लेखक परिचय

प्रो. बृजकिशोर कुठियाला

प्रो. बृजकिशोर कुठियाला

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति हैं संपर्कः कुलपतिः माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, विकास भवन, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र)

Posted On by &filed under राजनीति.


शब्द तो ब्रह्म ही है, परन्तु कुछ लोग शब्दों को भ्रम बना लेते हैं। हमारे देश के एक प्रतिष्ठित राजनेता ने पिछले दिनों एक अन्य उभरते हुए राजनेता को गंगा में फेंक देने की घोषणा की। वैसे तो भारतीय संस्कृति में गंगा मोक्ष का द्वार है और गंगा की शरण में जो भेजे उसे शुभचिंतक ही मानना चाहिए। परन्तु जिस संदर्भ में यह वाक्य कहा गया उसके आगे व पीछे नकारात्मकता ही थी, इसलिए गंगा में फेंक देने का अर्थ यह लगाया गया कि श्री राहुल गांधी को राजनीति से विदाई दे देनी चाहिए। सार्वजनिक संवाद में इस तरह की घोषणाएं उचित हैं या अनुचित यह तो श्रोता, पाठक व दर्शक स्वयं तय करेंगे। परन्तु विरोधियों के बीच में संवाद की मर्यादाएं तो राजनीतिज्ञ ही तय करेंगे।

कश्मीर के विषय पर एक सुप्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त लेखिका एवं सामाजिक कार्यकर्ता का बयान आजकल आम चर्चा का विषय है। लगभग पूरा का पूरा सामाजिक संवाद बयान के विरोध में है। परन्तु उसी सभा में लेखिका ने अपने देश की जो व्याख्या की वह भी भ्रमित मस्तिष्क की द्योतक है। लेखिका ने अपने देश को ‘भूखे नंगों का देश’ कहा। एक अर्द्ध सदी से पूर्व भारत की ऐसी व्याख्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित थी। उस दौर में फिल्मकार पैसा फेंकते और जब गरीब उस पैसे को उठाने के लिये छीना झपटी करते थे तो उसकी फिल्म बनाकर देश विदेश में भारत की छवि का निर्माण करते थे, पर आज ऐसा नहीं है। भारतीय अर्थशास्त्रियों और कूटनीतिज्ञों से अधिक विदेशी विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में जो पिछले 60 वर्षों में विकास किया है, वह अद्वितीय है, क्योंकि यह विकास प्रजातंत्र के वातावरण में हुआ है।

आज भारत के करोड़ों युवक-युवतियां पूरे विश्व में अनेक तरह के तकनीकी व सृजनात्मक कार्यों में लगे हैं। आम समृद्धि बढ़ी है, देश में नवसृजन का वातावरण चारों ओर है। कुछ भूख और नंगापन भी है, परन्तु हमारी दृष्टि कहां है ? क्या विकास की सकारात्मकता को प्रसारित करके सुख और प्रेरणा का वातावरण बनाना है या निर्धनता को असफलताओं के भ्रम के रूप में प्रस्तुत करना है। लेखिका में कहीं न कहीं दृष्टि दोष है। पाक अधिकृत कश्मीर के लोगों पर फौजी अत्याचार और मानवाधिकारों का उल्लंघन उन्हें नहीं दिखता है और शहीद सैनिकों के शव उन्हें कुछ ही जातियों के दिखते हैं। वे चश्मा भी पहनती है, परन्तु खोजी पत्रकारिता का विषय यह होना चाहिए कि उनका चश्मा कहां बना है ? और उसके लैंस किस रंग के हैं ? उनका बचपन कैसा था ? और किस प्रकार से उन्हें ‘बुकर सम्मान’ मिला। यह भी सामान्य जन को पता लगाना चाहिए।

शब्दों का ब्रह्म होना या भ्रम होना, बोलने व सुनने वालों पर तो निर्भर है ही परन्तु संदर्भ भी महत्वपूर्ण होता है। भारत के एकमात्र फील्ड मार्शल ज. मानेक शा ने पाकिस्तानी सेना के लिए अंग्रेजी के शब्द ‘बैन्डीक्यूट्स’ का प्रयोग किया था। उनसे पाकिस्तान सेना की बढ़ती हुई संख्या के बारे में पूछा गया था। यह शब्द अधिक प्रचलित नहीं है और अधिकतर लोगों ने इसे शब्द कोष में देखा। ‘बैन्डीक्यूट्स’ वो जंगली चूहे हैं जो खेतों में पाये जाते हैं। शब्द ने ब्रह्म होने को सिद्ध किया और भ्रम की कोई गुंजाइश नहीं है। इसी तरह से लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान, जय किसान’ की घोषणा करके सारे देश को एक माला में पिरो दिया था। श्रीमती इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा देकर राष्ट्र के सम्मुख एक केन्द्रित उद्देश्य रखा था और कई वर्षों तक योजना बनाकर इस लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास हुआ। परन्तु राजनीति के ही कुछ खिलाड़ियों ने गरीबी शब्द से आखरी ‘ई’ की मात्रा हटाकर शब्दों का भ्रम पैदा कर दिया।

हिटलर ने शब्द जाल बिछाकर ही उस समय की जर्मन जनता को इतना भ्रमित कर दिया था कि उन्हें हिटलर ही ब्रह्म है का भ्रम हो गया। उनके जनसम्पर्क मंत्री गोयबल्स तो शब्दों के भ्रम के विशेषज्ञ थे। बार-बार असत्य बोलने से भ्रम भी सत्य के रूप में स्थापित हो जाता है के सिद्धांत का उन्होंने बखूबी प्रयोग किया। आज भी इस सिद्धांत के प्रयोग के कई उदाहरण सामने आते हैं। गांधी की हत्या में एक विशेष संस्था का हाथ नहीं है, यह कई बार न्यायालयों में सिद्ध हो चुका है, परन्तु राजनीति के खेल में इस असत्य को भी कई बार दायित्ववान राजनीतिज्ञ प्रयोग करते रहे हैं। हमारी दृष्टि का रंग कोई भी हो परन्तु भगवा रंग को आंतकवाद से जोड़ना भी एक भ्रम जाल बुनने का ही प्रयास लगता है।

ऐसा नहीं है कि शब्दों का दुरूपयोग हर बार जानबूझकर ही होता हो, हाल ही में एक भारतीय उदघोषक ने अल्पज्ञानी होने के कारण अफ्रीका के एक देश के विषय में अपमानजनक टिप्पणी कर दी। परन्तु समय रहते उसने अपनी गलती को माना और देश के प्रतिष्ठित व्यक्ति को क्षमा मांगनी पड़ी। आस्ट्रेलिया के एक टेलीविजन उद्घोषक ने भारतीय खिलाड़ी के बारे में अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया और उसे अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। एक भूतपूर्व मंत्री ने तो राष्ट्रमण्डल खेलों के असफल होने की कामना सार्वजनिक रूप से कर डाली। वह महानुभाव आज अपने ही शब्दों के घाव सहला रहे हैं।

आधुनिक मानव समाज में तो शब्दों का अंतरताना हर समय अधिक से अधिक गहन हो रहा है। पूरा का पूरा मीडिया शब्दों का ही खेल है। चित्र होने के बावजूद भी शब्दों के बिना संचार व संवाद की स्थिति नहीं बनती। छोटे समूहों में सार्वजनिक वार्ता भी मीडिया के द्वारा विश्वव्यापी हो जाती है और एक शब्द का बाण अनेकों घाव करता है। शब्द मरहम का भी काम करते हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शब्दों ने बालक नरेन्द्र के उद्वेलित मन को शान्त किया और विवेकानन्द का जन्म हुआ। डॉक्टर व वैद्य के आशावादी शब्द ‘दवाई’ से अधिक प्रभावकारी हो जाते हैं। बुद्धिशील व्यक्ति शब्दों के द्वारा समाज में सुख, सहयोग और समरसता सजाता है और यदि बुद्धि कम हुई या भ्रमित हुई तो अपने ही साथी को गंगा में फेंकने का विचार आता है और अपना ही देश भूखा नंगा नजर आता है।

किसी भी समाज में शब्दों को तीखे चुभते और विध्वंशकारी बाणों के रूप में प्रयोग करने वाले लोग तो रहेंगे ही, परन्तु क्या इन शब्द बाणों को प्रचालित व प्रसारित कर उनकी घाव बनाने की क्षमता को कई गुणा वृद्धि करने का प्रयास मीडिया को करना चाहिए ? कहीं न कहीं मीडिया को समाज का ध्यान तो रखना ही पडेगा कि वह अधिक भ्रमित व्यक्तियों द्वारा प्रसारित जहरीले शब्दों को सम्पादित करे या उनका वितरण करे?

( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति हैं)

संपर्कः कुलपतिः माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, विकास भवन, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र)

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz