लेखक परिचय

अरविंद जयतिलक

अरविंद जयतिलक

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं।

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अरविंद जयतिलक

(लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं। प्रवक्‍ता डॉट कॉम पर आपका स्‍वागत है। – संजीव)

14 वर्षीय छात्रा मलाला युसुफजई को निशाना बना पाकिस्तानी दहशतगर्दों ने अपनी बुजदिली का सबूत दे दिया है। यह हमला प्रमाणित करता है कि वे हद दर्जे के नीच, डरपोक और कायर हैं। मलाला को मिटाने की उनकी कोशिश रेखांकित करती है कि उससे वे बेहद खौफजदा हैं और उसकी जान लेने पर आमादा हैं। सवाल उठना लाजिमी है कि मलाला से पाकिस्तानी कट्टरपंथियों के मन में इतनी दहशत क्यों है? आखिर वे क्यों मलाला की जिंदगी को मिटाना चाह रहे हैं? मलाला का कसूर क्या है? इन सवालों का जवाब मलाला ने खुद दुनिया के सामने रख दिया है।

स्वात घाटी की रहने वाली मलाला तालिबानी दहशतगर्दों के खिलाफ पाकिस्तान में इंकलाब का प्रतीक बन चुकी है। वह लगातार अपनी कलम और जुबान से दहशतगर्दों के मंसूबों पर वार कर रही है। अवाम को जगा रही है। एक सामर्थ्‍यवान और अमनपसंद पाकिस्तान के निर्माण की वकालत कर रही है। ऐसे में दहशतगर्दों और कट्टरपंथियों का भड़कना स्वाभाविक है। मलाला 2009 में दुनिया के पटल पर तब उभरी जब पाकिस्तान की स्वात घाटी में तालिबानियों ने पाकिस्तानी शासन को धत्ता बता अपनी हुकुमत स्थापित कर ली। बंदूकों के दम पर अपनी विध्वंसक गतिविधियों को अंजाम देने लगे। लोगों को विध्वंसक शरीयत पर चलने को मजबूर किए। यही नहीं वे स्कूल-कालेज, मनोरंजन स्थलों सभी को तबाह कर दिए। लड़कियों की तालीम पर रोक लगा दी। तब मलाला युसुफजई ने ‘गुल मकाई’ के छद्म नाम से बीबीसी उर्दू के लिए ब्लॉगिंग में अपनी पीड़ा और नाराजगी जाहिर की। साथ ही लड़कियों को कट्टरपंथियों के खतरे के बावजूद तालीम जारी रखने की भावनात्मक अपील की। मलाला की डायरी स्वात घाटी में तालिबानियों के जुल्म-ज्यादती की किस्सों से अटी-पड़ी है। तालिबानियों की क्रुरता दुनिया के सामने आने के बाद उनका भड़कना स्वाभाविक था। वे मलाला की जान के पीछे पड़ गए। लेकिन मलाला भी उनके आगे झुकने को तैयार नहीं दिखी। वह अपने कड़े तेवर और फौलादी इरादों से तालिबानियों के खिलाफ आग उगलती रही। मलाला की हिम्मत को सलाम करते हुए 2011 में पाकिस्तान की सरकार ने उसे बच्चों के लिए अंतरराष्‍ट्रीय शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया। आज मलाला पाकिस्तान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों की प्रतीक बन चुकी है। लेकिन आज उसका जीवन संकट में है। वह मौत से लड़ रही है। दुनिया उसकी सलामती की दुआ मांग रही है। अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा से लेकर संयुक्त राष्‍ट्र संघ के महासचिव बान की मून सभी कट्टरपंथियों की निंदा के साथ मलाला की साहस की मुक्तकंठ से प्रशंसा कर रहे हैं। पाकिस्तान की सियासी नमूदार भी मलाला के साथ खड़े होने का दंभ भर रहे हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान में लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महफूज हैं? क्या पाकिस्तानी सरकार लोकतंत्रवादियों की जीवन की सुरक्षा की गारंटी दे सकती है? यह सवाल इसलिए कि पाकिस्तान में जिसने भी लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक हितों की वकालत की कट्टरपंथी ने उसे मौंत की नींद सुला दिया। पाकिस्तानी सरकार कट्टरपंथियों का बाल-बांका तक नहीं कर पायी। याद होगा कट्टरपंथियों ने सत्ताधारी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज भट्टी को दिनदहाड़े गोलियों से भून दिया था। उनका कसूर सिर्फ इतना था कि वे ईश-निंदा कानून के दुरुपयोग और बेवजह अल्पसंख्यकों की प्रताड़ना की मुखालफत कर रहे थे। समझा जा सकता है कि जब पाकिस्तान में सरकार के मंत्री तक सुरक्षित नहीं हैं तो मलाला जैसी छात्रा कट्टरपंथियों के निषाने पर आने से कैसे बच सकती है। अचरज लगता है कि कट्टरपंथी जमात एक अरसे से अपनी बंदूक का मुंह मलाला की ओर ताने हुए है लेकिन पाकिस्तान सरकार उसकी सुरक्षा को लेकर तब तक गंभीर नहीं दिखी जब तक कि वह कट्टरपंथियों के निशाने पर नहीं आ गयी। अभी पिछले साल मार्च में तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान के प्रवक्ता एहसानुल्ला एहसान ने कहा था कि युसुफजई और सामाजिक कार्यकर्ता शाद बेगम उनकी हिट लिस्ट में हैं। उनपर हमले किए जा सकते हैं। दहशतगर्दों ने मलाला पर हमला कर अपनी धमकी को साबित भी कर दिया। क्या पाकिस्तान सरकार को दहशतगर्दों की चेतावनी को ध्यान में रखते हुए मलाला की सुरक्षा का पुख्ता बंदोबस्त नहीं करना चाहिए था? अब पाकिस्तान के हुक्मरान अगर मलाला की हिम्मत का एहतराम कर उसे लोकतांत्रिक मूल्यों से नवाज रहे हैं तो इस तरह की जुगाली का क्या मतलब है? क्या इससे कट्टरपंथियों की सोच में बदलाव आ जाएगा? या वे अपनी बंदुकों के मुंह को जमीन की ओर कर लेंगे? यकीनन नहीं। सच तो यह है कि पाकिस्तान में कट्टरपंथी मजबूत हो रहे हैं और सरकार उनके आगे लाचार है। याद होगा ईश-निंदा कानून के खिलाफ आवाज उठाने के कारण पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर को अपनी जान गंवानी पड़ी। इस हत्या के बाद पाकिस्तान की सरकार ने भरोसा दिया था कि वह कट्टरपंथियों का डटकर मुकाबला करेगी। लेकिन सच यह है कि कट्टरपंथी आज पहले से भी ज्यादा ताकतवर हो गए हैं। अभी पिछले दिनों एक अमेरिकी फिल्म को लेकर जिस तरह पाकिस्तान में अराजकता का वातावरण बना उससे कट्टरपंथियों की ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है।

आज पाकिस्तान में सरकार नाम की कोई चीज नहीं रह गयी है। कट्टरपंथी खुलेआम शासन-सत्ता को प्रभावित कर रहे हैं। और करें भी क्यों न! जब सरकार, सेना और खुफिया एजेंसी आइएसआइ सभी का उन्हें खुला समर्थन हासिल है तो वे लोकतंत्र और मानवीय मूल्यों का दमन तो करेंगे ही। मलाला जैसी बहादुर बच्चियां उनके निशाने पर आएंगी ही। अब यह साबित हो चुका है कि पाकिस्तान की सरकार कट्टरपंथी संगठनों को न केवल राजनीतिक संरक्षण दे रही है बल्कि उनको जमकर आर्थिक मदद भी पहुंचा रही है। स्वंय अमेरिका द्वारा कहा जा चुका है कि पाकिस्तान मदद के नाम पर मिल रहे पैसे को भारत के खिलाफ आतंकवाद में खर्च कर रहा है। दुनिया के सभी लोकतांत्रिक देश एक अरसे से पाकिस्तान को आगाह कर रहे हैं कि वह अपनी धरती पर आतंवाद को न फलने-फूलने दे। आतंकी प्रशिक्षण केंद्रों को नष्‍ट करे। लेकिन पाकिस्तान उन सुझावों पर गौर फरमाने को तैयार नहीं है। वह खुलेआम कट्टरपंथियों को संरक्षण दे रहा है और जरुरत पड़ने पर उनका बचाव भी कर रहा है। आज उसी का कुपरिणाम है कि वह अपनी ही लगायी आग में झुलस रहा है और दुनिया की नजरों से गिर गया है। पाकिस्तान में कट्टरपंथियों की बढ़ती ताकत न केवल पाकिस्तान के अस्तित्व के लिए चुनौती है बल्कि विश्‍व बिरादरी के लिए भी एक खतरनाक संकट है। पाकिस्तान को चाहिए कि वह अपने यहां इस्लामिक कट्टरवाद की उग्र होती विचारधारा पर लगाम लगाए। अल्पसंख्यकों को सुरक्षा दे। यह उसके भी हक में होगा और दुनिया के भी। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि वह इसके लिए तैयार नहीं है। कट्टर इस्लामिक विचारधारा के प्रसार के कारण पाकिस्तान का जनजीवन विशेषकर अल्पसंख्यक समुदाय का कठिनाई में पड़ गया है। पिछले काफी दिनों से देखा जा रहा है कि पाकिस्तान के अल्पसंख्यक हिंदू वहां से पलायित हो भारत आ रहे हैं। पाकिस्तान सरकार इस समस्या की गंभीरता को समझने के बजाए उल्टे भारत को ही कठघरे में खड़ा कर रही है। यह उचित नहीं है। पाकिस्तान को अपना रवैया बदलना होगा। उसे मलाला जैसी बहादुर बच्चियों से सबक लेना चाहिए कि वह किस तरह निहत्थे दहशतगर्दों से लड़ रही हैं। पाकिस्तान के युवाओं को भी मलाला से सबक लेनी चाहिए। उन्हें कट्टरपंथी ताकतों के बहकावे में न आकर अपने विवेक से काम लेना चाहिए। पाकिस्तान में बढ़ रही कट्टरता ही वहां की सबसे बड़ी समस्या है। जब तक पाकिस्तान इन प्रवृत्तियों पर अंकुश नहीं लगाएगा तब तक वहां शांति बहाल होने वाली नहीं है। वहां लोकतंत्र तब तक फलने-फूलने वाला नहीं जब तक कि वहां की सरकार, सेना और खुफिया एजेंसी आइएसआइ आतंकियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं करेगी। पाकिस्तान अपनी सोच में बुनियादी बदलाव लाकर ही एक सार्थक व जीवंत राष्‍ट्र बन सकता है। इसके लिए उसे अपने पड़ोसी देशों विशेष रूप से भारत से संबंध सुधारने होंगे। आतंकवाद को प्रश्रय बंद करना होगा। आज अगर मलाला की स्थिति नाजुक है तो पाकिस्तान की भी स्थिति कम नाजुक नहीं है। मलाला की सोच ही पाकिस्तान का भविष्‍य है और उसे देर-सबेर इसे समझना ही होगा।

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