लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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rss1925 को विजयादशमी के पावन पर्व पर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ रूपी जिस बीज का रोपण किया था, वह अब वट वृक्ष बन चुका है। 90 वर्षों की अपनी यात्रा में संघ; उपेक्षा और विरोध की स्थितियों को पार कर अब क्रमशः स्वीकार्यता की ओर बढ़ रहा है। सामान्य समाज, संघ के संबंध में अधिकाधिक जानना चाहता है। 90 वर्षों की जीवन-यात्रा में संघ ने उपलब्धियों की ऐसी फेहरिस्त तैयार कर ली है जिसने राष्ट्र को एक दिशा दी और हिंदुस्थान को विश्व मानचित्र पर मजबूत राष्ट्र के रूप में प्रदर्शित किया- यथार्थ और केवल यथार्थ है। कुछेक स्वयंसेवकों से शुरू हुआ संगठन आज यदि विश्व का सबसे बड़ा गैर राजनीतिक संगठन है तो यकीन मानिए; इसके पीछे करोड़ों स्वयंसेवकों का त्याग और बलिदान है जिसने संघ को घर-घर तक पहुंचाने में महती भूमिका का निर्वहन किया है। भारतीय राजनीति हो या शैक्षणिक जगत, स्वतंत्रता के बाद से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नकारात्मक एवं सकारात्मक; दोनों ही रूपों में चर्चा के केंद्र में रहा है। इस बात से शायद ही कोई इंकार कर सके कि जितने विवाद संघ और उसकी पृष्ठभूमि को लेकर उठते रहे हैं, उतने हिंदुस्थान के किसी अन्य संगठन को लेकर नहीं उठे होंगे। विवाद और विरोध का जो रूप पिछले दो दशकों में सामने आया है उसने विचारधाराओं के ऐसे द्वंद्व को धरातल पर उकेरा है जिसमें आक्षेप की राजनीति का पुट अधिक जान पड़ता है। पूर्व में महात्मा गांधी से लेकर जवाहरलाल नेहरू और लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने संघ की सामाजिकता को समझा ही नहीं, इसकी सराहना या सार्वजनिक स्वीकारोक्ति का तो सवाल ही पैदा नहीं होता है। हालांकि जब इन महान विभूतियों ने संघ कार्य एवं स्वयंसेवकों की निष्ठा देखी तो इनके विचारों में भी परिवर्तन आया। देखा जाए तो संघ को समझने या न समझने की समस्या न तो नई है, न ही हाल में पैदा हुई है। उदाहरण के लिए 1934 में (जबकि संघ अभी अपनी शैशव अवस्था में ही था) अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने कांग्रेसियों को हिंदू महासभा, मुस्लिम लीग तथा संघ का सदस्य बनने की मनाही कर दी थी। हिंदू महासभा तथा मुस्लिम लीग (इनकी धार्मिक कट्टरता के कारण) में कांग्रेसियों के सदस्य बनने की मनाही तो समझ आती है किंतु 1934 में भी क्या संघ के प्रति घृणा का भाव अधिक था कि इसे आजादी के पूर्व ही अछूत संगठन मान लिया गया था? संघ के साथ यह दिक्कत हमेशा रही है कि राजनीतिक कुटिल चालों में फंसकर इसके विरोधियों ने जमकर विष-वमन किया है। इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जिनसे साबित किया जा सकता है कि लोगों ने संघ विरोध का झंडा उठाकर खुद की राजनीति को मजबूत किया। संघ में एक अघोषित परंपरा है कि इसके अनुशासित वातावरण में बड़े होने वाले स्वयंसेवक विरोध अथवा प्रतिक्रिया की भावना में अधिक विश्वास नहीं करते। उनका भावनाओं को व्यक्त करने में रंच मात्र भी रस नहीं है। और यही वजह है कि संघ को बदनाम करने वाली विचारधाराएं काफी हद तक अपने लक्ष्‍य में कामयाब रही हैं। हालांकि जनसमर्थन की जिस बैसाखी को अन्य संगठनों ने येन-केन-प्रकारेण कमाया है, संघ को वह शक्ति अपने अच्छे कार्यों से बिना प्रचार-प्रसार के प्राप्त हुई है। संघ के कई ऐसे कार्य हैं जिन्होंने देश की एकता और अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने में अपनी भागीदारी निभाई है किंतु उनकी कभी चर्चा नहीं होती, इससे यह तो मान लेना ही चाहिए कि संघ की अनावश्यक प्रचार-प्रसार में कभी कोई रुचि नहीं रही है।

संघ अनुशासन सिखाता है, निर्भीक होना सिखाता है, दूसरों के दुःख में सहभागी बनना सिखाता है, राष्ट्र को देवी के रूप में पूजना और उसकी आराधना करना सिखाता है। संघ के रूप में हिंदुस्थान में ऐसा गैर राजनीतिक संगठन खड़ा है जो हर खतरे से देश और उसके वासियों की रक्षा करने को तत्पर रहता है। संघ का मंत्र है हिंदू संगठन, चिन्ह है भगवाध्वज, जिसे गुरु माना जाता है। गणवेश और लाठी ही संघ का विशिष्ट वेश और सज्जा है। संघ के अपने कुछ त्योहार भी हैं जिन्हें सामाजिक समरसता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। विजयदशमी, मकर संक्रांति, वर्ष-प्रतिपदा, हिंदू साम्राज्य दिनोत्सव (शिवाजी राज्याभिषेक), रक्षाबंधन और गुरु पूर्णिमा पर्व को मनाने के पीछे संघ का उद्देश्य हिंदू संस्कृति, साहस, शौर्य, त्याग, शिक्षा, उत्साह इत्यादि को उचित मान-सम्मान दिया जाना है। देशभर में करीब 1 लाख 60 हज़ार सेवा केंद्र स्वयंसेवकों द्वारा चलाए जा रहे हैं। संघ ने देशहित में 2014 के आम चुनाव में परिवर्तन का समर्थन, 100 प्रतिशत मतदान का आव्हान किया। संघ के प्रयासों से ही जनता मताधिकार के लिए जागरूक हुई और उसने बड़ी संख्या में लोकतंत्र रूपी यज्ञ में भाग लिया। ग्रामीण भारत के बारे में भी संघ की स्पष्ट अवधारणा है। हिंदुस्थान गांवों में बसता है अतः गांवों के लोग शिक्षित हों, गांव सुंदर व स्वच्छ हों, इनमें पर्यावरण और चिकित्सा आदि शामिल हो। भेदभाव न हो, गांव की आवश्यकता गांव में ही पूरी हो। गांव के लोग अपनी योजनाएं खुद बनाएं। योजनाओं के क्रियान्वयन में शासन का सहयोग प्राप्त हो ताकि गांवों का सही अर्थों में विकास हो सके। संघ हमेशा शोषित एवं वंचित हिंदू तबके का पक्षधर है। संघ का मानना है कि जब तक अंतिम व्यक्ति तक देशभक्ति की ज्योत नहीं पहुंचेगी, वह राष्ट्र की उन्नति में कोई योगदान नहीं दे सकता। संघ और उसके प्रकल्पों ने हमेशा ही समाज को जोड़ने और उन्हें देशभक्ति का पाठ पढ़ाने का पुनीत कार्य किया है। भारतीय किसान संघ, भारतीय मज़दूर संघ, संस्कार भारती, दुर्गा वाहिनी, सेवा भारती, राष्ट्र सेविका समिति, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, दीनदयाल शोध संस्थान, शिक्षा भारती, संस्कृत भारती, विश्व हिंदू परिषद, हिंदू स्वयंसेवक संघ, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, सरस्वती शिशु मंदिर, वनवासी कल्याण आश्रम, बजरंग दल, राष्ट्रीय मुस्लिम मंच, अनुसूचित जाति-जनजाति आरक्षण बचाओ परिषद, भारतीय विचार केंद्र, विश्व संवाद केंद्र, राष्ट्रीय सिख संगत, विवेकानंद केंद्र जैसे कई प्रकल्पों ने राष्ट्रभक्ति जगाने और सेवा कार्य का जो बीड़ा उठाया है, उसमें वे शत-प्रतिशत सफल हैं। देशभर में आंकड़ों की दृष्टि से, इस समय संघ परिवार द्वारा करीब 60,000 सेवा-प्रकल्प चलाए जा रहे हैं। ये प्रकल्प देश के 30 प्रांतों में 12,000 से अधिक स्थानों पर चल रहे हैं। ये सेवा कार्य भिन्न-भिन्न क्षेत्रों पर केंद्रित हैं, जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक, आर्थिक विकास व अन्यान्य क्षेत्र। भौगोलिक दृष्टि से 16,000 से अधिक सेवा कार्य ग्रामीण क्षेत्रों में, 4,000 से अधिक वनवासी क्षेत्रों में, 3,000 से अधिक सेवा बस्तियों में और शेष स्थानों पर 1,000 से अधिक सेवा कार्य चल रहे हैं। संघ कार्य को सफल बनाने हेतु लाखों स्वयंसेवकों ने असीम त्याग किया है। संघ चरैवेति-चरैवेति के सिद्धांत पर अग्रसर है और वह दिन दूर नहीं जब हिंदुस्थान का प्रत्येक हिंदू नागरिक संघ और उसके विचारों के साथ खड़ा होकर राष्ट्र की उन्नति और उसके विकास में योगदान देगा।

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