लेखक परिचय

अभिषेक रंजन

अभिषेक रंजन

लेखक कैम्पस लॉ सेन्‍टर, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में एल.एलबी. (द्वितीय वर्ष) के छात्र हैं।

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सुशासन का मुखौटा ओढ़े आतंक-राज देखना हो तो आपका बिहार में स्वागत है! चौकिएगा मत! यह हकीक़त है, फिजूल की बयानबाजी नही. ज़मीनी सच्चाई और सरकारी आंकड़े इस बात की गवाही देते है कि बिहार अपराधियों के गिरफ्त में है, जहाँ आम लोग डरे-सहमे जीवन जीने को मजबूर है. न तो पुलिस सुनती है, न ही सरकार को इनकी सुध है.

हाल में जब हनीफ हिंगोरा अपहरण में बिहार का नाम आया तो कई लोगों ने इसे लालू-राज में होने वाले अपहरण की याद दिलाने वाली घटना बताई. जबकि सच यह है कि ऐसी घटनाएं बिहार में आम है. बिहार पुलिस की वेबसाइट(www.biharpolice.bih.nic.in) की माने तो संज्ञेय अपराधों की संख्या में डेढ़ गुना इजाफ़ा सुशासन राज में हुआ है. वर्ष 2005 में संज्ञेय अपराधों की संख्या 104778 थी जो वर्ष 2012 में बढ़कर 160271 हो चुकी है.

बात बिहार में होने वाले बहुचर्चित अपहरण की करे तो यह सुशासन के संरक्षण मिलने से यह कमने की वजाए लगातार बढ़ा है. वर्ष 2013 के अक्टूबर तक के आंकड़े यह बताते है कि बिहार में प्रतिदिन औसतन 15 लोगों का अपहरण हो रहा है. यह आंकड़ा वर्ष 2012, 2011, 2010 में क्रमशः 13, 12, 10 रहा है. 2005 में जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने थे, उस समय यह आंकड़ा मात्र 6 था. इससे साफ़ पता चलता है कि तथाकथित सुशासन राज में अपहरण उद्योग न केवल बढ़ा है, बल्कि खूब फला-फुला है.

इसी तरह महिला अपराधों से जुड़ी वारदातों का जिक्र करें तो सुशासन का चेहरा बड़ा घिनौना नजर आता है. आंकड़ों की माने तो बलात्कार से संबंधित अपराध बढ़ी है और लालू-राज से भी ज्यादा दर से सुशासन राज में महिलाओं की अस्मत लुटी जा रही है. वर्ष 2005 में जहाँ 973 बलात्कार की घटनाएं हुई थी, वही वर्ष 2013 के अक्टूबर माह तक बलात्कार का यह आंकड़ा कुल 972 हो गया है. किसी भी जिलें में चले जाए, ऐसा कोई दिन नही बीतता जब किसी महिला के साथ छेड़खानी, बलात्कार की वारदात संबंधी ख़बरें न पढ़ने को मिले. बिहार में नौजवान लड़कियों के अपहरण की बात करें तो इसमें लगभग 71 फीसदी काइजाफा देखा गया है. कई बार पुलिस लड़कियों से जुड़ी अपहरण के मामले में प्रेम-प्रसंग बताकर अपना पल्ला झाड़ लेती है.  हत्या से जुड़ी आंकड़ों की बात करें तो वर्ष 2005 में बिहार में 3423 हत्याएं हुई. वही जब हम 2012 में हुई हत्या के आंकडें देखते है तो पाते है कि यह संख्या बढ़कर 3566 हो गई. वर्ष 2013 के अक्टूबर तक 2902 हत्याएँ हो चुकी है. यानी कि प्रतिदिन के हिसाब से औसतन 10 हत्याएं बिहार में हो रही है. अगर बात चोरी की घटना की की जाए तो जहाँ वर्ष 2005 में प्रतिदिन 32 चोरी की वारदात हुई थी, वह अब 2013 के अक्टूबर तक प्राप्त जानकारी के मुताबिक औसतन प्रतिदिन 59 के आंकड़े को छू चुकी है. डकैती, लूट, रोड-डकैती, रोड-लूट, बैंक डकैती कम तो हुई है, लेकिन यह बदस्तूर जारी है. लालू-राज से तुलना करे तो कुछ 50 फीसदी तक, तो कुछ लगभग बराबरी के आंकड़ें  को छूती नजर आती है.

अपराध के इन आंकड़ों को पुरे भारत में होनेवाले अपराधों के परिप्रेक्ष्य में देखे तो हम पाते है कि हत्या, हत्या करने के प्रयास, अपहरण, डकैती के मामलों में सर्वप्रथम तीन राज्यों में शामिल है. पुरे देश में घूमकर सेक्युलर बनने और टोपी-तिलक लगाने की बात कहने वाले सुशासन बाबू के राज में होने वाले छोटे-मोटे दंगों की भी संख्या में जबरदस्त इजाफा हुआ है. वर्ष 2013 में अबतक लगभग 10 हजार दंगे हो चुके है. बात सूचना के अधिकार के लिए सक्रीय कार्यकर्ताओं की करे तो बिहार में सुशासन सरकार ने न केवल ऐसे कार्यकर्ताओं को हतोत्साहित किया है बल्कि इन्हें बेमौत मारते देख भी कुछ नही कर सकी. एक मीडिया रिपोर्ट की माने तो पिछले डेढ़ सालों में तक़रीबन 500 फर्जी मामले आरटीआई कार्यकर्ताओं पर दर्ज करवाए गए, जबकि 6 लोगों की हत्या हो गई.

दुखद तथ्य तो यह है कि आजकल बिहार में कई मामलों में शिकायत तक नही दर्ज करवा पाने की हिम्मत लोग जुटा पाते है तो कई मामले बिना किसी जाँच पर पहुंचे दफना दिए जाते है. बिहार में कई मामलों में अपहृत लोगों के अपहरणकर्ताओं के सुराग तक पुलिस नही ढूँढ पाती. वही दूसरी ओर, हत्यारे खुलेआम घूमते रहते है. जिन मामलों में पीड़ित पक्ष मजबूती से आवाज भी उठाते है, उन्हें न्याय नही मिलता, उल्टे धमकियों के साए में जीवन जीना पड़ता है. उदाहरण के तौर पर मुजफ्फरपुर जिलें में घटी हत्या और अपहरण से जुड़ी क्रमशः दो मामलों “नवरूणा अपहरण केस और रामकुमार ठाकुर हत्या केस” बिहार में सुशासन सरकार के पाखंड का पोल खोलती नजर आती है. नवरूणा अपहरण मामले में 469 दिन बीतने के बाद भी पुलिस की जाँच किसी नतीजे तक नही पहुंची है. वही रामकुमार ठाकुर की हत्या मामले में अबतक पुलिस हत्यारे तक पहुंचना तो दूर, केस में किसी भी आरंभिक नतीजे तक नही पहुंची.

इन सबके बावजूद, सुशासन का ढोल पीटने में कोई कोर कसर बाकी नही छोड़ते बिहार के सुशासन बाबू. सवाल उठता है कि बिहार में अगर लालू-राज जंगल राज था तो उसे अब सुशासन का आतंक राज क्यूँ न माना जाए!

crime data

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