लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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turkeyतुर्की में तख्ता-पलट की कोशिश नाकाम हो गई, यह खुशखबर है लेकिन इससे भी बड़ी खबर यह है कि तुर्की की आम जनता ने बागी फौजियों को ठिकाने लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसीलिए 160 लोग मारे गए और 1500 घायल हो गए। फौजी-तख्ता पलट जब भी होते हैं, जनता का उनसे कुछ लेना-देना नहीं होता है। या तो कुछ नेता मारे जाते हैं या कुछ फौजी मारे जाते हैं। इस्तांबूल और अंकारा में लोग मारे गए, यह इसलिए हुआ कि फौजी तख्ता-पलट के विरुद्ध हजारों आम लोग सड़क पर उतर आए थे।

तुर्की की बहादुर जनता को सलाम! यदि किसी भी देश के फौजियों को इसका जरा-सा भी सुराग हो कि जनता उनके खिलाफ सड़क पर उतर आएगी तो वे तख्ता-पलट करने के पहले सौ बार सोचेंगे। तुर्की की जनता ने जो किया, क्या पाकिस्तान की जनता ऐसा कर सकती है?

यह तख्ता-पलट तुर्की के राष्ट्रपति तय्यब इरदोगन के विरुद्ध किया गया था। वे 2003 से सत्तारुढ़ हैं। वे पहले प्रधानमंत्री थे और 2014 में वे सीधे चुनाव लड़कर राष्ट्रपति बने थे। तुर्की की फौज बिल्कुल धर्मनिरपेक्ष है। वह कमाल अतातुर्क की अनुयायी है। इरदोगन की न्याय और विकास पार्टी जरा इस्लामपरस्त तो है ही, साथ-साथ जब से वे राष्ट्रपति बने हैं, उन्होंने फौज और न्यायपालिका की खिंचाई भी शुरु कर दी है।

वे संविधान में संशोधन करके अपने अधिकार लगभग निरंकुश करना चाहते हैं। उन्होंने अपने लिए करोड़ों डॉलर खर्च करके ऐसा राष्ट्रपति भवन बनवाया है कि लोग उन्हें ‘सुल्तान इरदोगन’ कहने लगे हैं। सारी फौज नहीं, बल्कि उसके कुछ अफसरों ने इस ‘तानाशाह’ को हटाने के लिए यह कोशिश की थी। फौज 1960 से अब तक चार बार तख्ता-पलट कर चुकी है लेकिन इस बार कुछ प्रमुख अफसर पकड़ लिए गए हैं और कुछ भागकर यूनान में छिप गए हैं।

इरदोगन ने इस तख्ता-पलट के लिए अमेरिका में रहनेवाले एक तुर्क-धर्म प्रचारक फतेहउल्लाह गुलेन को जिम्मेदार ठहराया है। गुलेन ने पूरी तरह से अपना पल्ला झाड़ लिया है। यदि तुर्की सरकार ने पूरे प्रमाण जुटा दिए तो गुलेन को अमेरिका छोड़ना पड़ेगा। इस समय तुर्की फौज इरदोगन के साथ है। अब इरदोगन पहले से ज्यादा मजबूत हो गए हैं। वे पहले सीरिया में इस्लामी राज्य ‘दाएश’ का समर्थन कर रहे थे लेकिन अब वे अन्य नाटो देशों की तरह उसका विरोध कर रहे हैं। इरदोगन से उम्मीद की जाती है कि इस फौजी हमले से उबरने के बाद वे सिर्फ तुर्की को ही नहीं, सारे इस्लामी जगत को सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा देंगे।

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