लेखक परिचय

गंगानन्द झा

गंगानन्द झा

डी.ए.वी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत होने के पश्चात् चण्डीगढ़ में गत पन्‍द्रह सालों से रह रहे गंगानंद जी को लिखने पढ़ने का शौक है।

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गंगानन्द झा

एक घिसीपिटी बात ही दुहराई जाएगी अगर हम कहें कि आज के काल-खण्ड की तस्वीर की रूपरेखा प्रौद्योगिकी के बगैर नहीं बनाई जा सकती। इस आलेख के जरिए हम प्रोद्योगिकी के विकास के एक पहलू की चर्चा करेंगे। प्रौद्योगिकियाँ अपनी प्रारम्भिक अवस्था में काफी जटिल रहा करती हैं, लेकिन अन्ततोगत्वा सभी कामयाब प्रौद्योगिकी कम दृष्टिगोचर और अधिक महत्वपूर्ण होती हुई रोजमर्रा की जिन्दगी की पृष्ठभूमि में इस प्रकार घुल मिल जाती हैं कि प्रौद्योगिकी के रूप में उनकी पहचान फीकी पड़ जाती है, जैसा कि बिजली तथा रेल के साथ हुआ है, और । हालाँकि सूचना प्रौद्योगिकी की तरह की चमत्कारिक प्रौद्योगिकी पहले कोई भी प्रौद्योगिकी नहीं हुई, पर फिर भी  इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि अन्य कई एक जटिल प्रौद्योगिकियाँ रही हैं जिन्हें सरल होने की जरूरत पड़ी थी। जो कॉर्न, जो स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में इतिहास के प्राध्यापक थे, के अनुसार घड़ियाँ, जो सन 1820 ई.के दशक में प्रकट हुईं, जटिल प्रौद्योगिकी का पहला उदाहरण, थीं। शुरु में घड़ियाँ उपभोक्ता-गाइड के साथ बेची जाती थीं, जिनमें निर्देश रहते थे , अपने उपकरण को कैसे स्थापित एवम् विनियमित करें। फिर सन 1840 ई. में सिलाई मशीन का आगमन हुआ, उसके साथ 40 पन्नों की निर्देशिका पुस्तिका रहती थी जिसमें विशद निर्देश रहा करते थे। सन दो पीढ़ियों के बाद सन 1880 ई. में व्यापार-जगत को इतमीनान हुआ कि सिलाई मशीन का इस्तेमाल करना किसी भी औरत के लिए आसान है।

लगभग इसी समय तकनीकी जटिलता में वृद्धि ने गति पकड़ी। बिजली के साथ नए उपकरणों का प्रादुर्भाव हुआ। थॉमस एलवा एडिसन ने सन 1977 ई. में फोनोग्राफ का ईजाद किया। विख्यात कम्प्यूटर डिजाइन गुरु डोनैल्ड नॉर्मैन के अनुसार हालाँकि एडिसन की इंजिनियरिंग प्रतिभा असामान्य थी, विपणन(marketing) के मामले में वे मंद-बुद्धि थे। अपने पहले फोनोग्राफ के उपयोग के सम्बन्ध में उनके दिमाग में कोई विचार नहीं था। कई दशकों तक वे अपने उपकरण में काफी गुणकारी इंजिनियरिंग समाधानों के साथ हेराफेरी करते रहे।  लेकिन फोनोग्राफ को बाजार और इस्तेमाल के लिए उपयुक्त होने में एक पीढ़ी तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। जब एक नए प्रतिद्वन्द्वी की हैसियत में एमिल बर्लिनर, का उदय हुआ। बर्लिनर ने फोनोग्राफ को इसतेमाल के लिए आसान और एक मकसद (संगीत बजाने) दिया। एडिसन की कम्पनी लड़खड़ा गई जबकि बर्लिनर की कम्पनी परवान चढ़ती गई और फोनोग्राफ्स सर्वव्यापी हो गए। ये पहले ग्रामोफोन अथवा विक्ट्रोला कहे जाते रहे और अन्त में इनको रेकॉर्ड प्लेयर के नाम से जाना गया।

कार एक और जटिल प्रोद्यौगिकी थी, जिसका प्रभाव और भी अधिक गहरा असर हुआ है।  मिस्टर कॉर्न के मत में, बीसवीं सदी के प्रारम्भ में आई पहली कारें प्रधानतः बोझ और चुनौती थीं। कार को ड्राइव करने की कुशलता हासिल करने के लिए उसको एक कुशल मेकैनिक के हुनर की भी जरूरत रहती थी। कार चलते चलते अक्सर बिगड़ जाया करती थीं।

कार का इस्तेमाल करना बीसवीं सदी के तीसरे दशक तक तुलनात्मक रूप से सहज और बाजार के लिए प्रस्तुत हो चला था । विशेष कर दो चीजों  के कारण ऐसा सम्भव हुआ था। कार के ले मूलभूत व्यवस्था का बढ़ना, फैलना, और आखिर में सर्वव्यापी हो जाना पहली बात थी। अच्छी सड़कों, पेट्रोल स्टेशनों और मरमम्त के लिए गैरेजों का विकास इनमें शामिल हैं। तथा दूसरी बात थी ड्राइवर से प्रोद्यौगिकी को छिपाने की कार निर्माताओं की बढ़ती हुई कुशलता।  इस सरलीकरण की विडम्बना यह हुई कि कार का भीतरी भाग अत्य़धिक जटिल हो गया , क्योंकि जो काम अभी तक ड्राइवरों को करने होते थे, अब वे स्वचालित हो गए थे। अब ड्राइवर को  काफी आसानी हो गई। उसे बस इग्निशन की घुमाना,एक्सेलेटर, ब्रेक,पर अपने पाँव रखना और गियर बदलना होता था। सन 1940 के बाद जब स्वचालित ट्रांसमिशन की शुरुआत हुई, तो गियर बदलना भी अनिवार्य नहीं रह गया।

बिजली की प्रौद्योगिकी एक और उदाहरण है। इसके प्रारम्भिक दिनों में इसका खर्च वहन करने में समर्थ परिवार और कम्पनियाँ अपना निजी जेनेरेटर रखती थीं, जिसका संचालन करना एक पूर्णकालिक काम हुआ करता था। ’’Does it matter?,’’ नाम की किताब के लेखक निक कार्र लिखते हैं,बीसवीं सदी के शुरुआती दिनों में अधिकतर कम्पनियों में ‘’वाइस प्रेसिडेंट आफ एलेक्ट्रिसिटी’’ का एक वरीय प्रबंधन पद हुआ करता था ,जो आज के चीफ इनफॉर्मेशन ऑफिसर और चीफ टेकनिकल ऑफिसर के समकक्ष है। लेकिन पचास साल से भी कम समय में बिजली ग्रिड्स के माध्यम से उपलब्ध होने लग गई तो जेनेरेटर्स और वाइस प्रेसिडेण्ट्स गायब हो गए। अब उपभोक्ता को केवल पावर सॉकेट्स से सरोकार रह गया।इन प्रौद्योगिकियों के क्रम-विकास में आज के सूचना उद्योग के लिए कुछ सीख है।  श्री नॉर्मन के अनुसार पहला अवलोकन है कि किसी प्रौद्योगिकी के विकास के प्रारम्भिक दिनों में इंजिनियर नियंत्रक और उनके क्रेता प्रारम्भिक अनुकूलक होते हैं। लेकिन व्यापक बाजार ही बाद का और निर्णआयक अनुकूलक होता है, यही वजह है कि विरल प्रतिभाशाली इंजिनियर थॉमस एल्वा एडिसन व्यापार में बुरी तरह नाकामयाब हुए।

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