पूंजीवाद जी का जंजाल… महंगाई-भ्रष्टाचार से दुनिया बदहाल…..

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श्रीराम तिवारी आधुनिकतम उन्नत सूचना एवं प्रौद्द्योगिकी के दौर में विश्व-रंगमंच पर कई क्षणिकाएं-यवनिकाएं बड़ी तेजी से अभिनीत हो रहीं हैं . २१ वीं शताव्दी का प्रथम दशक सावधान कर चुका है कि दुनिया जिस राह पर चल रही है वो धरती और मानव मात्र की जिन्दगी को छोटा करने का उपक्रम मात्र है .जीवन… Read more »

पूंजीवाद से बेहतर है साम्यवाद -रूमानियाई रिफ्रेंडम का सार …

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श्रीराम तिवारी वैश्विक आर्थिक संकट के परिणामस्वरूप जनांदोलनों की दावाग्नि वैसे तो सारी धरती को अंदर से धधका रही है. आधुनिकतम सूचना एवं संचार माध्यमों की भी जन-हितकारी भूमिका अधिकांश मौकों पर द्रष्टव्य रही है. इस आर्थिक संकट की चिंगारी का मूल स्त्रोत पूर्वी यूरोप और सोवियत साम्यवाद के पराभव में सन्निहित है. दुनिया भर… Read more »

कूपमंडूक विचारक हतप्रभ हैं वैश्वीकरण से

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जगदीश्‍वर चतुर्वेदी कूपमंडूक विचारकों को वैश्वीकरण अभी तक समझ में नहीं आया है। वे यह देखने में असफल हैं कि भारत का बुनियादी आर्थिक नक्शा बदल चुका है। कूपमंडूक विचारकों में कठमुल्लापन इस कदर हावी है कि उनकी कूपमंडूकता के समाने विनलादेन भी शर्मिंदा महसूस करता है। भूमंडलीकरण और आर्थिक उदारीकरण को औचक और कूपमंडूक… Read more »

पूंजीवाद की सफलता का रहस्य

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हिन्दुस्तान में ऐसे लोगों की किल्लत नहीं हैं जिन्हें मार्क्सवाद का अंत नजर आता है और पूंजीवाद अमर नजर आता है। पहली बात यह कि पूंजीवाद के अंत के रूप में मार्क्सवाद को देखना ही गलत है। खासकर भूमंडलीकरण,नव्य उदार आर्थिक नीतियों के आगमन के बाद सारी दुनिया में जिस तरह के घटनाक्रम का विकास… Read more »

बुरे को अच्छा बनाने की कारपोरेट कला

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी हमें बार-बार यही बताया जा रहा है कि हम पूंजीवाद का समर्थन करें। हमें सहनशील बनने की सीखें प्रदान की जा रही हैं। हमें कहा जा रहा है कि हम तटस्थ रहें, विवादों, संघर्षों, मांगों के लिए होने वाले सामूहिक संघर्षों से दूर रहें, सामूहिक संघर्ष बुरे होते हैं। आम आदमी को तकलीफ… Read more »

बर्बर पूंजीवाद का मॉडल है रूस-चीन का

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी सोवियत संघ और चीन का समाजवाद से पूंजीवाद में रूपान्तरण हो चुका है। आज रूस और चीन बदल गए हैं। वे वैसे नहीं है जैसे समाजवाद के जमाने में थे। सामाजिक जीवन में पहले की तुलना में असुरक्षा बढ़ी है। पहले राजसत्ता से मानवाधिकारों को खतरा था आज लुंपनों ,कारपोरेट घरानों और पार्टी… Read more »