लेखक परिचय

एम. अफसर खां सागर

एम. अफसर खां सागर

एम. अफसर खां सागर धानापुर-चन्दौली (उत्तर प्रदेश) के निवासी हैं। इन्होने समाजशास्त्र में परास्नातक के साथ पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है। स्वतंत्र पत्रकार , स्तम्भकार व युवा साहित्यकार के रूप में जाने जाते हैं। पिछले पन्द्रह सालों से पत्रकारिता एवं रचना धर्मीता से जुड़े हैं। राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न अखबारों , पत्रिकाओं और वेब पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिखते रहते हैं। Mobile- 8081110808 email- mafsarpathan@gmail.com

Posted On by &filed under व्यंग्य.


-एम. अफसर खां सागर-   politics

सियासत क्या बला है और इसके दाव पेंच क्या हैं, इसका सतही इल्म न मुझे आज तक हुआ और न मैने कभी जानने की कोशिश की। अगर यूं समझें कि सियासी के हल्के में फिसड्डी हूं तो गलत न होगा। मगर सियासत ऐसी बला है कि आप इससे लाख पीछा छुड़ाएं मगर छूटने वाला नहीं है। देश व प्रदेश की बात तो दूर आजकल गली-मुहल्ले में नेताओं की लाइन लगी है। नेता ऐसे कि आज फलां की जिंदाबाद तो तो कल फलां की। या यूं कह लें कि सुबह और शाम में सियासी दल और झण्डा बदलने में माहिर हैं। इनकी महारत ऐसा कि गिरगिट भी मात खा जावे। इनके कारनामों की देन है कि आज हिन्दुस्तानी सियासत का पूरा हुलिया ही बदल गया है। गुजरे जमाने के नेता अगर ये सब देख लें तो अपना माथा ही ठोक लें। राजनीति बदली और बदलने की राजनीति का प्रादुर्भाव हुआ। दल बदले और दल बदलुओं का चरित्र भी बदल गया।

ठीक इसी फारमेट के एक नेता मुंशी दरबारी लाल मेरे पड़ोस में रहते हैं। अखबारी आदमी हूं सो हर रोज उनसे सामना होना लाजमी है। सुबह किसी दल का प्रेस नोट लेकर आते हैं तो शाम होते दूसरे दल का। बेचारे झण्डा और टोपी बदलते-बदलते इतने बदल गयें कि लोग उन्हे न तो किसी दल और न ही पैदल मानते हैं मगर अपने इस चरित्र पर काफी गौरवान्वित महसूस करते हैं। एक शाम मुंशी दरबारी लाल प्रेस नोट लेकर आये और कहने लगे, भाई साहब! राजनीति का जो हालिया दौर चल रहा है उसमें मुझ जैसों के लिए बहुत संभावनायें दिखती हैं। दौर ऐसा कि कुछ कहा नहीं जा सकता कौन किस दल में है, रहेगा या जाएगा। ठीक आपके मीडिया जगत की तरह। आज हैं प्रधान सम्पादक तो कल मामूली पत्रकार या पैरोकार। दल तो ऐसे बदला जा रहा है जैसे लोग कपड़े बदलते हैं। मैं तो दलबदलुओं का काफी सम्मान करता हूं। सलाम करता हूं उनके मौकापरस्ती को। शीश नवाता हूं उनके तोल-मोल या खरीद-व-फरोख्त के आगे। आस्था रखता हूं उनके दलबदलू चरित्र में। ये भी क्या कि एक दल के दलदल में दल का दोहा जपते-जपते स्वर्ग सीधार जाए, न पद न प्रतिष्ठा और न लाल-पीली बत्ती की आस। सिर्फ दल की मर्यादा का ख्याल रखो, आलाकमान और हाईकमान के आदेशों और आज्ञा का पालन करो। सिद्धांतों की पोटली ढोते-ढोते उम्र के साथ नेतागिरी ही एक्सपायर हो जाये। ऐसी बेवकूफी भरा काम तो सिर्फ और सिर्फ गधा ही कर सका है न कि नेता।

आजकल राजनीति तो मौकापरस्ती का दूसरा नाम है। खुद के लाभ की खातिर वसूलों-सिद्धांतों से समझौता कर लेने में ही भलाई है, कहावत है जैसा देश वैसा भेष। देखिए ना कल्याण सिंह जी को खालिस राम भक्त थें पहले भी आज भी हैं। क्या हुआ जो बीच में समाजवाद का टेस्ट ले लिया। लाल व केसरिया टोपी में अन्तर ही क्या है? मैं तो छोटे चैधर से काफी हद तक सहमत हूं, एनडीए और यूपीए में फर्क क्या? सिर्फ मंत्रीपद से सरोकार। नरेश अग्रवाल जी का चरित्र तो इस मामले में एकदम दुरूस्त है हाथी व साइकिल के बीच हमेशा गैप बना के चलते हैं। सरकार बदले ही सवारी बल लेते हैं। भई! हम किसी के साथ आखिर रहें क्यों? जब हमारे लोगों को लाभ व सम्मान ही न मिल पावे। दलबदलुओं का अपना कुछ वसूल भी होता है जिसपर वे पूरी तरह अमल करते हैं। परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है मगर उसके अपने तरीके होते हैं। दल बदलने के बाद नेता शाम की शुरमई रोशनी के साथ किसी दूसरे दल के सिद्धांतों के तालाब में कूद कर फ्रेश हो जाता है। जहां  पुरान पार्टी के सिद्धांतों के मैल को नई पार्टी के वसूलों के क्लीनिंग सोप से रगड़-रगड़ के धो डालता है। गाड़ी से पुराने दल के झण्डे को उतारकर नये दल के झण्डे से चमका देता है। इतना ही नहीं नये दल के दफ्तर में उसके आमद का तमाशा होता है और उसके चरित्र के कसीदे पढ़े जाते हैं। मोटी माला पहनाकर नये अवतार में पेश किया जाता है। वह भी पर्टी के सिद्धांतों के लिए जीने-मरने की कसमें खाता है। फिर क्या दल में पद के ताज से उसका मसतक उंचा किया जाता है, इस दौरान उसको काफी मान व सम्मान का बोध कराया जाता है। ऐसे में पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं से उसको फजीलत खुद-ब-खुद हासिल हो जाती है। अगर दल सत्ता में आ जावे तो सिंहासन भी मिलना वजिब है। आप ही सोचिए जब दल बदलने पर इतना ईनाम व एकराम मिले तो नेता क्यों न दलबदलू होवे।

दलबदलुओं से आधुनिक राजनीति को ऑक्सीजन मिल रहा है। अगर ये खत्म हो गये तो कितनों के राजनीति संकट आ जायेगा। इनके ना रहने से छोटे सियासी दलों के साथ बड़े दलों को भी सरकार बनाने में दिक्कत व मशक्कत का सामना करना पड़ेगा। बेहद पवित्र व मुफीद है दलबदलू चरित्र। मैं तो साफ कहता हूं जनाब! दल बदलन के कारने नेता धरा शरीर।

 

Leave a Reply

1 Comment on "दल बदलन के कारने नेता धरा शरीर"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
IMTIYAZ AHMAD
Guest

इन नेताओ से अच्छी तो वो बाजारू औरत है जो अपना जिश्म अपना पेट भरने के लिए करती है या अपने बच्चो का पेट पलने के लिए करती है लानत है ऐसे नेताओ पर जो कुर्सी के लिए दंगा फसाद करते है मजहब के नाम पर लोगो को बाटते है I

wpDiscuz