लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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संदर्भ -योजना आयोग का दावा –

प्रमोद भार्गव

povertyयह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सप्रंग सरकार बीते साढ़े नौ साल में भी गरीबी की रेखा तय नहीं कर पार्इ। इसके विपरीत वह आंकड़ों की बाजीगरी दिखाकर गरीबी घटाकर गरीबों का उपहास जरूर करने में लगी है। योजना आयोग ने दावा किया है कि शहरी गरीब 33.33 और ग्रामीण गरीब 27.20 रूपये में रोजाना का खर्च चला सकता है। इसलिए इससे ज्यादा आमदनी वाले व्यक्ति को गरीब नहीं माना जायेगा। यदि इसी आंकड़े पर गरीबी का मापदंड निर्धारित हो जाता है तो करोड़ों लोग बीपीएल की श्रेणी से बाहर हो जायेंगे। यही कारण है कि  एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल ने भी आयोग के    इस दावे को गलत ठहराया है। आयोग ने यह भी दावा किया है कि आठ साल में देश में गरीबी 15.3 प्रतिशत घटी है। गरीबी का अनुपात 2004-05 में37.2 प्रतिशत था जो 2011-12 में घटकर 21.9 प्रतिशत रह गया है।

 

हमारे देश में कर्इ सालों से ग्रामीण और शहरी व्यक्ति की प्रतिदीन की आमदनी तय करने की कवायद चल रही है,जिससे गरीबी-रेखा सुनिश्चित की जा सकने के साथ, उनकी खाध सुरक्षा भी की जा सके। लेकिन बार-बार जिस तरह से संदेहास्पद व विरोधाभासी आंकड़े परोसे जाते हैं, उससे लगता है गरीबी का स्पष्ट खुलासा करने की बजाय,उसे छिपाने की कवायद बड़े स्तर पर हो रही है। ताजा आंकड़ो के अनुसार देश के ग्रामीण इलाकों में गरीब 27.20 रूपये रोजाना और शहरों में 33.33 रूपये रोज में जैसे-तैसे गुजर-बसर कर रहे हैं। ये आंकड़े सुरेश तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट के आधार पर तय किये गये हैं। जबकि पिछले माह एनएसएसओ के 68 वें सर्वे में जुटाए गए आंकड़ों में ग्रामीण 17 रूपये और शहरी गरीब को 23 रूपये में गुजारा करते बताया गया है। यानि इस आमदनी को वास्तविक गरीबी रेखा माना जाना चाहिए था।

करीब 58 साल पहले दांडेकर और रथ नाम के दो अर्थषास्त्रियों ने गरीबी रेखा को परिभाशित किया था। इसे ही भारत सरकार ने गरीबी का आधार माना। इस परिभाषा के अनुसार जो व्यक्ति प्रतिदिन औसत 2400 कैलोरी से कम भोजन करता है,उसे गरीबी रेखा से नीचे माना जाने लगा। बांकी को इस रेखा के उपर माना गया। कालांतर में कैलोरी को औसत खपत को मानने के अनेक तरीके सुझाए गए। इनमें अनेक चिचित्र व हास्यपाद थे। लेकिन अंतिम रूप से आहार की उपलब्धता को ही प्रमुख आधार माना गया,जो पिछली सदी तक मान्य रहा। किंतु इक्कीसवीं सदी में जागरूकता बढ़ने,जन-संगठनों में उभार आने और राजनीति में क्षेत्रीय व जातीयता के वर्चस्व ने गरीबी-मापक पैमाने में बदलाव की अहम पहल की। नतीजतन इस सर्वे में अब भोजन के आलावा दूध,सब्जी,र्इधन, प्रकाश, कपड़े, जूते, दवाइंया, शिक्षा, परिवहन, उपभोक्ता वस्तुंए भी जोड़ दी गर्इं। ये वस्तुएं जोड़ना जरूरी थीं, क्योंकि पहले गरीब, स्वास्थ, परिवहन और उपभोक्ता वस्तुओं से लगभग वंचित था। र्इंधन, सब्जी और आहार का एक बड़ा सा हिस्सा वह प्रकृति से प्राकृतिक उपलबिध के रूप में जुटा लेता था,लेकिन जंगलों के विनाश और जंगलों से बेदखली के कारण उसे प्राकृतिक नेमत से वंचित होना पड़ा। लिहाजा अब उसे जीवन-यापन की ये जरूरी सामगि्रयां बाजार से खरीदनी पड़ती हैं। इस खरीद के लिए जरूरी है कि या तो उसकी जेब में पर्याप्त धनराशी हो अथवा जनकल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से सरकार उपलब्ध कराए। हालांकि अन्य राज्य सरकारों ने भुखमरी की रेखा पर जीवन यापन कर रहे इन लोगों को एक रूपये किलो गेहूं व मोटा अनाज, दो रुपये किलो चावल उपलब्ध कराकर इनकी खाध सुरक्षा की पहल की है। मघ्य प्रदेश सरकार ने एक किलो आयोडीनयुक्त नमक भी गेहूं-चावल के साथ उपलब्ध कराया है। यहां गौरतलब है कि जब दलों की राजनीति सस्ती दर पर भूख मिटाने के संसाधन उपलब्ध कराने पर केंदि्र्रत हो जाए तो यह कैसे माना जा सकता है कि राष्ट्र-राज्य के खुशहाली और आर्थिक समृद्धि के दावे सही हैं ? इस तथ्य की तसदीक, गांवो की चौपालों पर आज भी गाए जाने वाले इस गीत से होती है, ‘सौ मे सत्तर आदमी जब नाषाद हैं, तब दिल पर रखकर हाथ कहो कि हम आजाद हैं ?

इस रिपोर्ट का सकारात्मक पहलु है कि ग्रामीण और शहरी नागरिकों का गैर खाध वस्तुओं और उपभोक्ता सेवाओं पर भी खर्च बढ़ा है। इनमें शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन और मोबाइल फोन सेवाएं भी दर्ज हो गर्इ हैं। लेकिन इसी सर्वे में विवादास्पद आंकड़े भी सामने आए हैं। रोजगार की उम्र हासिल कर लेने वाले लोगों में 2009-10 की तुलना में 2011-12 में रोजगार प्राप्त कर लेने में एक फीसदी से भी ज्यादा की कमी आर्इ है। जब व्यक्ति को रोजगार ही नहीं मिला तो आय कैसे बढ़ी ? इसी तरह रिपोर्ट में बताया है कि कृषि श्रमिकों की संख्या घटकर 49 फीसदी रह गर्इ है। मसलन क्या ये लोग मनरेगा और जनकल्याणकारी योजनाओं पर निर्भर हो गए हैं ? या कृषि का यांत्रिकीकरण हो जाने के कारण इन्हें कृषि कार्यों में मजदूरी नहीं मिल रही ? इस कारण से शहरों की ओर पलायन कर गए ? इन तथ्यों को रिपोर्ट में या तो नजरअंदाज किया गया है या फिर जानबूझकर छिपाया गया है, जिससे गरीबी घटती दिखे। 2009-10 के सर्वे में गरीब कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत 23.3 प्रतिशत था, जबकि 2011-12 में यह घटकर 22.5 प्रतिशत रह गया। गरीब या मजदूर परिवारों में महिलाओं का सकल घरेलू उत्पाद में बेहद महत्वपूर्ण योगदान रहता है। बलिक इनकी कमार्इ के बिना परिवार का गुजारा नामुमकिन है। इस परिप्रेक्ष्य में यदि कामकाजी महिलाओं में आर्इ कमी का मूल्यांकन करें तो तय होता है कि परिवार की मासिक आमदनी घटनी चाहिए ? इसी दौरान ग्रामीण, उपभोक्ता वस्तुओं के उपभोग का भी आदी हुआ है, तब क्या यह माना जाए कि पुरुषो की आमदनी इतनी बढ़ गर्इ कि परिवार की गाड़ी खींचने के लिए उन्हें महिलाओं की आमदनी की जरुरत ही नहीं रह गर्इ और घर का बजट आर्थिक रुप से पुख्ता होता चला गया। ऐसा यदि बाकर्इ में है तो यह सिथति आशा व उत्साहजनक है, लेकिन आर्थिक समृद्धि और खाध सुरक्षा के परिप्रेक्ष्य में इन आंकड़ों को विश्वसनीय नहीं माना जा सकता ? ये आंकड़े गरीबी की उलझी और झूठी तस्वीर ही पेश कर रहे हैं।

यहां सवाल उठता है कि सरकार अपनी ही गरीब व लाचार जनता के साथ फरेब क्यों कर रही है, जिससे गरीबी की वास्तविकता को छिपाने अथवा टालने की जरुरत पड़े ? दरअसल अर्थशास्त्री दांडेकर व रथ और बगीचा सिंह व मिन्हास तक गरीबी का आकलन आहार में मौजूद पोषक तत्वों के आधार पर किया गया। मसलन शहरी व्यक्ति की आय इतनी हो कि वह 2100 कैलोरी और ग्रामीण व्यक्ति 2400 कैलोरी शरीर को उर्जा देने लायक पोषक तत्व खरीद सके। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद भी कहती है कि स्वस्थ्य व्यक्ति के लिए औसत 2800 कैलोरी उर्जा की जरुरत रहती है। इसे आधार बिंदु माना जाए तो प्रत्येक परिवार के लिए 50 से 65 किलोग्राम अनाज, 6 से 8 किलोग्राम दाल और 3 से 5 किलोग्राम तेल मिलना चाहिए। खाधाान्न की यह उपलब्धता केवल उदरपूर्ति से जुड़ी है, जबकि मनुष्य की बुनियादी जरुरतें उदरपूर्ति के  इतर भी हैं। लिहाजा गरीबी के मानदण्ड की इस प्रचलित कैलोरी आधारित अवधारणा को बदला गया और गरीबी मापने की नर्इ पद्धति विकसित हुर्इ, जिसमें पोषक खाधान्न के साथ, रसोर्इ पकाने के लिए र्इंधन, बिजली कपड़े और जूते, चप्पल शामिल किए गए। 2005 में सुरेश तेंदुलकर द्वारा किए गए गरीबी के आकलन का यही आधार था। तेंदुलकर रिपोर्ट के अनुसार 41 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो जीने के अधिकार से वंचित रहते हुए भुखमरी के दायरे में जीने को अभिशप्त हैं। ये आंकड़े इस हकीकत के निकट हैं कि देश में 40 फीसदी लोग भूखे सोते हैं। इस समिति ने तय किया था कि 41.8 प्रतिशत आबादी मसलन 45 करोड़ लोग प्रतिमाह, प्रति व्यक्ति 447 रुपए में बमुशिकल गुजारा कर रहे हैं। सात साल बाद इस आय वर्ग के लोगों की आमदनी में महज 74.44 रुपए की बढ़ोत्तरी हैरान करने वाली है। 17 और 23 रुपए में आदमी क्या खाये और क्या निचोड़े ? हमारा अब तक गरीबी मापने का पैमाना 14 रुपए से ज्यादा और 25 रुपए कम आय वाले व्यक्ति को गरीब मानने का रहा है। यहां सवाल उठता है कि भारत सरकार जब अधोसंरचना पुख्ता करने की दृष्टि से यातायात, शिक्षा, चिकित्सा और पर्यटन के क्षेत्रों में अंतराश्टीय मानक अपनाने की होड़ में लगी है तो फिर गरीबी को क्यों नहीं अंतरराश्टीय आय के पैमाने से आंका जाता ? यह पैमाना सवा डालर मसलन 80 रुपए प्रतिव्यक्ति, प्रतिदिन की आय से जुड़ा है, जबकि हम हैं कि गरीबी को 27.20 से 33.33 रुपए के बीच ही अटकाए हुए हैंं। जाहिर है, योजना आयोग गरीबी की बजाय गरीबों की जिंदगी ही मिटाने का पैमाना निर्धारित करने के गुणा-भाग में लगा हैं।

 

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