लेखक परिचय

डा.राज सक्सेना

डा.राज सक्सेना

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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ashuलेने सबाब तीर्थ का, घर से निकल पड़े |

केदार-बद्री धाम के,  दर पे निकल पड़े |

सब ठीक चल रहा था,मौसम भी साफ था,

कुछ बादलों के झुण्ड,बरसने निकल पड़े |

दीवानगी-ए-अकीदत पे जरा गौर तो करें,

ठहरे जरा सी देर मगर,फिर से चल पड़े |

लाखों का वो हुजूम जो,चल तो रहा था,पर-

फटने को बादलों के भी,जत्थे निकल पड़े |

दर्शन की मन में आस,जहन में जुनून था,

होकर निडर बरसात में, आगे वे चल पड़े |

दिखला रहा था रौद्र रूप, रुद्र शिव मगर,

करते हुए अवहेलना,   बंदे निकल पड़े |

कुदरत ने छेड़छाड़ का, ऐसा दिया सबक,

रूपों में जल के रुद्र, निगलने निकल पड़े |

जलप्रलय के रूप ने,सब कर दिया  तबाह,

वो हादसा हुआ के,’राज’ के आंसू निकल पड़े |

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