ले से जारी है। एक तरफ तो राजधानी पटना में हेरिटेज इमारतों को ढाह कर नयी इमारतें खड़ी की जा रही हैं , जगह-जमीन की कमी का रोना रोया जा रहा है तो दूसरी तरफ सरकारी -बंगलों में “अवैध… Read more »

“नयी बोतल में पुरानी शराब”

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-आलोक कुमार-   आज से लगभग आठ साल पहले बिहार में सिर्फ़ निजाम बदला लेकिन सत्ता का स्वरूप नहीं। आज भी स्थिति वही है जो पूर्व के शासनकाल में थी, हर जिले में दबंग विधायक और सांसदों की अपनी हुकूमत चलती है। जो भी कार्य केंद्र या राज्य सरकार की योजनाओं के तहत हो रहे… Read more »