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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-अशोक प्रवृद्ध”-

eyesमानव की शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक उन्नति के लिए जन्म से मृत्युपर्यन्त भिन्न-भिन्न समय पर अलग-अलग संस्कारों की व्यवस्था प्राचीन ऋषि-मुनियों ने की है। मानव-जीवन की उन्नति मेंं विशिष्ट महत्व रखने वाली सोलह संस्कारों में से एक तेरहवाँ और अतिमहत्वपूर्ण संस्कार विवाह है। विवाह एक धार्मिक संस्कार है, जो धर्म की रक्षा करता है और धर्म उसकी रक्षा करता है। शास्त्रों मेंं भी कहा गया है- स्त्री और पुरुष मिलकर एक पूर्ण शरीर बनाते हैं। एक के बिना दूसरा अधूरा है। आदिदेव शंकर का अर्द्धनारीश्वर रूप भी इसी का द्योत्तक है। पुरुष तथा स्त्री के अपेक्षाकृत स्थायी और समाज स्वीकृत प्रेम को विवाह कहते हैं। विवाह मेंं दो बातें सम्मिलित हैं। एक तो दो परिवारों का सम्बन्ध- मुख्यतया एक लड़की का अपने माता-पिता का घर छोड़कर श्वसुर अथवा पति के घर मेंं जाना और दूसरा पति-पत्नी का यौन-सम्बन्ध विवाहित जीवन को सुखी और आनन्दमय बनाने के लिए प्रथम बात, अर्थात लड़की का पति के घर मेंं आना और रहना, अधिक महत्वपूर्ण है। पति-पत्नी मेंं मुख्य बात तो दोनों का मिलकर गृहस्थ धर्म का पालन करना है। गृहस्थ धर्म मेंं यौन-सम्बन्ध के अतिरिक्त भी बहुत कुछ है। गृहस्थ धर्म यज्ञस्वरूप है। इस आश्रम के आश्रय ही ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम चलते हैं। इतना बड़ा उत्तरदायित्व पति-पत्नी दोनों मिलकर ही निभा सकते हैं। इस आश्रम मेंं साथ रहने के क्रम मेंं सन्तानोंत्पत्ति तो होगी ही। जहां स्त्री-पुरुष इकट्ठे रहेंगे,विवाहित हों अथवा अविवाहित, सम्बन्ध बन सकता है और सन्तानोंत्पत्ति भी हो सकती है, परन्तु संतान का पालन -पोषण,शिक्षा-दीक्षा का प्रबंध गृहस्थी का धर्म होता है। स्वामी दयानन्द सरस्वती के शब्दों मेंं विवाह उसको कहते हैं जो पूर्ण ब्रह्मचर्यव्रत, विद्या, बल को प्राप्त तथा सब प्रकार से शुभ गुण, कर्म, स्वभावों मेंं तुल्य परस्पर प्रीतियुक्त होक सन्तानोंत्पत्ति और अपने-अपने वर्णाश्रम के अनुकूल उत्तम कर्म करने के लिए स्त्री और पुरुष का सम्बन्ध होता है। वेद-पुराण, इतिहास और लोक परम्पराओं के अध्ययन से ऐसा भाष होता है की कदाचित् यह संस्था मानव समाज की सबसे पुरानी और सर्वमान्य रीतियों मेंं से एक है।

विवाह शब्द का अर्थ है-खास सम्बन्ध। वैदिक साहित्यों मेंं विवाह शब्द अत्यंत प्राचीन है। ऋग्वेद मेंं वर्तमान अर्थों मेंं विवाह शब्द नहीं मिलता । फिर भी ऋग्वेद मण्डल 2, सूक्त 17, मन्त्र 7 , ऋग्वेद 2/29/, ऋग्वेद 10/7, ऋग्वेद मण्डल 1 सूक्त 46, मन्त्र 2-10 से विवाह शब्द का पत्ता चलता है। परम्परागत अर्थों मेंं हिन्दू समाज की दृष्टि से विवाह का अर्थ है- स्त्री-पुरुष का जीवन भर अथवा जन्मान्तर के लिए एक दुसरे से अनुबन्धित होना। हिन्दू स्त्री एक बार विवाहित होकर जीवन-पर्यंत विच्छेदित नहीं हो सकती। यही नहीं पति के मृत्यु हो जाने पर भी वह उसी की विधवा रहती है। पति मृत हो अथवा जीवित, स्त्री वाग्दता हो या विवाहिता, हर हालत मेंं उसे मन, वचन, कर्म से पति के प्रति सर्वथा अनुबंधित, अनुप्राणित एवं आत्मार्पित होनी पड़ती हैl विवाह के पश्चात् पति का स्त्री पर पूर्ण अधिकार है, परन्तु पुरुष पत्नी की भान्ति स्त्री के प्रति अनुबंधित नहींl हिन्दू धर्मानुबन्धन मेंं पति एक या अनेक इसी भान्ति अनुबन्धित पत्नियाँ रखते हुए भी सर्वथा स्वतंत्र रूप से वैध अथवा अवैध अनगिनत पत्नियाँ बिना पत्नी के स्वीकृति के रख सकता हैl यहाँ तक की पुरुष दासियों, वेश्याओं, रखैलियों एवं व्यभिचारिणी स्त्रियों से भी स्वच्छंद सहवास कर एकता है तथा इससे दूषित भी नहीं होता हैl

यजुर्वेद और ब्राह्मण ग्रंथों से विवाह के विकास का आभाष मिलता है l इसके साथ ही यह भी पत्ता चलता है की विवाह तथा वर्ण का विकास साथ ही साथ एक ही आधार पर हुआ है, फिर भी वृहदारण्यक उपनिषद् 30 तथा ऐतरेय ब्राह्मण 3-33 से ज्ञात होता है कि स्त्रियाँ परदे मेंं नहीं रहती थीं, पैत्रिक सम्पति मेंं हिस्सा पाती थीं, सम्पति की अधिकारिणी होती थीं तथा धार्मिक कार्यों मेंं सम्मिलित होती थीं l अथर्ववेद मेंं कहा गया यह मन्त्र विवाह की परिपाटी स्थापित करता है l अथर्ववेद 14-15 मेंं अंकित है कि सौभाग्य के लिए तेरा हाथ पकड़ता हूँ, मुझ पति के साथ रह, प्रतिष्ठित और नम्र पुरुषों ने मुझे तुझे दिया है…. l अथर्ववेद के अगले मन्त्रों मेंं अथर्ववेद 1/14/3 तथा अथर्ववेद 14/1/43-44 मेंं कन्यादान के पूर्व प्रकट रूप का विकास हुआ है l

विद्वानों का विचार है कि आर्यों मेंं चार वर्णों का विभाजन तो पूर्व मेंं ही हो चुका था,लेकिन आर्यों के पूरे भारतवर्ष मेंं फैलने के पश्चात् जब अनुलोम विवाह, जहाँ कि ऊंचे वर्ग के पुरूष, नीचे वर्ग की स्त्रियों से विवाह कर सकते हैं,परन्तु स्त्रियाँ अपने ही वर्ण अथवा उच्च वर्ग मेंं व्याही जाती हैं तथा प्रतिलोम विवाहों, जिसमेंं स्त्री की जाति पति की वर्ण अथवा जाति से ऊंचा होता है, ठीक अनुलोम विवाह के विपरीत, से उत्पन्न वर्ण-संकरों तथा अनार्य जातियों की स्त्रियों से आर्यों का संसर्ग होने के कारण उनसे उत्पन्न सन्तान की शाखाएं फ़ैल गई थीं तथा इस बात की अब जरुरत महसूस होने लगी थी कि विवाहों और इन विवाहों से उत्पन्न सन्तान की जातियों का नए सिरे से संगठन किया जाए l विवाहों के संगठन के सम्बन्ध मेंं वशिष्ठ, आपस्तम्ब, गौतम आदि आचार्य कुछ मामलों मेंं सहमत और कुछ मामलों मेंं असहमत हैं l वशिष्ठ केवल छः विवाहों- ब्राह्म विवाह,देव,आर्ष,प्राजापत्य,आसुर और गान्धर्व विवाह को स्वीकार करते हैं l आपस्तम्ब भी इन्हीं छः को मानते हैं, परन्तु पिछले दो राक्षस और पैशाच विवाह को दुसरे अन्य नामों से स्वीकार करते हैं l गौतम तथा बोधायन विवाह की आठ रीतियों को मानते हैं l ये दोनों सूत्रकार वशिष्ठ से प्राचीन माने जाते हैं l इन्होने प्राजापत्य तथा पैशाच विवाह को अधिक माना है Lऐसा भाष होता है कि इस काल मेंं भिन्न-भिन्न प्रदेशों मेंं विवाह की अलग-अलग रीतियाँ प्रचलित थीं तथा विवाहित स्त्रियाँ अन्तःपुर मेंं रहती थीं तथा पति की आज्ञानुवर्त्तिनी हुआ करती थींl

विवाह के प्रकार

पुरातन शास्त्रों मेंं विवाह के आठ प्रकार कहे गए हैं l मनुस्मृति मेंं कहा है-

ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथाऽसुरः l

गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः l

मनुस्मृति 3/21

ब्राह्म, देव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच ये विवाह के आठ प्रकार होते हैंl मनुस्मृति मेंं ही इन विवाहों की व्यवस्था है l वर-कन्या दोनों यथावत ब्रह्मचर्य से पूर्ण विद्वान, धार्मिक एवं सुशील हों उनका परस्पर प्रसन्नता से विवाह होना अर्थात अच्छे-अच्छे शील-स्वभाव, गुणवान वर को घर बुलाकर उसका पूजन कर कन्यादान करना और वस्त्राभूषण प्रदान करना ‘ब्राह्म विवाह’ कहलाता हैl विस्तृत यज्ञकर्म करने मेंं ऋत्विक कर्म करते हुए जामाता को अलंकारयुक्त कन्या को देना ‘दैव विवाह’ कहलता है l वर से कुछ ले के (बैल तथा गायें धर्मार्थ लेकर) उसे विधिवत कन्या प्रदान करना ‘आर्ष विवाह’, दोनों का विवाह धर्म की वृद्धि के अर्थ होना ’प्राजापत्य विवाह’ ,कन्या के पिता एवं अभिभावकों को यथाशक्ति कुछ धन देकर विवाह हेतु राजी करना ‘आसुर’ ,वर और कन्या की इच्छा से दोनों का संयोग होना और मन मेंं परस्पर एक दूसरे को पति-पत्नी मान लेना ‘गान्धर्व विवाह’, लड़ाई करके बलात्कार अर्थात छीन-झपट अथवा कपट से कन्या का ग्रहण करना ‘राक्षस विवाह’ तथा सोती या अचेत अथवा पागल कन्या, नशा पीकर उन्मुक्त हुई कन्या को एकान्त पाकर दूषित अथवा सम्भोग कर देना,यह समस्त विवाहों मेंं महानीच, दुष्ट अति दुष्ट ‘पैशाच विवाह’ कहलाता हैl मनुस्मृति मेंं यह भी लिखा है कि ब्राह्म, दैव, आर्ष और प्राजापत्य इन चार विवाहों मेंं पाणिग्रहण किये गये (हुए) स्त्री-पुरूष से जो संतान उत्पन्न होते हैं, वे वेदादि विद्या से तेजस्वी आप्त पुरुषों के सम्मत अत्युत्तम होते हैंl वे पुत्र अथवा कन्या सुन्दर, रूप, बल, पराक्रम, शुद्ध, बुद्धि आदि उत्तम गुणयुक्त,बहुधनयुक्त, पुण्यकीर्तिमान तथा पूर्ण भोग के भोक्ता अतिशय धर्मात्मा होकर सौ वर्ष तक जीते हैंl इन चार विवाहों के अतिरिक्त शेष चार आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच विवाहों से उत्पन्न संतान निन्दित कर्मकर्त्ता,मिथ्यावादी, वेदधर्म के द्वेषी, बड़े ही नीच स्वभाव के होते हैंl

 

महाभारत मेंं केवल पाँच विवाह

महाभारत एक अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रन्थ हैl यह ग्रन्थ उस काल की सभ्यता का अप्रतिम प्रमाण है। महाभारत आदिपर्व अध्याय 74 तथा महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 44 मेंं केवल पाँच ही विवाह का नाम अंकित है उन विवाहों के नाम महभारत मेंं ब्राह्म, क्षात्र, गान्धर्व, आसुर और राक्षस विवाह अंकित है । दैव, आर्ष और प्राजापत्य को क्षात्र के अंतर्गत माना गया है। पैशाच विवाह को निर्दिष्ट नहीं माना गया है। महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 44 मेंं प्रथम के चार ब्राह्म, क्षात्र ,गान्धर्व और आसुर को प्रशस्त और अंतिम राक्षस को निकृष्ट माना गया है। हालाँकि बलात् (जबरदस्ती) कन्याहरण भीष्म ने किया था तथा माद्री को मोल लिया था। क्षात्र विवाह की स्पष्ट व्याख्या महाभारत मेंं नहीं है। परन्तु संभवतः क्षात्र विवाह गान्धर्व विवाह ही है, फिर भी गान्धर्व विवाह और स्वयम्बर विवाह मेंं जो भेद है, वह स्पष्ट है। स्वयम्बर मेंं तो एक न एक शर्त रखी जाती थी, जिसे वर को पूरा करना होता था। परन्तु ऐसे भी स्वयम्बर होते थे जिनमें कोई प्रण अथवा शर्त पूरी नहीं करनी होती थी। जैसे कि दमयन्ती का स्वयम्बर। इतिहासकारों के अनुसार प्राचीन काल से ही पंजाब की स्त्रियाँ अपने लिए अपने आप ही वर पसन्द करती थीं। ऐसा उन्होंने सिकन्दर के आक्रमण काल के लिए भी कहा है। इससे यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि स्वयम्बर प्रथा बहुत देर तक प्रचलित रही। इसी तरह गान्धर्व विवाह मेंं किसी साक्षी अथवा गवाह का भी प्रश्न नहीं था । गान्धर्व एक देवों की उपजाति का भी नाम है, जैसा कि महाभारत मेंं कहा है हो सकता है गान्धर्व विवाह की उन्मुक्त रीति आर्यों ने उनसे सीखी हो और अपनी परम्परा मेंं सम्मिलित कर ली हो। शर्मिष्ठा असुर कन्या थी। रामायण से पत्ता चलता है कि वह आर्य राजा को व्याही गयी थी। महाभारत तथा रामायण दोनों मेंं अंकित है कि मद्र और कैकेय देश की स्त्रियों को मध्य देश के क्षत्रिय राजा मूल्य देकर लिया करते थे। ऐसा भान होता है कि समस्त दक्षिणावर्त मेंं विशेष रूप से जिनके सम्बन्ध असुरों से थे, उनमें यह प्रथा कुल-परम्परा से चली आई थी तथा उच्च कुल की ऐसी अनार्य कन्याएं मोल खरीदकर व्याह ली जाती थीं । मनुस्मृति से भी ऐसा ही पता चलता है । असुर विवाह उनके सन्तानों के अधिकारों की रक्षा कर लेता था, परन्तु नीच जाति की कन्याएं दासी की भान्ति खरीदी जाती थीं और उनके सन्तानों को कोई अधिकार प्राप्त न थे। रामायण से पत्ता चलता है कि श्रीराम के पूर्व ही अगस्त मुनि ने आर्यों का एक उपनिवेश दक्षिण मेंं स्थापित कर लिया था, तथा शरभंग ऋषि और परशुराम भी उधर ही चले गए थे । अनेक ऋषियों की इन राक्षसों से रिश्तेदारियाँ थीं। मत्स्यपुराण मेंं अंकित है कि दैत्य- दानव श्वेत पर्वत पर, देवगण सुमेंरू (पामीर) पर, राक्षस , यक्ष और पिशाच हिमालय पर, गान्धर्व अत्सरस हेमकूट (कारा-कोरम) पर तथा नाग और तक्षक निषध पर्वत पर रहते थे । राक्षस विवाह अति साहसी सुभट (वीर) ही कर सकते थे । सुभद्राहरण और भीष्म के द्वारा काशीराज की कन्या का हरण इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। विवाहित स्त्रियों का भी हरण किया जाता था, जैसे कि जयद्रथ ने पाण्डवों की पत्नी द्रौपदी का किया था।

प्राचीन ग्रन्थों के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि ब्राह्म विवाह सब विवाहों मेंं मुख्य था। क्षात्र, आसुर, राक्षस आदि विवाह के द्वारा लायी गई कन्याओं को ब्राह्म विवाह की रीति से विवाह किया जाता था। कालान्तर मेंं यही ब्राह्म विवाह ही एकमात्र प्रमुख विवाह तथा सर्वप्रचलित विवाह बन गया । इस प्रकार पारम्परिक विवाह न तो व्यक्तिगत प्रेम सम्बन्ध थे न कोई धार्मिक-आद्यात्मिक गठजोड़, प्रत्युत ये विशुद्ध आर्थिक व्यवस्था से सम्बन्ध रखते थे । जिनका अभिप्राय सम्पति के उत्तराधिकारी तथा मातृ- पितृ-गुरु आदि ऋण के उद्धारक पुत्रों को उत्पन्न करना था। यह उत्तराधिकारी आज भी तब की भान्ति ही दीवानी कानून का बड़ा ही पेचीदा तथा सर्वाधिक महत्व का प्रश्न रखता है । यही कारण है कि प्राचीन काल से ही पुत्र का अत्यधिक महत्व रहा है । वैसे आधुनिक समाज मेंं ब्राह्म विवाह के अतिरिक्त पाश्चात्य समाज एवं चलचित्रों के प्रभाव से एक रात्रि के लिए अथवा कुछ काल के लिए गान्धर्व विवाह का प्रचलन हो गया है तथा कोई-कोई युगल गान्धर्व विवाह के तहत कुछ कदम पैर आगे न्यायालयीन विवाह अर्थात कोर्ट मैरिज का भी प्रमाण पत्र लेने से नहीं हिचकते । ऋग्वेद दशम मण्डल के पचासीवें सूक्त जिसे आज विवाह सूक्त के नाम से जाना जाता है, अर्थात 10/85/47 अनुसार हिन्दू विवाह पद्धति मेंं वर-कन्या (वधू) का हाथ पकड़ कर कहता है-

समञ्जन्तु विश्वे देवाः समापो हृदयानि नौ ।

सं मातरिश्वा सं धाता समु देष्ट्री दधातु नौ ॥

ऋग्वेद 10-85-47

‘हे विश्व के देवताओं ! हम प्रसन्नतापूर्वक एकत्रित रहने के लिए एक दूसरे को ग्रहण करते हैं । हमारे ह्रदय दो जलों के समान मिल जाएँ । जैसे प्राण वायु प्राणियों को प्रिय है, जैसे सर्वव्यापक परमात्मा सब मेंं मिला हुआ है तथा उपदेष्टा से श्रोत्ता प्रीति करते हैं, वैसे ही हम परस्पर हों । ‘ यही विवाह अथवा पाणिग्रहण की मीमांसा है ।

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