देश मजहब-प्रेम से ऊपर है

Posted On by & filed under राजनीति

दीदी का मुस्लिम प्रेम ही था कि उन्होंने 30000 मदरसों को 2500 रुपये और 1500 मस्जिदों को 1500 रुपए प्रतिमाह देने का फैसला कर लिया था, जिसकी भविष्य में गंभीरता को देखते हुए माननीय कोलकाता हाईकोर्ट ने उस फैसले को ही खारिज कर दिया था। मां, माटी और मानुष की राजनीति के नारे की उस वक्त भी पोल खुली, जब मालदा हमले के ठीक पहले एक मदरसे के प्रधानाध्यापक काजी मसूम अख्तर पर इसलिए हमला कर दिया गया क्योंकि काजी छात्रों से राष्ट्रीय गान सुनना चाहते थे। यही नहीं सरकार ने कुछ मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा आपत्ति जताने के बाद बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन द्वारा लिखी गई पटकथा वाले नाटक सीरीज के प्रसारण पर भी रोक लगा दी और सलमान रुश्दी को कोलकाता आने पर प्रतिबंध लगा दिया।

आखिर ये दंगे होते ही क्यों है

Posted On by & filed under विविधा

राजीव गुप्ता 1948 के बाद भारत में पहला सांप्रदायिक दंगा 1961 में मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर में हुआ ! उसके बाद से अब तक सांप्रदायिक दंगो की झड़ी सी लग गयी ! बात चाहे 1969 में गुजरात के दंगो की हो , 1984 में सिख विरोधी हिंसा की हो, 1987 में मेरठ के दंगे हो… Read more »

समाज के नशे में घुलता उन्नाद का जहर

Posted On by & filed under लेख

संजय स्वदेश पिछले दिनों राजस्थान में सांप्रदायिक हिंसा की घटना के बाद फिलहाल अभी ऐसा कोई राष्ट्रिय प्रसंग नहीं है कि धर्म की कट्टरता पर बहस हो। लेकिन प्रसंग नहीं होने की बाद भी इस मुद्दे पर चिंतन आवश्यक है। शांत महौल में देश के किसी न किसी हिस्से में हिंसक मजहबी हिलोरे उठती हैं।… Read more »