लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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‘’भाभी मैने दाल सब्ज़ी बना दी है, खाना कितनी देर मे खांयेगी आप ?’’ लता ने अनिता से पूछा।

‘’बस, एक घन्टे मे, कुछ ज़रूरी काम निपटा लूँ, तब तक तू पढाई करले।‘’ अनिता ने जवाब दिया ।

‘’अच्छा भाभी जब खांयेगी तभी गरम गरम रोटी सेक दूँगी।‘’ लता बोली।

‘’अभी तू इंगलिश का काम कर ले, कल मै देख लूँगी, मेरी छट्टी है’’ अनिता ने कहा।

‘’ठीक है भाभी’’ कहकर लता पढ़ाई करने बैठ गई।

डा. अनिता और उनकी बेटी पायल ही एक दूसरे की ज़िन्दगी हैं बस, ये दोनो ही इतने बड़े घर मे रहती हैं। डा. अनिता के पति कई वर्ष पहले एक सड़क दुर्घटना मे चल बसे थे। पायल अभी दसवीं कक्षा मे है। डा. अनिता भी बहुत व्यस्त रहती हैं, उन्हे खाना बनाने के लियें एक नौकरानी की ज़रूरत थी। आस पड़ौस के जान पहचान वाले लोगों से उन्होंने कह रक्खा था कि अगर कोई अच्छी खाना बनाने वाली मिल जाये तो वह रखना चाहती हैं। एक दिन लता की माँ अपनी बेटी को लेकर आई और कहने लगी, इसे खाना बनाना आता है जैसा आप कहेंगी वैसा ही बना कर खिलायेगी, आप इसे रख लीजिये। डा. अनिता को लगा कि ये 15-16 साल की लड़की क्या काम कर पायेगी और अभी तो इसकी पढने, स्कूल जाने की उम्र है। लता की मा ने कहा कि वो सब संभाल लेगी, स्कूल भी नहीं छोड़ेगी। डा. अनिता को लगा कि वह काफी ज़रूरतमन्द है अगर उन्होंने काम नहीं दिया तो कहीं और काम करेगी, इसलियें उन्होने लता को रख लिया।

लता की माँ ने बताया कि वह पढने मे बहुत अच्छी है बस इंगलिश मे कमज़ोर है, उसने डा. अनिता से आग्रह किया कि कभी कभी समय निकाल कर उसे इंगलिश पढ़ा दिया करें। अब तय ये हुआ कि लता रात का खाना बनायेगी और अगलें दिन के लंच के लियें सब्जी बनाकर रख देगी, स्कूल से सीधी डा. अनिता के घर आकर रोटी बनाकर खा खिला कर अपने घर जाया करेगी।

सबकी दिनचर्या निर्धारित तरीके से चलती रही। डा.अनिता और पायल के खाने की रुचियाँ लता जल्दी ही समझ गई थी, उनकी पसन्द समझने मे उसे देर नहीं लगी। 15-16 साल की बच्ची रसोई ऐसे संभालती थी जैसे कोई गृहणी 10-15 साल के अनुभव के बाद संभाल पाती है। रसोई का सारा सामान व्यवस्थित रहता और सफ़ाई भी रहती। यह देखकर डा. अनिता बहुत ख़ुश थीं।

जब भी समय मिलता वो उसे इंगलिश पढ़ा देती। पायल उसे इंगलिश बोलने का अभ्यास करवा देती थी। कभी लता की कोई परीक्षा होने वाली होती तो डा़. अनिता कहतीं ‘’तू पढले खाना मै बना लूँगी’’ या कहतीं ‘’चल आज खिचड़ी बनाले’’। कभी परीक्षा के दिनों मे खाना बाहर से मंगवा लेतीं। डा.अनिता पूरा ध्यान रखतीं कि काम की वजह से लता की पढ़ाई मे कोई व्यवधान न पड़े। लता भी समय का पूरा सदुपयोग करती खाना बनाते बनाते भी वो कोई फार्मूला याद करती रहती या कोई परिभाषा दोहराती रहती।

डा. अनिता ने हमेशा इस बात का ध्यान रक्खा कि पायल और लता के बीच कोई तनाव न हो। वो लता का ध्यान रखती थीं इसलियें पायल मे असुरक्षा की भावना आ सकती थी, दूसरी ओर लता के स्वभिमान के आहत होने का डर था। डा.अनिता की दुनियाँ पायल थी उसमे लता के प्रवेश होने से पायल को कोई अंतर नहीं पड़ा पायल के लियें वह नौकरानी ही थी जिससे वह इज़्जत से बात करती थी, हम उम्र होने के साथ दोनों दसवीं मे थी इसलियें पढ़ाई के बारे मे बात कर लेती थीं। पायल लता से हमेशा इंगलिश मे बात करती थी लता को समझने मे कोई दिक़्कत नहीं थी , बोलने मे घबराती थी। धीरे धीरे पायल की कोशिशों से लता इंगलिश बोलना सीख रही थी। पायल उसके उच्चारण दोष ठीक करवा रही थी। गणित मे लता सबको पीछे छोड़ने की क्षमता रखती थी, अगर वह गणित मे कंहीं अटक जाती तो लता से पूछने मे उसे कोई संकोच न होता ।

डा. अनिता पायल का तो ध्यान बहुत रखती हीं थी लता की ज़रूरतों को भी नज़रअंदाज़ नहीं करती थीं। शाम के समय लता से कहती ‘’चल पढ़ाई से थोड़ ब्रेक ले मुझे चाय बनाकर दे, तू पायल को भी दूध दे और ख़ुद भी पीले।‘’ लता कभी कहती ‘’भाभी मै चाय पी लूँगी।‘’- ‘’चाय नहीं मिलेगी दूध पी अभी पढना भी है, और काम भी करना है इसलियें दूध तो तुझे पीना पड़ेगा।‘’ कभी दोनो को फल काट कर उनकी पढ़ाई की मेज़ पर रख देतीं। पायल अपने कमरे मे पढ़ती और लता की पढ़ाई के लियें मेज़ कुर्सी बरामदे मे लगा दी गई थी।

समय बीतते देर नहीं लगती दोनो की दसवीं की परीक्षा का परिणाम आने का दिन भी आगया। लता को 89% अंक मिले और पायल को 91% । लता को गणित मे पूर 100% अंक मिले सब बहुत ख़ुश थे। डा. अनिता ने लता को 1000 रुपये इनाम मे दिये तो कुछ संकोच के साथ उसने ले लिये। डा. अनिता और पायल एक हफ्ते के लिंये छुट्टी मनाने केरला चले गये। डा. अनिता जानती थीं कि पायल भी डाक्टर ही बनना चाहती है इसलियें उन्होने कक्षा 11 मे आते ही उसे मैडिकल की प्रवेश परीक्षा के लियें सबसे अच्छी कोचिंग मे प्रवेश दिला दिया।

डा. अनिता ने लता से भी पूछा कि वो कक्षा 11 मे कौन से विषय लेना चाहती है, आगे क्या बनना चाहती है। लता ने कहा कि वो विज्ञान लेगी और परिस्थितियों ने साथ दिया तो वह इंजीनियर बनना चाहेगी। कोचिंग की फ़ीस देना लता के लियें संभव नहीं था, डा. अनिता से वह यों ही कोई मदद लेगी नहीं, ये वो भी जानती थीं, उसके स्वाभिमान को भी वो आहत नहीं करना चाहतीं थी। अब यह निश्चय किया गया कि गणित तो वह ख़ुद कर लेगी। रसायन विज्ञान और भौतिकी मे डा.अनिता मदद कर दिया करेंगी। कमप्यूटर का प्रयोग करना पायल उसे सिखा देगी। अपनी दूसरी सहेलियों से वो कोचिंग के नोट्स ले लिया करेगी।

दो साल पलक झपकते बीत गये बोर्ड की परीक्षा हो चुकी थीं। अब दाख़िले के लियें कई परीक्षायें दोनों को देनी थीं। पढ़ाई मे इतनी महनत करने के बावजूद लता रसोई का काम लगभग पूरा संभाले हुए थी। केवल बोर्ड की परीक्षा के समय डा. अनिता ने छुट्टी ली थी। उस समय भी जब थोड़ा बहुत समय मिलता तो वो रसोई के काम मे हाथ बटा देती। जब से वो डा. अनिता के घर काम पर लगी थी उसका पूरा दिन उन्हीं के घर पर बीतता,बस रात को सोने अपने घर जाती थी।

पायल को अपने शहर मे दाख़िला नहीं मिला ऐम. बी. बी.ऐस.करने उसे नागपुर जाना पड़ा। सब बहुत ख़ुश थे। डा. अनिता ने सोचा कुछ दिन सूनापन लगेगा फिर आदत पड जायेगी। डा. अनिता पायल को भेजने की तैयारी मे लग गईं उसके लियें नये कपड़े, नया मोबाइल, नया लैपटाप ख़रीद लाईं, पहली बार उसके साथ गईं और नागपुर छोड़ आईं।

अब लता डा. अनिता और भी ध्यान रखने लगी। लता शहर से बाहर नहीं जाना चाहती थी। उसका दाख़िला स्थानीय इंजीनियरिंग कौलिज मे हो गया पर वहाँ फीस बहुत थी। डा.अनिता ने ख़ुद गारंटी लेकर बैंक से शिक्षा के लियें कर्ज़ दिलवाया । पायल के पुराने कपड़े लता ने हमेशा पहने थे, कुछ नये लेकर दे दिये। पायल का मोबाइल और लैपटाप भी उसे मिल गया।अब लता को अपना लक्ष्य सामने दिखने लगा था।

पायल के जाने से घर मे सूनापन आगया था।लता अब रात को भी घर नहीं जाती थी,डा. अनिता ने उसके रहने का प्रबन्ध बरामदे के साथ बने एक छोटे कमरे मे कर दिया था। अब वह सप्ताह मे एक बार ही अपने घर जा पाती थी। अपने बचाये पैसों मे से उसने एक साइकिल ख़रीद ली थी। बहुत समय कौलिज और पढाई मे निकल जाता था फिर भी खाना वह नियत समय पर बना ही देती थी।आते जाते बाज़ार से घर का ज़रूरी सामान भी वही लाने लगी थी। तीव्र बुद्धि तो वह थी ही महनती भी बहुत थी, किस्मत ने उसे डा. अनिता जैसी संरक्षक भी दे दी तो वह अपने लक्ष्य की ओर बिना किसी रुकावट के बढ़ रही थी। कौलिज से आने का कोई निश्चित समय तो था नहीं इसलियें घर की एक चाबी अब लता के पास रहती थी। अपनी सुविधा से जब जो चाहें खाना बनाकर रख देती थी।डा.अनिता जब आतीं तो माइक्रोवेव मे गरम कर लेतीं।

चार साल बीत गये लता के कोलेज मे प्लेसमैंट के लियें कंपनियाँ आने लगीं।लता अब भी शहर के बाहर नहीं जाना चाहती थी, उसे स्थानीय वुमैन्स पौलिटैकनिक मे व्याख्याता की नोकरी मिल गई,तब भी वह उसी तरह डा.अनिता के साथ रहती रही, खाना बनाती रही । जब भी डा. अनिता कहतीं कि अब वो काम छोड़ दे वो किसी और को रख लेंगी तो लता नाराज़ हो जाती, कहती कि वह बस अपना और अपनी भाभी का खाना ही तो बनाती है ये काम तो अपने घर का है। ये तो वो नहीं छोड़ सकती।

लता को जब पहली तनख्वाह मिली तो वह डा.अनिता के लियें एक साड़ी और पायल के लियें कुछ किताबें ले आई। डा. अनिता ने कहा ‘’इतने पैसे ख़र्च करने की क्या ज़रूरत थी, अभी तुझे बैंक का कर्ज़ भी चुकाना है।‘’

‘’अरे, भाभी वह भी चुक जायेगा मेरा ख़र्च ही क्या है।‘’ लता ने कहा।

‘’अच्छा चल ठीक है, ख़ूब कमा ख़ूब ख़र्च कर। ‘’डा. अनिता ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा।

पायल को भी किताबें पसन्द आईं वो कहने लगी ‘’लता तू तो मुझसे बहुत ज़्यादा कमाने लगी है, मुझे तो इंटर्नशिप मे बहुत कम पैसे मिलते हैं और अभी आगे भी पढ़ाई का लम्बा रास्ता बचा है। मै तेरे लियें बहुत ख़ुश हूँ। ये किताबें नागपुर जाते समय ट्रेन मे पढ़ूंगी।‘’ पायल ने कहा।

इस पर डा. अनिता कहने लगीं ‘’तुम दोनो ने अपने लक्ष्य ख़ुद चुने हैं। लता और पायल एक साथ बोल पड़ीं, ‘’ वो तो है। ‘’

कुछ दिन मे छुट्टियाँ समाप्त हो गईं पायल होस्टल चली गई। लता और डा़ अनिता अपने अपने काम मे व्यस्त हो गईं। लता नौकरी करते एक साल हो गया था, पायल की इंटर्नशिप समाप्त होने वाली थी, फिर उसे पी.जी. की प्रवेश परीक्षा की तैयारी करनी थी।

एक दिन लता अनिता के पास आकर कहने लगी ‘’भाभी आपसे कुछ ज़रूरी काम है।‘’

‘’ बोल न इतना संकोच क्यों कर रही है।‘’ डा.अनिता ने कहा।

‘’भाभी, वो राजेश है मै और वौ….’’ लता ने बताया।

‘’अच्छा तुझे पढ़ाई और काम के बीच डेटिंग की फुर्सत कब मिल गई ?’’

‘’भाभी.’’ लता थोड़ा शरमा गई।

‘’वैसे ये राजेश करते क्या हैं?’’ डा़ अनिता ने पूछताछ की।

‘’भाभी अभी ऐम. टैक किया है। आजकल इंटरव्यू चल रहे हैं।‘’ लता ने बताया।

‘’तूने पसन्द किया है तो अच्छा तो होगा ही। ‘’डा. अनिता ने कहा।

‘’ ऐसा कर उसके माता पिता को और अपनी मा और भाई को रविवार को मेरे घर बुला ले सब तय कर लेगे, मै तेरी मा से पहले ही बात कर लूँगी। ‘’डा. अनिता ने कहा।

रविवार रात के भोजन लिये डा. अनिता ने लड़के वालों को निमंत्रण भेज दिया। राजेश और उसका परिवार सबको अच्छा लगा। राजेश के परिवार से माता पिता ही आये थे बड़ी बहन की शादी एक साल पहले हो चुकी थी। राजेश की पसन्द उन्हे पसन्द आ गई। डा. अनिता ने ज्ल्दी ही आर्य समाज मंदिर मे दोनो की शादी करवा दी।

डा. अनिता के घर की एक चाबी अभी भी लता के पास रहती है।. यद्यपि उन्होंने एक लड़की खाना बनाने के लियें रख ली है फिर भी जब भी समय मिलता है लता अपनी भाभी की पसन्द का कुछ बना कर रख जाती है।

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7 Comments on "लक्ष्य"

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Binu Bhatnagar
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THANK U ALL

डॉ. मधुसूदन
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सुन्दर कहानी –सुन्दर अंत.

Vijay Nikore
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बहुत ही कोमल और विचारपरक कहानी लिखी है । बधाई ।

भावों का बहाव , शब्दावली… बीनू जी की कलम के माध्यम अच्छे उतरे हैं ।

Vijay Nikore
Guest

बहुत ही कोमल और विचारपरक कहानी लिखी है । बधाई ।
भावों का बहाव , शब्दावली… कलम के माध्यम अच्छे उतरे हैं ।

डॉ. मधुसूदन
Guest

विजय जी, आप की ओअधाई वल्लभ विद्यानगर में हुयी थी, क्या? शायद मैं मधु झवेरी आप को जानता हूँ. आप उस समय कवितायेँ भी लिखते थे, ऐसा स्मरण हो रहा है,

PRAN SHARMA
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कथानक पठनीय है और मन को छूता है .

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