लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव
भारतीय रेल विश्व का सबसे बड़ा व्यावसयिक प्रतिश्ठान है, लेकिन इसकी सरंचना हरेक स्तर पर विश्वस्तरीय नहीं है। अलबत्ता इसे विश्वस्तरीय बनाने की कोशिशें जरूर पटरी यथार्थ रूप में उतरने लगी हैं। मसलन सुविधा संपन्न तेज गति की गतिमान, प्रीमियम और बुलेट ट्रेनों की बुनियाद रखी जाने लगी है। दिल्ली-आगरा के बीच शुरू हुई गतिमान एक्सप्रेस इस दिशा में पहली शुरूआत थी, जो कामयाबी की दौड़ भर रही है। दु्रत गति की दूसरी रेल का अभ्यास टेल्गो ट्रेन के रूप में बरेली से मुरादाबाद के बीच हुआ है। स्पेन से आई इस रेल का यह पहले चरण का परीक्षण है, जिसमें विदेशी डिब्बों को भारतीय रेल के देशी इंजन से पटरियों में कोई बदलाव किए बिना 115 किमी की रफ्तार से दौड़ाया गया। पहले दौर की इन शुरूआतों से साफ हुआ है कि नरेंद्र मोदी सरकार की रेलवे से जुड़ी घोषणाएं हवा-हवाई नहीं हैं। उन्हें जमीन पर उतारने की पहलें गंभीरता एवं चरणबद्ध तरीके से अमल में लाई जा रही हैं। इन उम्मीदों के हकीकत में बदल देने से यह आस भी पुख्ता हुई है कि आने वाले सालों में अहमदाबाद से मुबंई के बीच बुलेट-ट्रेन भी चलती दिखाई देने लग जाएगी।
इस समय राजग सरकार द्वारा पटरी पर उतारी गई गतिमान एक्सप्रेस देश की सबसे तेज गति से दौड़ने वाली रेल है। सेमी हाईस्पीड यह रेल दिल्ली-आगरा के बीच 160 किमी प्रति घंटा की गति से चलती है। 188 किमी का यह सफर तय करने में गतिमान एक्सप्रेस महज 100 मिनट का समय लेती है। गतिमान की अधिकतम गति 160 किमी है। जबकि टेल्गो की अधिकतम गति 200 किमी प्रति घंटा रहेगी। भारतीय रेल पटरियों में बिना कोई बदलाव किए, इतनी गति से यह रेल इसलिए चल पाएगी, क्योंकि इसके सभी 9 डिब्बे हल्के वजन वाली एल्युमिनियम धातु से बने हैं। स्पेन से ये डिब्बे अलग-अलग कल-पुर्जों में जहाज द्वारा लाए गए हैं। इन्हें आइडीएसओ के इंजीनियरों ने टेल्गो के इंजीनियरों के साथ साझा कार्यक्रम के तहत असेंबल किया। जब डिब्बे तैयार हो गए तो इनके ट्राॅयल के लिए बरेली से मुरादाबाद के बीच, 90 किमी की लंबाई वाला ट्रेक चुना गया। दरअसल इस ट्रेक पर रेलों की आवाजाही कम है। इस ट्रेक पर पहले चरण का परीक्षण पूरा होने के बाद अब दूसरे चरण का परीक्षण पलवल-मथुरा के बीच किया जाएगा। फिलहाल इस रेल में सुरक्षा की दृष्टि से अहतियात बरतते हुए औसत मानव वजन के रेत से भरे बोरे रखकर परीक्षण किया गया है। तीसरे चरण में इसे दिल्ली से मुंबई के बीच पूरी रफ्तार से दौड़या जाएगा। इस परीक्षण के सफल होने के उपरांत ही यह तय होगा कि इसे रेलवे के किस मार्ग पर चलाया जाए।
टेल्गो में कई खूबियां हैं। पहली खूबी तो यही है कि इसे भारत में ही बने रेल इंजन सफलतापूर्वक चलाने में सक्षम हैं। इसलिए स्पेन से इंजन आयात करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। दूसरी खूबी यह है कि इन डिब्बों को भारत में मौजूद पटरियों में बिना कोई बदलाव किए उतार दिया जाएगा। मसलन टेल्गो के लिए बुलैट ट्रेन की तरह अलग से खर्चीले ट्रेक निर्माण की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसकी तीसरी खासियत है कि डिब्बो को प्लेटफाॅर्म की ऊंचाई के मुताबिक हाइड्रोलिक आधारित लिफ्ट पद्धति से ऊपर-नीचे कर दिया जाएगा। इस अद्वितीय सुविधा से खासतौर से बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को चढ़ने-उतरने में आसानी होगी। प्लेटफाॅर्म के ऊॅचा या नीचा होने से उतरने-चढ़ने में जो दुर्घटनाएं होती हैं, उनमें आशातीत कमी आएगी। टेल्गो में 30 फीसदी ऊर्जा की बचत होगी। इसके डिब्बों की एक विलक्षणता यह भी है कि दुर्घटना होने पर ये डिब्बे एक-दूसरे पर चढ़ते नहीं हैं। साफ है, दुर्घटना होने पर बड़ी जनहानि से बचा जा सकेगा।
दरअसल, डिब्बों के एल्युमीनियम से निर्मित होने के कारण एक तो ये भारी नहीं हैं, इस कारण एक डिब्बे में केवल चार पाहिए लगे हैं। जबकि भारत में र्निमित डिब्बों में आठ पाहिए लगे होते हैं। सामान्य स्थिति में रेल के पहियों को हाइड्रोलिक दबाव से नियंत्रित किया जाता है, किंतु आपात-स्थिति में टेल्गो रेल को रोकने के लिए डिस्क ब्रेक भी लगे हैं। जिससे आपातकाल में ब्रेक लगने पर चंद सेंकड में रेल रुक जाती है। रुकते हुए रेल में झटका नहीं लगता है, इस कारण एक तो डिब्बे पटरी से नहीं उतरते हैं, दूसरे एक-दूसरे पर चढ़ नहीं पाते हैं।
इसे रेल मंत्री सुरेश प्रभु और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यावसायिक चतुराई ही माना जाएगा कि फिलहाल ये डिब्बे खरीदे नहीं गए हैं। अलबत्ता स्पेन की कंपनी टेल्गो ने मुफ्त में ही डिब्बे बतौर ट्रायल भारत भेजे हैं। ऐसा शायद भारत में पहली बार हुआ है कि जब किसी विदेशी कंपनी ने करोड़ों की लागत से निर्मित किसी वाहन को ट्रायल के लिए भारत भेजा है। वरना भारत में तो यह परंपरा रही है कि अग्रिम धनराशि जमा करने के बावजूद वस्तुएं नहीं आई हैं। अगस्ता वैस्टलैंड हेलिकाॅप्टरों की खरीद के लिए इटली की फिनमैकेनिका कंपनी से जो सौदा हुआ था,उसमें 12 हेलिकाॅप्टरों की खरीद के लिए अग्रिम धनराशि खेप आने से पहले ही चुका दी गई थी। बाद में दलाली की जानकारी सामने आने के बाद इस सौदे को रद्द कर दिया गया था, किंतु अग्रिम भुगतान का क्या हुआ, स्पष्ट नहीं है। हालांकि अब इस कंपनी और इसकी सहयोगी कंपनियों को काली-सूची में डालने की प्रक्रिया जरूर तेज हो गई है। खैर, टेल्गो का ट्रायल हरेक परीक्षण में खरा उतरता है, तब इसे खरीदने पर विचार होगा और खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता अपनाई जाएगी। हालांकि टेल्गो की जिस तरह से खूबियां सामने आई हैं, उनके चलते इसका खरीदा जाना लगभग तय है।
यह संभावना भी है कि ट्रायल के बाद टेल्गो के डिब्बे खरीद लिए जाते हैं तो पहले इन्हें राजधानी और शताब्दी रेलों में लगाया जाएगा। अभी इनमें एलएचबी कोच लगाए जा रहे हैं। टेल्गो-डिब्बों के इस्तेमाल से रेल की गति में अंतर आएगा। एयरोडायनामिक कोचों के उपयोग से रेलों की गति 50 फीसदी तक बढ़ सकती है। दिल्ली-मुंबई के बीच राजधानी की औसत गति 85 किमी प्रति घंटा है, जगकि टेल्गो के डिब्बे लगने के बाद यही औसत गति 125 किमी प्रति घंटे तक हो सकती है। ऐसे में दिल्ली से मुंबई के बीच का जो सफर अभी 17 घंटे में पूरा होता है, वह करीब 12 घंटे में पूरा होने लग जाएगा। इन डिब्बों के उपयोग से धन की बचत भी बड़ी मात्रा में होगी। एलएचबी कोच के निर्माण की लागत 2.75 करोड़ रुपए पड़ती है, जबकि टेल्गो कोच की लागत करीब 1.70 करोड़ रुपए आती है। लेकिन यहां दुविधा यह है कि भारत में किए जा रहे डिब्बों के निर्माण की लागत भले ही ज्यादा हो, लेकिन इनके निर्माण में बड़ी संख्या में कुशल और अकुशल लोगों को रोजगार मिला हुआ है। इस लिहाज से रेलवे समेत भारत सरकार को यह ख्याल रखने की जरूरत है कि टेल्गो कोचों का इतनी बड़ी संख्या में आयात न किया जाए कि भारतीय डिब्बों के कारखाने ही बंद होने लग जाएं। विदेशी कारों के आयात व उनका भारत में निर्माण का सिलसिला शुरू होने के बाद, नतीजा यह निकला कि एंबेसडर कार बनाने वाला कारखाना ही बंद हो गया। इसलिए आम आदमी के रोजगार बना रहे, यह पहली प्राthमिकता होनी चाहिए।

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