संस्कृति के हत्यारे

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राजेन्द्र जोशी (विनियोग परिवार) पांच सौ साल पहले यह दुनिया आज की तुलना में सुखी और हिंसा रहित थी। लेकिन 1492 में एक ऐसी घटना घटी जिसने सारे विश्व के प्रवाह को मोड़ दिया। पहले देश-विदेश से वस्तु के आयात-निर्यात का काम जहाजों से होता था। ऐसे जहाजों को यूरोप के लुटेरे लूट लेते थे… Read more »

संस्कृति से सर्वनाश की और……………………..

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आज विश्वभर में खतरे का बिगुल भयंकर नाद कर रहा है उसका सन्देश है की हम सावधान हो जाये तथा संसार की अनित्यता के पीछे जो महान सत्य अंतर्निहित है उसे पहचान ले आज चारो और अशांति असंतोष स्वार्थ और सकिर्नता का भयंकर रूप प्रकट हो गया है मानव की पाशविक प्रवृत्ति को सिनेमा अखबार… Read more »

भाषा और संस्कृति

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जब एक भाषा मरती है तब उसकी संस्कृति भी उसके साथ मर जाती है ’लिविंग टंग्ज़ इंस्टिट्यूट फ़ार एन्डेन्जर्ड लैन्गवेजैज़’ इन सैलम, ओरेगान के भाषा वैज्ञानिक डेविड हैरिसन तथा ग्रैग एन्डरसन कहते हैं कि जब लोग अपने समाज की‌ भाषा में बात करना बन्द कर देते हैं, तब हमें मस्तिष्क के विभिन्न विधियों में कार्य… Read more »

सिर्फ संस्कृति ही नहीं देश के भविष्य का भी संकेतक है बालपन

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-पंकज किसी भी देश का बच्चा उस देश की वास्तविक स्थिति पेश करता है। वह उसके सभ्यता संस्कृति से ही साक्षात्कार नहीं कराता है बल्कि उसके भविष्य का भी स्पष्ट संकेत देता है। इस स्थापना के आलोक में देखें तो हमारे नौनिहाल जिस हाल में हैं उसे देख कर खासी निराशा होती है। लेकिन यह… Read more »

संस्कृति उद्योग नीति के अभाव में गुलामी का रास्ता

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी भारत में मौजूदा हालात काफी चिन्ताजनक हैं। हमारे यहां विकासमूलक मीडिया के बारे में तकरीबन चर्चाएं ही बंद हो गई हैं। समूचे मीडिया परिदृश्य देशी इजारेदार मीडिया कंपनियों , बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनियों और विज्ञापन कंपनियों ने वर्चस्व स्थापित कर लिया है। विभिन्न मीडिया मालों की बिक्री के माध्यम से ये कंपनियां दस हजार… Read more »

कृष्ण को कैद से निकालना होगा

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डा. सुभाष राय हम अपने नायकों की शक्ति और क्षमता को पहचान नहीं पाते इसीलिए उनकी बातें भी नहीं समझ पाते। हम उनकी मानवीय छवि को विस्मृत कर उन्हें मानवेतर बना देते हैं, कभी-कभी अतिमानव का रूप दे देते हैं और उनकी पूजा करने लगते हैं। इसी के साथ उनके संदेशों को समझ पाने, उन्हें… Read more »

भारतीय संस्कृति में राष्ट्रधर्म और विधान का राज्य

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-वी. के. सिंह भारतीय संस्कृति में सामाजिक व्यवस्था का संचालन सरकारी कानून से नहीं बल्कि प्रचलित नियमों जिसे ‘धर्म’ के नाम से जाना जाता था, के द्वारा होता था। धर्म ही वह आधार था जो समाज को संयुक्त एवं एक करता था तथा विभिन्न वर्गों में सामंजस्य एवं एकता के लिए कर्तव्‍य-संहिता का निर्धारण करता… Read more »

पेटू की संस्कृति है मासकल्चर

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी लोक संस्कृति और लोक कलाओं का उत्तर-आधुनिक अवस्था में स्वरुप बुनियादी तौर पर बदल जाता है। इन कला रुपों में दैनन्दिन जीवन की गहरी छाप होती है। उत्तर-आधुनिक स्थिति इनका औद्योगिकीकरण कर देती है। उन्हें संस्कृति उद्योग का माल बना देती है। मानकीकरण करती है। उनमें व्याप्त स्थानीयता का एथनिक संस्कृति के नाम… Read more »

संस्कृति में रीतिवाद के खतरे

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जैसे विज्ञापन में रीतिवाद का महत्व होता है, प्रचार मूल्य होता है। विनिमय मूल्य होता है। उसी तरह लेखक संगठनों के द्वारा आयोजित कार्यक्रम भी होते हैं। उनका विज्ञापनमूल्य से अधिक मूल्य आंकना बेवकूफी है। जिस तरह मध्यकाल में आए बदलावों से संस्कृत के लेखक अनभिज्ञ थे उसी तरह आधुनिकाल में आए बदलावों को लेकर… Read more »