लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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संदर्भः- मेनका गांधी का बयान-आतंकवाद फैलाने में काम आ रहा है पशुवध का धन

प्रमोद भार्गव

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री तथा पर्यावरणविद् मेनका गांधी का यह बयान चिंताजनक है कि पशुवध का पैसा देश में आतंकवाद को बढ़ावा देने के काम आ रहा है। गांधी ने यह बात बयानवीर नेताओं की तरह बिना किसी आधार के हवा में नहीं छोड़ी है,बल्कि उत्तर प्रदेश पुलिस के एक अध्ययन के आधार पर कही है। इसलिए इस बयान को गंभीरता से लेने की जरूरत है। जयपुर में जानवरों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध संस्थाओं के सम्मेलन ‘भारतीय प्राणी सुरक्षा संगठन‘ के कार्यक्रम में मेनका ने अपने भाषण में आगे कहा कि ‘पशुवध किसी धर्म से जुड़ा मसला नहीं है। इसमें बहुत पैसा है और हर धर्म से जुड़े लोग इस कारोबार में लगे है। मसलन हिंदू समाज के लोग भी पैसा बनाने के लालच में गाय मारकर मांस और चमड़ा बेचने का व्यापार में धड़ल्ले से कर रहे हैं। परोक्ष रूप से यह धंधा आतंकवाद के विस्तार के रूप में सामने आया है। इस खुलासे में पशुवध का आतंकवाद से जुड़ा पहलू जरूर नया है,किंतु पशु-वध की चिंता खेती-किसानी और दूध की उत्पादकता से भी जुड़ी है। लिहाजा इस नजरिए से भी दुधारू पशुओं का संरक्षण जरूरी है।

पशुवध से आतंकवाद को बढ़ावा किस हद तक मिल रहा है,इसका खुलासा तो अध्ययन की पूरी रिर्पोट बाहर आने के बाद होगा,लेकिन पालतू मवेशियों के मांस का निर्यात जिस तरह से बढ़ रहा है,उसके चलते देश में पशुधन की कमी अनुभव की जाने लगी है। इस परिप्रेक्ष्य में भी पशुवध एक चिंता का विषय है। सोलहवीं लोकसभा के चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे को उत्तर प्रदेश की एक जनसभा में यह कहकर तूल दिया था,‘उस सरकार को हटाना होगा,जो मटर की जगह मटन की बिक्री को छूट देती है। इसलिए देश को एक और ‘हरित क्रांति‘ की जरूरत है न कि ‘गुलाबी क्रांति‘ की ? ‘गुलाबी क्रांति‘ से मोदी का आशय गाय-भैंस; बोवाइनद्ध के मांस की देश में बढ़ती खपत और विदेशों में उम्मीद से ज्यादा निर्यात से था। गाय-भैंस को बचाए रखने की चिंता ग्रामीण अर्थव्यस्था की धुरी के रूप में भी देखने की जरूरत है। मांस के कारोबार के लिए गाय-भैंसों के मारने का सिलसिला यूं ही जारी रहा तो ग्रामीण अर्थव्यस्था पूरी तरह चैपट हो जाएगी।

आजीविका के संसधानों के लिए गाय को मारना कोई नई बात नहीं है। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान चमड़े के लिए गाय को मारा जाता था। इस व्यवसाय से मुसलमान भी जुड़े थे। दलित हिंदू भी गाय-भैंस के चमड़े के व्यापार से आजीविका चलाते थे। किंतु उस दौरान केवल प्राकृतिक रूप से मरे मवेशियों का चमड़ा उतारकर उससे जूते-चप्पल,चरस,मसक व खेती-किसानी के लिए उपयोग में आने वाली वस्तुओं की शिल्पकारी से लोग जुड़े थे। तब गोहत्या पर पाबंदी की मांग उठी तो इसे मुसलमानों कारोबार पर अंकुश लगाने की दृष्टि से देखा गया। जबकि गोकषी का संबंध धर्म से कहीं ज्यादा कृषि और आर्थिक हितों से जुड़ा है।

वर्तमान में पिछले 10 सालों में गाय-भैंस के मांस से निर्यात को जिस तरह से प्रोत्साहित करते हुए फलने-फूलने का अवसर दिए है,उससे मोटा मुनाफा तो चंद बूचड़खानों के मालिक और मांस निर्यातक कमा रहे हैं,लेकिन इसके दुष्परिणाम लघु व सीमांत किसान और मजदूरों को झेलना पड़ा है। अब नया तथ्य इस कारोबार से सह-उत्पाद के रूप में आतंकवाद का आयात भी जुड़ गया है। इस कारोबार का यह सबसे ज्यादा स्याह एवं खतरनाक पहलू है,जिसके घातक परिणाम पूरे देश को भुगतने पड़ सकते हैं।

कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण उत्पादन-निर्यात प्राधिकरण द्वारा जारी आंकड़ो से पता चलता है कि 2003-04 में भारत से 3.4 लाख टन गाय-भैंस के मांस का निर्यात होता था। यही निर्यात 2012-13 में बढ़कर 18.9 लाख टन हो गया। आज भारत,मांस निर्यात के उद्योग में दुनिया में अव्वल है। मिश्र,कुवैत,सउदी,अरब,फिलीपिंस,वियतनाम और मलेशिया को भारत से मांस निर्यात किया जा रहा है। इनमें से ज्यादातर देश ऐसे हैं,जिनमें आतंकी गतिविधियां चरम पर हैं। सउदी अरब तो आतंकवाद की ऐसी पाठशाला है,जहां से जिहादी इबारत का फैलाव भारत में सबसे ज्यादा है। इसलिए उत्तर प्रदेश पुलिस के उस अध्ययन को एकाएक नकारा नहीं जा सकता,जिसका मेनका गांधी ने आतंकवाद को बढ़ावा देने के रूप में जिक्र किया है। गुप्तचर संस्थाओं का दायित्व बनता है कि वे इस रिपोर्ट का गंभीरता से विष्लेशण करते हुए तहकीकात करें।

मांस के निर्यात में यह वृद्धि और सह-उत्पाद के रूप में आतंकवाद का आयात पूर्व केंद्र सरकार के प्रोत्साहन उपायों से संभव हुआ है। एक ओर तो सरकार ने बूचड़खानों और प्रसंस्करण संयंत्रों के आधुनिकीकरण के लिए सब्सिडी आधारित आर्थिक मदद की। दूसरी तरफ एपीडा ने अफ्रीका और राष्ट्रमंडल देशों में नए बाजार तैयार करने के नजरिए से यातायात में मदद के लिए गोमांस निर्यात का कानूनी स्तर पर रास्ता खोला। यही नहीं गोमांस को सेहतमंद साबित करने की दृष्टि से अंतरराष्ट्रिय खाद्य एवं कृषि संगठन के माध्यम से करोड़ांे रूपए प्रचार में खर्च किए। इस विज्ञापन में बताया गया कि गाय-भैंस का मांस चर्बीरहित व सुअर की तुलना में कम फैट वाला होता है। नतीजतन मांस की मांग एकाएक बढ़ गई। मांग की तुलना में आपूर्ति के लिए निर्यातक ज्यादा दम पर दुधारू और उम्दा सेहत के मवेशी खरीदने लगे। अच्छे दाम मिलने के कारण पालतू मावेशियों के चोरी का कारोबार भी मांस व्यवसाय के समानांतर खड़ा हो गया। इस चोरी में जो पकड़े जाते हैं,उनमें से ज्यादातर गरीब व लाचार होते है। पैसा कमाने के तात्कालिक लालच ने ऐसे अपराधियों के क्षेत्रवार गिरोह तैयार कर दिए हैं। नतीजतन पश्चिमी उत्तरप्रदेश,पश्चिम बंगाल और केरल में मांस का यह धंधा खूब परवान चढ़ रहा है। इन राज्यों में वैध व अवैध दोनों ही तरह के बूचड़खानों की संख्या लगातार बढ़ रही है। 250 से 300 रूपए किलो के भाव पर गाय-भैंसें तौल कर थोक में बेची जा रही हैं। यही नहीं एक समय 30 रूपए किलो में बिकने वाला यह मांस 300 रूपए किलो तक बिक रहा है। गोया यह मांस गरीब के खान की हैसियत से तो बाहर हो गया है। अलबत्ता वह पशुचोरी के नजायाज धंधे से जरूर जुड़ गया है। मध्य पूर्व के देशों में दुधारू पशुओं की सबसे ज्यादा मांग है। ये पशु भारत से भेजे जाते है। मेनका गांधी का कहना है,इसके लिए पहले पशु का दूध निकालते हुए फोटो लिया जाता है। फिर उसके थन काटे जाते है और फिर पशु को काटकर उसके थन रखकर भेजे जाते है। सोचिए,हमारे दुधारू पशु इसी निर्मता से कत्ल किए जाते रहे तो हम पशु कहां से लाएंगे।

मांस के इस बढ़ते कारोबार के चलते दुधारू पशुओं की तदाद निरंतर घट रही है। दुष्परिणामस्वरूप दूध का उत्पादन घट रहा है। मांग की पूर्ति के लिए उसी अनुपात में मिलावटी दूध का उत्पादन बढ़ रहा है। सिंथेटिक,यूरिया और कपड़े घोने के पाउडर से भी नकली दूध बनाया जाने लगा है। यह दूध तमाम तरह की बीमारियां भी मानव समुदायों में फैला रहा है। इसलिए मेनका गांधी ने कहा है कि देश में 80 प्रतिषत मिलावटी दूध बेचा जा रहा है। यह बयान नहीं एक कड़वी सच्चाई है।

भारत दुनिया में ऐसा अनोखा देश है,जहां दूध की सबसे ज्यादा खपत होती है। देश के प्रत्येक नागरिक को औसतन 290 ग्राम रोजाना दूध की जरूरत पड़ती है। इस हिसाब से प्रतिदिन दूध की कुल खपत 45 करोड़ लीटर बैठती है। जबकि शुद्ध दूध का उत्पादन 15 करोड़ लीटर ही है। इसकी भरपाई मिलावटी दूध से की जा रही है। इस असली-नकली दूध का देश की अर्थव्यस्था में योगदान एक लाख 15 हजार 970 करेड़ रूपए का है। जो दाल-चावल की खपत से कहीं ज्यादा है। इस कारोबार से सात करोड़ लोगों की रोजी रोटी चलती है। दूध और इसके सह-उत्पादों के व्यापार से वे ग्रामीण बढ़ी संख्या में जुड़े हैं,जो अशिक्षित होने के साथ किसी अकादमिक कौशल प्रशिक्षण से अनभिज्ञ हैं। इनके ज्ञान का आधार परंपरा से मिला ज्ञान है। इस ज्ञान को शिक्षित वर्ग कमोवेश नकारता है। आजीविका का बड़ा माध्यम बने इस धंधे में सरकारी योगदान तो नाममात्र का भी नहीं है,लेकिन इसे नेस्तनाबूद करने के इंतजाम जरूर सरकारी स्तर पर चल रहे हैं। मोदी सरकार से मांस निर्यात को बढ़ावा देने वाले उपायों पर अंकुश लगाने की अपेक्षा है। ऐसा होगा तो पशुधन से जुड़े आतंकवाद की आशंकाओं पर भी विराम लग सकता है।

प्रमोद भार्गव

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1 Comment on "आतंकवाद से जुड़ा पशुवध"

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Dr Ranjeet Singh
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पूर्णतः सत्य कहा आप ने। निःसन्देह आप बधाई के पात्र हैं।

डा० रणजीत सिंह (यू के)

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