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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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-आशीष तिवारी

देश में लोकतंत्र बेहद मजबूत हो गया है लेकिन लोगों की बातें इस तंत्र में नहीं सुनी जाती। लोग बोलते बोलते थक चुके हैं और अब तो मुर्दई ख़ामोशी ओढ़ कर चुप बैठे हैं। लोकतंत्र का उत्सव मनाया जाता है लेकिन शवों के साथ। कौम सांस लेती तो है लेकिन है मुर्दा। ऐसे में तसल्ली देती है एक मुहिम। अपने अधिकारों की भीख मांग- मांग कर थक चुके बच्चों ने अब वादाई कफ़न उतार दिया है और एक जिंदा कौम की तरह इंतज़ार नहीं करना चाहते। अब वो अपनी राह खुद बना रहें हैं। मंजिलें उन्हें मालूम है और सहारा उन्हें चाहिए नहीं। मैं बात कर रहा हूँ वाराणसी में बनाई गयी दुनिया की पहली और अभी तक एकमात्र निर्वाचित बाल संसद की….

ये बाल संसद समाज के उस तबके के बच्चों की आवाज बुलंद कर रही है जहाँ तक किसी भी सरकार की योजनायें अपनी पहुँच नहीं बना पाती। इस संसद का गठन दो वर्षों पूर्व वाराणसी की एक स्वयंसेवी संस्था विशाल भारत संस्थान ने किया था। हालाँकि अब ये संसद अपने तरीके से काम कर रही है। विशाल भारत संस्थान मुख्य रूप से समाज के गरीब तबके के बच्चों के लिए काम करती है। कूड़ा बीनने वाले और गरीब बुनकरों के हितों के ध्यान में रखकर इस बाल संसद का गठन किया गया। साथ ही इस बात की कोशिश भी है कि देश में महज नेहरु गाँधी परिवार के बच्चों का ही राजनीति का पेटेंट ना कराने दिया जाये…..(ये मेरी अपनी सोच है)…..इस बाल संसद में छः से तेरह साल के बच्चे बाल सांसद का चुनाव लड़ सकते हैं। बाल सांसद का चुनाव लड़ने के लिए बाकायदा एक आचार संहिता भी बनाई गयी है ताकि अभी से इन बच्चों को दागी और साफ़ सुथरी छवि का अंतर स्पष्ट हो जाये। इस आचारसंहिता के मुताबिक प्रत्याशी की छवि दागदार नहीं होनी चाहिए मसलन वो स्कूल से जी ना चुराता हो, अध्यापकों की इज्ज़त करता हो, चोरी ना करता हो आदि। साथ ही प्रत्याशी देश के प्रति वफादार हो, जात-पांत में विश्वास ना करता हो, निम्न और गरीब तबके के बच्चों से प्रेम भाव रखता हो। आमतौर पर ये बातें हमारी बड़ी वाली संसद में चुने लोगों पर लागू नहीं हो पाती।

बाल संसद के चुनाव के लिए चुनावी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। नामांकन हो चुका है और चार जून को मत डाले जायेंगे। परिणाम ग्यारह जून को घोषित किये जायेंगे। चुनाव के लिहाज से इस बार वाराणसी को छः बाल संसदीय क्षेत्रों में बांटा गया है, यानि कुल छः बाल सांसद और एक अध्यक्ष या स्पीकर चुना जायेगा। अगर आप सोच रहे हैं ये बच्चे खिलवाड़ कर रहे हैं तो आप गलत हैं, क्योंकि इस देश के लोकतंत्र के साथ बड़ों ने जैसा खिलवाड़ किया है ये बच्चे ऐसा कुछ नहीं करने जा रहे हैं। हमारी और आपकी वज़ह से इस देश की हालत ये है कि अब ‘शरीफ’ घरों के लोग चुनावों में वोट डालने नहीं जाते, लेकिन जब कभी ट्रेन में राजनीतिज्ञों को गाली देने मौका मिलता है तो अपना पूरा गाली ज्ञान उड़ेल देते हैं। इस बाल संसद में ऐसा कुछ नहीं होता। इस बार के चुनावों में कुल चार बच्चा पार्टियाँ संगठित रूप से चुनाव लड़ रहीं हैं इसके साथ कई निर्दलीय प्रत्याशी भी चुनाव में हैं। स्पीकर पद के लिए तो छः साल के अमन ने अपनी दावेदारी पेश की है। नामांकन पत्र में प्रत्याशियों को अपनी संपत्ति जैसे स्कूल बैग, साईकिल खेलकूद के सामानों की भी जानकारी देनी थी। नामांकन करने वालों को पांच रूपये की जमानत राशि भी जमा करनी पड़ी है। हार जाने पर ये जमानत राशि जब्त कर ली जाएगी। प्रत्याशी किसी वोटर को टॉफी, बिस्कुट का लालच भी नहीं दे सकते हैं और चुनाव से बारह घंटे पहले उन्हें अपना चुनाव प्रचार बंद करना होगा। साथ ही चुनाव में खर्च की गयी राशि का हिसाब भी उन्हें चुनाव के बाद देना होगा। इन कठिन नियमो के मानने के बाद कुल मिलाकर इक्कीस दावेदार हैं मैदान में। इनके भाग्य का फैसला करने के लिए बाल मतदाता भी हैं। वाराणसी में कुल मिलाकर ३६२६ नन्हे वोटर हैं जो अपने पसंदीदा प्रत्याशी का चुनाव करेंगे। इनमें से १२९४ लड़कियां हैं जबकि २३३२ लड़के हैं। प्रत्याशियों के चुनावी मुद्दे भी इस चुनाव का बेहद अहम हिस्सा हैं। उदहारण के तौर पर कोई बाल मजदूरी और बच्चों की शिक्षा के लिए लड़ रहा है तो कोई फीस वृद्धि और पर्यावरण को मुद्दा बनाये हुए है।

इस बार बाल संसद का दूसरा चुनाव हो रहा है और शत प्रतिशत वोटिंग के लिए एक नायाब नुस्खा निकाला गया है। दो पोलिंग बूथ तो बनाये ही गए हैं इसके अलावा एक मोबाइल बूथ का भी इंतज़ाम किया गया है। ये पहली बार है जब देश में मोबाइल बूथ का इस्तेमाल किया जा रहा है। शायद देश में चुनाव कराने वाले बच्चों के इस प्रयास से कुछ सीख ले। ये मोबाइल बूथ विभिन्न इलाकों में जाकर बाल वोटर्स के मत एकत्र करेगा। यही नहीं चुनावों की सुचिता बनाये रखने के लिए चिल्ड्रेन सिक्यूरिटी फोर्स यानि बाल सुरक्षा बाल या सी.एस.ऍफ़. की टुकड़ी भी तैनात रहेगी।.जो इस बात की तसल्ली करेगी कि कहीं से भी आचार संहिता का उल्लंघन ना होने पाए।

बाल संसद के लिए पड़ने वाले मतों के हिसाब किताब के बाद परिणाम आने में अभी इग्यारह जून तक का इंतज़ार है लेकिन तब तक हम और आप ये सोच सकते हैं कि आखिर इस देश में बाल संसद जैसी सामानांतर लोकतान्त्रिक प्रणाली की आवश्यकता क्यों पड़ी? आखिर क्या वज़ह थी कि कूड़ा बीनने वाले बच्चों को अपना भाग्य लिखने के लिए अपनी कलम उठाने की ज़रुरत आन पड़ी? इस बारे में देश के भाग्यविधातायों को सोचना चाहिए। वैसे तसल्ली है कि देश के वंचित वर्ग ने अपनी आवाज़ बुलंद करने के लिए पूर्णरूप से लोकतान्त्रिक रास्ता अख्तियार किया है और पांच साल तक इंतज़ार करने वाली एक मुर्दा कौम से खुद को अलग साबित भी कर दिया।

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