लेखक परिचय

गंगानन्द झा

गंगानन्द झा

डी.ए.वी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत होने के पश्चात् चण्डीगढ़ में गत पन्‍द्रह सालों से रह रहे गंगानंद जी को लिखने पढ़ने का शौक है।

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गंगानन्‍द झा

आज शिक्षक दिवस है। मैं प्रोफेसर मुखर्जी को स्मरण कर रहा हूँ। उन दिनों शिक्षक दिवस नहीं हुआ करता था। लोग अपनी किसीके प्रति अपनी व्यक्तिगत कृतज्ञता और श्रद्धा की भावनाओं को अभिव्यक्त करने में सहज संकोच अनुभव करते थे। “सॉरी” और “थैंक यू” कहने का चलन अभी नहीं उभरा था।

पचास के दशक में देश में उच्च शिक्षा के प्रसार एवम् विकास के क्षेत्र में तेजी से प्रगति हो रही थी । हमारे टी.एन.जे.कॉलेज, भागलपुर बिहार के प्रतिष्ठित पुराने महाविद्यालयों में सम्माननीय था। पर विज्ञान के विभिन्न विषयों की तरह जीव-विज्ञान में भी आनर्स की पढ़ाई का श्रीगणेश सन 1953 ई.में ही हुआ था। मैंने BSc. class में Hons. वनस्पतिशास्त्र में लिया था । ऑनर्स की पढ़ाई का हमारा पहला बैच था। विभाग के शिक्षक बहुत उत्साहित थे । बहुत उत्साह से नए कोर्स के लिए अपने को प्रस्तुत करते थे। प्रोफेसर विश्वनाथ मुखर्जी साहब हमारे विभागाध्यक्ष थे । उनका अकुण्ठ स्नेह और मुझे अनायास ही देवता के आशीर्वाद की तरह मिलता रहा था। मैं तब अपने आप में सिमटा लजीला छात्र हुआ करता था। उनके ध्यान में आने की शुरुआत अप्रत्याशित रूप से बड़े दिलचस्प तरीक़े से हुई थी । पहली आवधिक परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन प्रश्नों के सम्बन्धित शिक्षकों ने स्वतंत्र रूप से किया था। उत्तर-पुस्तिका जाँचने के बाद मुखर्जी साहब हमारे वर्ग में आए और हमें हमारी उत्तर-पुस्तिका दी। उसके पहले अपना मत बताते हुए उन्होंने अपने खास अंदाज में कहा, ” सिर्फ एक लड़के का उत्तर ही ऑनर्स के स्तर का है।” स्वाभाविक रूप में सबों की जिज्ञासा थी कि वह लड़का कौन है। सबों को, मुझको भी, आश्चर्य हुआ जब उस उन्होंने मेरा नाम लिया। मैं वर्ग का अपने आपमें सिमटा हुआ छात्र था, जबकि मेरे अन्य सहपाठी काफी स्मार्ट एवम् तत्पर हुआ करते थे। फिर बाद में मुखर्जी साहब ने मुझसे पूछा, ”तुम्हारे पास किताबें हैं न?” मैंने किताबें खऱीदने में आर्थिक दिक्कत होने का हवाला दिया तो वे बोले, ”फिर तुमने ऑनर्स पढ़ना क्यों तय किया?” मैंने सीधा उत्तर दिया, ”क्योंकि ऑनर्स की पढ़ाई का प्रावधान है और मेरा चुनाव इसके लिए हुआ।” फिर उन्होंने चलते चलते कहा, ”जब किसी किताब की जरूरत हो तो मुझसे ले जाना।” फिर मुड़कर मेरी ओर नहीं देखा उन्होंने। इसके बाद से सम्पर्क का क ऐसा सिलसिला बना कि जब कभी मैं किताब लेने उनके पास जाता, तो दरवाजे का पल्ला खोलकर किताब निकालकर दे देते और फिर दरवाजा बंद कर लेते।

हमारे विभाग से ऑनर्स वर्ग के छात्रों का दल क्षेत्र-अध्ययन के लिए दार्जिलिंग, गैंगटॉक और कैलिम्पॉंग के लिए रवाना होनेवाला था। बताया गया कि इसमें शामिल होना अनिवार्य है। मैंने आर्थिक कारणों का हवाला देते हुए इसमें शामिल होने में असमज्ञथता जताई, तो मुखर्जी साहब ने कहा, “you must accompany us. I shall bear your expenses.” उल्लेखनीय है कि उस वक्त कॉलेज शिक्षकों की आय काफी नहीं हुआ करती थी और मुखर्जी साहब की तस्वीर एक कंजूस व्यक्ति की थी। मैं शामिल तो हुआ पर दार्जिलिंग के बाद बहाना बनाकर वापस हो गया। मुखर्जी साहब ने मेरे संकोच का सम्मान करते हुए मुझे लौटने की अनुमति दे दी थी।

मुखर्जी साहब चाहते थे कि मैं स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर पाऊं। इसलिए जब भी बात होती मुझे प्रोत्साहित करते कि परीक्षा में प्रथम स्थान पाने के लिए परिश्रम करूँ। “स्कॉलरशीप मिलने पर तो पढ़ सकोगे?” मैं सुन भर लेता था, प्रेरित नहीं हो पाता। मुझको यह लक्ष्य अपनी सामर्थ्य से परे लगता था। फिर परीक्षा हुई, पर प्रायोगिक परीक्षा के आयोजन में काफी विलम्ब हुआ। इस बीच एक बार जब मैं प्रायोगिक परीक्षा की तिथि की जानकारी लेने के लिए विभाग में गया तो मुखर्जी साहब ने पुनः स्नातकोत्तर पढ़ाई का प्रसंग उठाते हुए स्कॉलरशीप पाने के लिए प्रायोगिक परीक्षा मन लगाकर देने की सलाह दी। मैंने कहा, “केवल प्रायोगिक पत्रों के आधार पर कहीं स्कॉलरशीप मिलता है।“ उन्होंने कहा, “जाओ मरो।” प्रायोगिक परीक्षा में मेरा प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। मुखर्जी साहब स्वयम् परीक्षक थे, कोई पक्षपात नहीं किया उन्होंने। मुझे सबसे कम अंक मिले थे।

B.Sc. का परीक्षाफल आया, मैं उत्तीर्ण होकर बहुत प्रसन्न था। पर जब मुखर्जी साहब से मिलने गया तो उन्होने देखते ही नाराजगी जाहिर करते हुए कहा. ”You have committed suicide थ्योरी में तुम्हारे अंक सर्वोच्च हैं और प्रैक्टिकल में सबसे कम। थ्योरी के प्राप्तांक मॉडरेशन के समय मैं देख चुका था और इसीलिए तुमसे कहा था कि प्रैक्टिकल ठीक से करो। मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया तुमने।” मैंने उनसे कहा कि ”तब आपने मुझे कहा नहीं।” इस पर उन्होंने कहा, ” तब यह गोपनीय बात थी। बताना गलत होता ।” फिर उन्होंने मुझे सलाह दिया कि कृषि विभाग में कनीय अनुसन्धान-सहायक पद के लिए आवेदन करूं । मैंने ऐसा ही किया और नियुक्ति मिलने पर उक्त पद पर सबौर, जो भागलपुर का उपनगर है, में योगदान किया था । मुखर्जी साहब से सम्पर्क बना रहा था । कुछ महीने बीतने के बाद एक बार जब मैं अपने घर गया हुआ था तो मेरे बड़े भाई ने मुझसे पूछा कि क्या मैं पटना विश्वविद्यालय में नौकरी के लिए कोशिश कर रहा हूँ; मेरे द्वारा नकारात्मक उत्तर मिलने पर उन्हौंने एक मित्र के हवाले से बताया कि उसे मालूम हुआ था कि मुखर्जी साहब ने पटना विश्वविद्यालय के बनस्पति-शास्त्र विभागाध्यक्ष से निवेदन किया है कि उनका एक मेधावी छात्र आर्थिक असमर्थता के कारण स्नातकोत्तर अध्ययन नहीं कर पा रहा है , इसलिए उनका अनुरोध है कि अपने विभाग में प्रयोगशाला सहायक के पद पर नियुक्त कर स्नातकोत्तर की पढ़ाई करने का एक अवसर प्रदान करें । इस जानकारी से मुझे बहुत ही आश्चर्य हुआ, क्योंकि मुझे नियमित मुलकातों के बावजूद इस प्रकार का कोई संकेत नहीं मिला था। कभी इस प्रकार की कोई चर्चा मुखर्जी साहब ने मुझसे नहीं की थी । मैंने स्नातकोत्तर पढ़ाई नहीं कर पाने के लिए कभी उनके पास कोई अफसोस जाहिर किया हो, ऐसा भी नहीं था। सही बात तो यह थी कि मुझे तब यह भी मालूम नहीं था कि पटना विश्वविद्यालय में इस तरह की कोई व्यवस्था है कि नौकरी करते हुए स्नातकोत्तर परीक्षा में सम्मिलित हुआ जा सकता है । इसके अलावे मुखर्जी साहब काफी अन्तर्मुखी व्यक्ति के रुप में जाने जाते थे, डॉक्टर रॉय से उनका सहज-सा सम्पर्क भी नहीं था; मैंने वापस भागलपुर लौटने पर मुखर्जी साहब से इस सम्बन्ध में जानना चाहा तो उन्होंने प्रसंग को टालते हुए कहा ”तुमको इससे क्या मतलब है ।” मैंने हैरानी जाहिर की, ”नौकरी मुझको करनी है तो मुझे तो जानना ही चाहिए, मतलब तो मुझे ही होना चाहिए।” तब उन्होंने कहा था, “देखो क्या होता है ।” कई महीने बीतने के बाद एक दिन मुखर्जी साहब ने मुझसे कहा कि अगर कभी पटना जाओ तो डॉ रॉय से मिलना , देखो क्या होता है । उनकी बात से लगा जैसे उन्हें उम्मीद तो थी, पर यकीन नहीं था । पर जब मैं डॉक्टर रॉय के पास गया तो उन्हौंने मुझे अविलम्ब नियुक्त कर लिया था।

जब कि मेरे अपने अनुभवों की उपलब्धि से एक ऐसी बिलकुल अलग और अनोखी तस्वीर उभरती है ,जिसके लिए कोई संज्ञा देने के बजाय मैंने बस उस तस्वीर की एक झलक भर देने की कोशिश की है । ऐसे लोग मानवीय सम्बन्धों के लिए भरोसा और आश्वस्त होने के एहसास देते हैं ।

मुझे पता है, मुखर्जी साहब को खबर नहीं हो पाएगी कि उन्हें याद किया जा रहा है। इसकी उन्हें परवाह भी नहीं थी।

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5 Comments on "शिक्षक दिवस पर विशेष/ ‘प्रोफेसर मुखर्जी मानवीय संबंधों को भी जीते थे’"

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गंगानन्द झा
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गंगानन्द झा

हिन्दी के प्रतिष्ठित व्यंग्यकार श्री रहीन्द्रनाथ त्यागी की एक कहानी में एक अवलोकन था–” वह समय भी क्या समय था, जब लोग घरों के बाहर बैठकर पेशाब करते थे, लोगों के पहरावे से उनके पेशे की जानकारी हो जाती थी, कुमारी कुमारी, सधवा सधवा और विधवा विधवा ही दिखती थी।”
तब शिक्षक विवेक के प्रतीक हुआ करते थे।कहानीकार कथा साहित्य में शिक्षक पात्रों के जरिए समाज के मूल्य-बोध को चित्रित करते थे।
तब शिक्षक बेचारा कहा जाता था।

Dr. Dhanakar Thakur
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डॉ. राधाकृष्णन के चमचों ने उनके जन्मदिन को शिक्षक दिवस बना दिया जबकि वे कभी भी विद्यालय में शिक्षक रहे नहीं जहाँ यह मनाया जता है – लोकमान्य तिलक या मास्टर सूर्य सेन के दिवस को ही शिकाश्क दिवस होना था यदि गुरु पूर्णिमा को मानने में सेकुलरिस्म नहीं दिखता हो वैसे श्री झा ने जैसे शिक्षक का विवरण दिया है वैसे शिक्षक उन dino हर जगह थे – मैं दरभंगा मेडिकल कॉलेज के अपने कुछ शिक्षकों के बारे में जो आत्मकथा में लिखा है साट हूँ (अंगरेजी के किताब से ) -” Dr.बन Das Gupta probably guessed my condition… Read more »
S k singhal
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श्री दिनकर जी
आपका यह अध्यापक दिवस के सम्बंध में लिखा लेख ईतना भावुक करने वाला है हम सबको अपने टीचर याद अा गए ा यह समय ही ऐसा था कि सभी एक दुसरे के िलये कितने संबिधत व चिंितत होते थे ा काश आज भी ऐसे अनेक उदाहरण मिल पाते तो आज की पिढी शिक्षक िदवस का अर्थ समझ़ । सकतीा

आपको व उन सभी समाज के पर्ति समिर्पित महान विभूतियों को सादर नमन ा

S B Jha
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जहाँ तक मुझे पता है कि आपके पिता बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिनोदबाबू तथा भारत के राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र बाबु के मित्र भी रहे हैं पर उन्होंने कभी भी अपने लाभ के लिए उनसे खुशामद न की | एक शिक्षाविद होने के नाते आत्मसम्मान के साथ कभी समझौता न किया, आजीवन वित्तरहित शिक्षक बने रहे और शिक्षा का अलख जगाकर इस दुनिया से चल बसे, अगर उनके बच्चों में आत्म सम्मान का गुण आ गया हो तो कोई अतिशयोक्ति न होगी | उस दौर में लोग एक दुसरे की भावनाओं का सम्मान किया करते थे, पीड़ा का अनुभव एक सच्चा… Read more »
Manish Pathak
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धन्यबाद!! बहुत ही बढ़िया लेख…और ऐसा भी नहीं है कि अब ऐसे शिक्षक नहीं है…. समस्या यह है कि… जाने क्यों …वो आगे आना नहीं चाहते…यह लेख.. बहुत कुछ सिखाता भी है.. ऐसे लेख… ही इस वेब साईट कि उपयुक्तता प्रमाणित करते हैं.. कुछ और अनुभव शेयर करीं.. तो बड़ी ख़ुशी होगी.. साथ में सीखना तो चलेगा ही…
-मनीष पाठक

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