लेखक परिचय

रवि कुमार छवि

रवि कुमार छवि

(भारतीय जनसंचार संस्थान)

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paanरवि कुमार छवि

आइए शर्मा जी, कैसे हैं आप. मुरारी बाबू पान पर चूना लगाते-लगाते भले मन से पूछ ही लेते हैं. ठीक हूं. आप कैसे हैं, और ये बेवजह, अपना गमछा क्यों ओढ़ के रखे हैं वो भी इतनी गर्मी में. थोड़े उदास मन से शर्मा जी बोलते हैं। मुरारी बाबू की निकली हई तोंद कुछ अकड़ सी जाती हैं… और वो आलती पालथी मारकर बड़े इत्मीनान से बैठ जाते हैं. .बगल में पसीना आकर कुछ देर रूक सा सा जाता हैं . गली के नुक्कड़ पर एक छोटी सी गुमटीनुमा दुकान पर दोनों के बीच बातों का सिलसिला चलता हैं जो कुछ समय बाद मुरारी बाबू की बोनी होते ही खत्म हो जाता हैं। दुकान के बगल में साईकिल के स्टैंड पर साईकिलों की भीड़ शुरू हो जाती हैं.। छोटे बच्चे अपनी उम्र से पहले परिपक्कव होने की कोशिश करते दिखते हैं…… शर्मा जी एक खास किस्म का पान… अपनी पेंट के बाएं जेब में रखते हैं, और लेकर चल देते हैं ।

शर्मा जी एक हाथ से छाता पकड़ें हुए 1990 के दशक के पुराने चश्मे को ठीक करते हुए आगे बढ़ जाते हैं कुछ दूरी पर शर्मा जी पान को मुंह में डाल कर उसे चारों ओर ठेलने लगते हैं. मानों जुगाली कर रहे हो। और देखते ही देखते अपने दफ्तर की ओर निकल जाते हैं। जितनी रफ्तार सड़क पर चल रही गाड़ियों की होती हैं उतनी ही धीमी गति से शर्मा जी पान का स्वाद लेते हैं। मुंह में घुल चुके पान की पीक को बाहर थूकने के बजाय अंदर ही गटक लेते हैं। शायद उन्हें पान की पीक का स्वाद रास आने लगा था। जब पान का पूरी तरह से शोषण हो चुका था और पान जब तक उनके मुंह के सहारे होठों को सान नहीं देता तब तक वो थूकते नहीं।
शर्मा जी उस पान को ऐसे खा रहे थे मानों कि वो पान इस दुनिया का आखिरी पान हो…… लगता था कि शर्मा जी पान के माध्यम से अपने पैसे वसूल रहे थे। सिर्फ शर्मा जी ही नहीं अमूमन,पान खाने वाले लोगों की स्थिति कुछ ऐसे ही हैं…….. कई बार तो उन लोगों को देखकर ही उल्टी हो जाती हैं… पर क्या करें दुनिया के साथ जो चलना हैं। .. ना जाने क्यों शर्मा जी जैसे लोग उस थूक को भी अपने लिए किसी भी अमृत से कम नहीं समझते । हमारे देश में कई ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे……
अभी कुछ दिनों पहले ही सड़क पर एक आदमी गुटखा खा रहा था….. गुटखे से मुंह भरने पर भी महाशय ने उसे थूका नहीं बल्कि निगल गए। मुझे समझ नहीं आया कि वो महाशय आखिर क्यों उसे बड़े चाव से चबा रहे हैं खैर, इनमे से कुछ ऐसे लोग भी होते हैं . जो पान वगैराह को इस तरह से फेंकते हैं जैसे कि उनके बीच प्रतियोगिता चल रही हो……….. कभी-कभी लगता हैं कि सड़क उनके बाप की हैं शायद तभी वो लोग इस काम में इतने माहिर हैं……. और इतनी बेफ्रिकी से कर रहे होते हैं …… मगर एक बात तो हैं पान हो या गुटखा इनके थूक के स्वाद में शायद एक अजीब सा स्वाद हैं जो लोगों के मुंह को सानने के साथ एक अनोखा स्वाद देता हैं…….
सोचता हूं कि क्यों न एक बार इसका स्वाद चखा जाए आखिर हम भी तो देखे कि थूक का स्वाद कैसा होता हैं।

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