लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

Posted On by &filed under कला-संस्कृति, विविधा.


tameshwarnath shiv mandirमहाशिवरात्रि के अवसर पर

डा. राधेश्याम द्विवेदी
उत्तर प्रदेश के संतकबीरनगर जिले के जिला मुख्यालय से 8 किमी. दक्षिण घनघटा मुखलिसपुर मार्ग पर भगवान शिव को समर्पित तामा नामक गांव पंचायत स्थित है। जहां के मानचित्र में यह पौराणिक मदिर 260 24‘ उत्तरी अक्षांश तथा 830 7‘ पूर्वी देशान्तर पर दर्शाया गया है। पहले यह स्थान कोशल, कपिलवस्तु, अवध , गोरखपुर सरकार के अधीन रहा था। बाद में बस्ती और अब संतकबीर नगर का यह हिस्सा है। रामग्राम जिसे इसी जिले के वर्तमान रामपुर देवरिया के रूप में माना जाता है, की दूरी 11 मील या 17 किमी. है। गोरखपुर से यहां की दूरी लगभग 44 किमी. है।
यह स्थान 29 वर्षीय भगवान बुद्ध के गृहत्याग से सम्बन्धित मौनेइया (वर्तमान महेनिया गांव) स्थल का भी पहचान कराता है। यहां पर उन्होंने अपना राजसी वस़्त्र त्यागकर अपने सारथि को उपदेश देकर वापस लौटाया था। यहीं पर उन्होंने अपने बाल कटवाये थे। इस मंदिर को भी कुछ विद्वान बौद्ध स्तूप व मठ के रूप में भी मानते हैं।
यहां पहले जंगल और तालाब ही हुआ करता था। इसके अलावा यहां और कुछ भी नहीं था। यहां एक बड़ा टीला उत्तर से दक्षिण लगभग डेढ़ मील लम्बा तथा पूर्व से पश्चिम आधा मील चैड़ा हुआ करता था। इसे तमेसर डीह कहा जाता है। यहां मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनवाया गया स्तूप का होना भी बताया जाता है। कार्लाइल इसे शंक्वाकार नक्कासी वाले ईंटों से निर्मित देखा था। इसके अवशेष आस पास के क्षेत्र में देखे गये थे।
यह स्थान भगवान बुद्ध के साथ साथ भगवान शिव से भी सम्बन्धित है। यहां भगवान शिव जी स्वयं प्रकट होकर एक चरवाहे को दर्शन दिये थे। उसने गांव में जाकर और लोगों को यह वृतान्त बताया था। एक चबूतरे पर शिवजी को प्रतिष्ठित किया गया था। मंदिर की मूर्तियां खुले कुर्सियों से घेरा गया था। बादमें यहां बांसी के राजा ने भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। उन्होने यहां एक विशाल कुंवा, तथा पत्थर की सीढियों वाला तालाब भी खोज निकलवाया था जिसे तमेसर ताल कहा जाता है। इस ताल को भी बुद्ध भगवान के समय से ही अवस्थित होना बताया जाता है। बांसी के राजा ने यहां श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए आम का बाग भी लगवाया था। यह तालाब आम के अलावा जामुन, बेर, महुआ, पीपल आदि वृक्षों से भी घिरा है। यहां उत्तर पश्चिम किनारे पर एक नहर या नाला भी बहता है जो तालाव के विल्कुल पास से गुजरते हुए आगे चलकर कुदवा नदी में मिल जाता है।
इसका नाम अंधेरों के स्वामी के रूप में तमेश्वर नाथ के नाम से जाना जाने लगा। यहां टीला, स्तूप, विहार, विशाल तालाब, प्राचीन कुंवा की एक श्रृंखला भी देखी गयी है। यहां हफ्तों तक मेला चलता है। इस शिव जी के मंदिर को चरवाहों द्वारा प्रथम बार खोजा गया था। जब सन् 1801 में गोरखपुर जिले से बस्ती तहसील में इसे लिया गया था, तब जंगलों को काटकर यहां की साफ सफाई की गयी थी। यह प्राचीन धरोहर जो बीच के समय में लुप्त हो गया था, उसी समय प्रकाश में आया है। 1865 में बस्ती जिला बनने पर यह खलीलाबाद तहसील में तथा वर्तमान समय में संतकबीर नगर जिले के क्षेत्र में समाहित हो गया है।
यहां प्रायः हर सोमवार को श्रद्धालुओं की भीड़ लगती है। महा शिवरात्रि के दिन तो दूर दूर के तथा बस्ती व गोरखपुर मण्डल के बड़ी संख्या मे श्रद्धालु पूजन,अर्चन तथा दर्शन के लिए आते हैं। अधिमास महीने में पूरे मास यहां विशेष पूुजन तथा अर्चन होता हैं। यहां आने वाले की मनोकामना प्रायः पूरी होती देखी गयी है और हर कोई एक से अधिक बार यहां अवश्य आने का प्रयास करता है। यहां शिवरात्रि का मेला हफ्तो से अधिक चलता है। श्रद्धालु भंडारा , कथा, गरीब दुखियों के लिए दान पुण्य का लाभ अर्जित करते हैं।
यहां स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ ही साथ प्राचीन राजागण, चीनी तीर्थया़त्री, स्वदेशी राजागण, अंग्रेज अधिकारीगण, तथा देश विदेश के श्रद्धालु जनों द्वारा निरन्तर आगमन, स्नान तथा पूजन किया जाता रहा है। गोरखपुर सरकार के अधीन उनौला गांव के गोस्वामियों को यह गांव ग्रांट में मिला हुआ था, जो ही इसे व्यवस्थित करते चले आ रहे हैं। ब्रिटिस काल से इस गांव का राजस्व मांफ किया गया है। इस माफी का प्रायः नवीनीकरण होता रहता है।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के श्रीकान्त भट्ट को 1969 में यहां सर्वेक्षण के दौरान ताम्र मुद्रायें, लाल पात्र के ठीकरे प्राप्त हुए थे। डा. ए. के. नारायण एव डा. पी सी. पंत ने 1962-63 में मंदिर की अवस्थिति की पुष्टि कीे है। 1993-94 में इस स्थान का सर्वेक्षण उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व संगठन के निदेशक डा. राकेश तिवारी ने किया था, जिन्होंने यहां लाल पात्र परम्पराओं के विस्तार की पुष्टि की है।
इस समूह के अन्य गांव जुक्का, कुसपौल, भीटा, चान्दभारी , देवरिया गजपुर, कुण्डौल, मानेसर, पठाना एवं सिरसारा आदि हैं। प्रायः इन सभी स्थानों पर स्तूप विहार आ अन्य किसी पुरातन अवशेष के मिलने का अनुमान एवं प्रमाण देखा गया है।

 

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz