लेखक परिचय

ब्रह्मानंद राजपूत

ब्रह्मानंद राजपूत

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कानून भारतीय संविधान  के अनुसार काम करता है। लेकिन  आज भी भारत में कुछ ऐसे कानून हैं जो कि भारतीय संविधान के बिलकुल इतर काम करते हैं, जो कि धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर भारतीय संविधान की धज्जियाँ उड़ाते  हैं। बेशक धार्मिक स्वतंत्रता  का अधिकार संविधान के मौलिक अधिकारों में शामिल हो, लेकिन इसके  भी अपने दायरे और सीमाएं होनी  चाहिए। हर चीज में धार्मिक स्वतंत्रता घुसेड़ना भारतीय संविधान की जड़ों को खोखला करती है। भा रत देश में हर धर्म के लोग रहते हैं। बहुसंख्यक हिन्दू भी रहते  हैं और अल्पसंख्यक मुस्लिम सिख  और ईसाई भी। हिंदू सिविल लॉ के  तहत हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध आते हैं। जबकि मुस्लिम, ईसाई और  पारसी समुदाय के अपने-अपने पर्सनल लॉ है, जिस देश का कानून भारतीय संविधान के अनुसार चलता हो  वहां पर ऐसे रूढ़िवादी कानूनों  का क्या औचित्य है। हमारे भारतीय संविधान में अनुच्छेद 44 के तहत समान नागरिक संहिता को लागू करना राज्य की जिम्मेदारी बताया  गया है, लेकिन ये आज तक देश में  लागू नहीं हो पाया। समान नागरिक संहिता का मतलब है भारत में रहने वाले प्रत्येक नागरिक के लिए समान यानी एक जैसे नागरिक कानून।  देश के संविधान को लागू हुए  65 साल से ज्यादा हो गए लेकिन  भारत की सरकारें आज तक भारत में  रहने वाले प्रत्येक नागरिक के  लिए समान यानी एक जैसे नागरिक कानून नहीं बना पायी हैं।

समान नागरिक संहिता का विरोध करने वाले लोग सामान नागरिक कानून  को धार्मिक स्वतंत्रता के खिला फ बताते हैं। जो की तर्कहीन लगता है। समान नागरिक संहिता का वि रोध करने वाले लोगों का येमानना  है कि देश में सामान नागरिक का नून लागू हो जाने से देश में हि न्दू कानून लागू हो जाएगा, जो की गलत प्रचार ह।ै लेकिन हकीकत यह  है कि समान नागरिक संहिता एक ऐ सा कानून होगा जो हरधर्म के लो गों के लिए बराबर होगा और उसका  धर्म से कोई लेना-देना नहीं हो गा। और समान नागरिक कानून पूरे  तरीके से संविधान का पालन करेगा । अगर देश में समान नागरिक संहि ता का पालन हो तोसभी धर्मों हि न्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई के लि ए एक समान कानून होगा। समान ना गरिक संहिता में सभी धर्मों के  शादी, तलाक, गोद लेना और जायदाद  बंटवारे में सबके लिए एक जैसा  कानून होगा।फिलहाल कई धर्म के लो ग इन मामलों का निपटारा अपने धर् म के निजी कानूनों के तहत करते  हैं। मुस्लिम धर्म के लोग देश में अलग कानून चलाते हैं जो मुस्लि म पर्सनल लॉ बोर्ड लागू करता है । आज भीमुस्लिम समाज के लोग इसी  रूढ़िवादी कानून को ढो रहे हैं।  असल में कहा जाए तो मुस्लिम समा ज के धर्मगुरु धार्मिक स्वतंत् रता के नाम पर मुसलामानों को पर् सनल लॉ का पालन करने के लिए बा ध्य करतेहैं। देखा जाए तो मुस् लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के ज्यादा तर कानून मुस्लिम महिलाओं पर अत् याचार की पराकाष्ठा हैं।

आजकल मुस्लिम समाज में तीन तलाक  के मुद्दे पर इन दिनों देश में  खूब बहस चल रही है और इसे हटा ने की मांग की जा रही है। मु सलमानों में तलाक मुस्लिम पर् सनल लॉ यानी शरिया के जरिए होता  है।यह बहुत ही रूढ़िवादी कानून  है आज देश का कानून भारतीय संवि धान के अनुसार चलता है फिर भी मु स्लिम महिलाएं धार्मिक स्वतंत् रता के नाम पर इन कानूनों के जरि ए उन पर हो रहे अत्याचारों को झे लरही हैं। आजादी के बाद हिन्दू  कानून में संविधान के अनुसार बद लाव किया गया और आज तक हिंदुओं  के शादी, तलाक, गोद लेना और जा यदाद बंटवारे सब भारतीय संविधान  के दायरे में होते हैं। लेकिनआ जादी के बाद संविधान लागू हो गया संविधान लागू होने के बाद भी दू सरे धर्मों के निजी कानूनों में  कोई बदलाव नहीं हुआ। तमाम रा जनैतिक पार्टियां वोट बैंक की रा जनीति के कारण इन निजी कानूनोंप र अपनी कोई राय नहीं रखती है और  किसी भी बहस में नहीं पड़ना चा हती हैं। क्योंकि अगर वो इन रू ढ़िवादी कानूनों का विरोध करेंगीं तो उनके वोट बैंक को नुक्सान हो गा। जिसका नतीजा ये है कि देशआज  भी धर्मों के अनुसार अलग-अलग का नूनों की जंजीरों में जकड़ा हुआ  है। आज देश को इन जंजीरों से बा हर निकलने की जरुरत है और जर् मनी, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, यूना इटेड किंगडम इत्यादि देशों कीतर ह समान नागरिक कानून लागू करने  की जरुरत है।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के का नून से मुस्लिम महिलाओं को तमाम  अत्याचार झेलने पड़ते हैं। तीन  तलाक तो इसकी पराकाष्ठा है। साथ  ही साथ मुस्लिम पुरुष समाज को  एक पत्नी होते हुए बहुविवाह कीआ जादी भी मुस्लिम महिलाओं पर अत् याचार है। आज मुस्लिम समाज की आ धुनिक सोच की महिलाएं इन कानूनों के विरोध में आगे आ रही हैं। य ह काबिलेतारीफ है। उनके साहस को  मुस्लिम समाजसहित सम्पूर्ण देश  को समर्थन करना चाहिए।  अंग्रे जों के जमाने में हिन्दू सती-प् रथा तथा बाल-विवाह पर बंदिश के  कानून का हिंदू कट्टरपंथियों द् वारा विरोध हुआ था। आजादी के बा द अंबेडकर जैसेप्रगतिशील और आधु निक सोच रखने वाले लोगों के का रण हिंदू सिविल कानून भी कट् टरपंथियों के विरोध के बावजूद पा रित हुआ। ऐसे ही आज मुस्लिम धर् म सहित अन्य धर्मों में अंबेडकर  जैसे प्रगतिशीलऔर आधुनिकता का  अनुकरण करने वाले लोगों की जरु रत है। अगर देश में सामान नागरि क संहिता नहीं तो कम से कम मुस् लिम सिविल कानून तो लागू हो। जि ससे की मुस्लिम समाज सहित अन्यअ ल्पसंख्यकों को रूढ़िवादी कानूनों के बोझ न दबना पड़े। अगर सरकार  समान नागरिक संहिता के मुद्दे प र फीडबैक मांगती है तो इसे तीन  तलाक से जोड़ कर नहीं देखा जाना  चाहिए। क्योंकि तीन तलाकऔर सामा न नागरिक संहिता दोनों अलग अलग  चीजें हैं। मुस्लिम समाज में मु ख्य मुद्दा लैंगिक न्याय का और  महिलाओं के खिलाफ भेदभाव खत्म क रने का है। तीन तलाक के मुद्दे  को समान नागरिकसंहिता के मुद्दे  के साथ उलझाना गलत है। देश का  असली मूड यह है कि लोग इस तीन त लाक को खत्म करना चाहते हैं। लो ग किसी धर्म के आधार पर महिलाओं  के खिलाफ भेदभाव नहीं चाहते। मु स्लिमसमाज में मुद्दे लैंगिक न् याय, अपक्षपात और महिलाओं के सम् मान के हैं। जिन्हें मुस्लिम पर् सनल लॉ बोर्ड और तुष्टिकरण करने  वाली राजनैतिक पार्टियां समान  नागरिक संहिता से जोड़कर अहम मु द्दे सेध्यान भटकाना चाहती हैं।  अगर विधि आयोग समान नागरिक सं हिता पर समग्र चर्चा करा रहा है  तो इस पर किसी भी धर्म विशेष के लोगों को आपत्ति नहीं होनी चा हिए। बल्कि प्रत्येक धर्म के लो गों कोअपनी बेबाक राय रखनी चाहि ए। विभिन्न संगठनों और धर्मगुरु ओं की जगह सभी धर्मों की युवा ज नता को इस चर्चा में अधिक से अधि क भागीदारी करनी चाहिए और देश के लिए अपनी राय बतानीचाहिए। क्यों कि किसी भी मसले का हल चर्चा हो ता है। अगर केंद्र एक स्वस्थ्य  चर्चा कराना चाहता है तो इससे कि सी को परेशानी नहीं होनी चाहिए।

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