लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

 

संसद में हंगामें के बीच बिना किसी चर्चा के महत्वपूर्ण विधेयकों के पारित होने का सिलसिला शुरू हो गया है। जल्दबाजी में ध्वनिमत से इस तरह से विधेयकों का पास होना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। तृणमूल कांग्रेस समेत कुछ अन्य राजनीतिक दल कालेधन के मुद्दे पर हंगामा खड़ा करके संसद में जो गतिरोध उत्पन्न कर रहे हैं, उससे साफ है कि वे अपनी संवैधानिक दायित्व का ईमानदारी से निर्वाह नहीं कर रहे हैं। अन्यथा सांसद काली छत्रियां या काले शाल ओढ़कर लोकसभा जाने की बजाय,पेश किए जाने वाले विधेयकों पर चर्चा के लिए उल्लेखनीय बिंदुओं की इबारत लिखे नोट्स लेकर पहुंचते ? ऐसा न करने के कारण सत्ताधारी दल भाजपा ने केंद्रीय जांच ब्यूरो के निदेशक की नियुक्ति संबंधी वह विधेयक बिना चर्चा के पारित करा लिया, जिसमें विपक्ष की भूमिका को दरकिनार रखने का कानूनी प्रावधान कर दिया गया है। इसी तर्ज पर राजग सरकार लोकपाल व अन्य जरुरी विधेयक पारित कराने पर आमादा है।

दिल्ली विशेष स्थापना विधेयक – 2014 लोकसभा से पारित हो गया। सीबीआई प्रमुख की नियुक्ति संबंधी इस विधेयक में दो परिवर्तन किए हैं। पहले संशोधन में प्रावधान है कि सीबीआई निदेशक का चयन करने वाली तीन सदस्यीय चयन समिति में लोकसभा में मान्यता प्राप्त विपक्ष का नेता नहीं होने की स्थिति में सदन की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को शामिल किया जाएगा। इस कानून में पूराने प्रावधान के मुताबिक चयन समिति में प्रधानमंत्री, सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश और तीसरे सदस्य के रुप में लोकसभा में प्रमुख विपक्षी दल के नेता होते थे। लेकिन इस बार सत्तारूढ़ दल भाजपा को आंकड़ों से खेलने का मौका मिल गया।             दरअसल 543 सदस्यीय लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का दर्जा पाने के लिए इस बार कांग्रेस सहित किसी दल को दस प्रतिशत सीटें प्राप्त नहीं हुई हैं। नतीजतन लोकसभा में कोई प्रतिपक्ष का नेता नहीं है। हालांकि विधेयक में जो बदलाव लाया गया है, उसके अनुसार लोकसभा में सबसे बड़े राजनीतिक दल के प्रतिनिधि को चयन समिति में लिया गया है। इस नाते विपक्ष की अपनी अहमियत समिति बनी रहेगी और सबसे बड़ा दल होने के कारण कांग्रेस का प्रतिनिधि ही इस समिति में भागीदारी का पात्र होगा। गोया, इसका औचित्य सही है। किंतु विधेयक में जो दूसरा संशोधन किया है, उसमें कुटिलतापूर्वक ऐसा पेंच डाल दिया गया, जिसे विधेयक के मसौदे पर यदि बहस होती तो दूर किया जा सकता था ?

इस अधिनियम में दूसरा संशोधन यह किया गया है कि चयन समिति की बैठक में निर्दिष्ट संख्या मसलन कोरम पूरा होने की बाध्यता नही रहेगी। यानी किसी सदस्य के अनुपस्थित रहने पर भी सीबीआई निदेशक की नियुक्ति मान्य होगी। इसका अर्थ यूं भी निकाला जा सकता है कि बैठक में विपक्ष के प्रतिनिधि के शामिल नहीं होने के बावजूद, सरकार ने सीबीआई प्रमुख की तैनाती का रास्ता खोल लिया है। इस आशय से ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार विपक्षी दल को नियुक्ति प्रक्रिया से बाहर रखने की मानसिकता बनाकर कानून बनाने के मूड में है। वाकई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की यही मंशा है तो देश के लोकतांत्रिक संस्थानों के कामकाज पर दीर्घकालीन प्रतिकूल असर पड़ सकता है ? क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की संस्थागत भूमिका इसलिए अहम् है, जिससे एक तो कोई भी सत्तााधारी दल निरंकुश न होने पाए, दूसरे संवैधानिक नियुक्तियों में पारदर्शिता व निष्पक्षता बरकरार रहे। हालांकि इस संशोधन विधेयक को अभी राज्यसभा से पारित होना है और वहां सरकार बहुमत में नहीं है,लिहाजा मुमकिन है राज्यसभा में विधेयक पर चर्चा हो ? क्योंकि अब विधेयक की खूबियां और खामियां माननीय सांसदों की समझ आ गई होंगी ? यदि संसद भविष्य में इसी तरह हंगामें का हिस्सा बनी रहती है तो इसी तर्ज पर मोदी सरकार लोकपाल की नियुक्ति संबंधी विधेयक पारित कराने में भी सफल हो जाएगी ?

केंद्रीय विधि मंत्री सदानंद गौड़ा इसी शीतकालीन सत्र में लोकपाल की नियुक्ति संबंधी जो विधेयक पेश करने वाले हैं, उसके प्रारुप में भी कोरम पूरी होने की अनिवार्यता खत्म कर दी गई है। इस बाबत गौड़ा ने इन संशोधनों के औचित्य को उचित ठहराते हुए कहा है कि ये बदलाव इसलिए लाए जा रहे हैं, ताकि कोरम की बाध्यपूर्ण षर्तों के पूरा नहीं होने पर, नियुक्तियों को न्यायपालिका में चुनौती नहीं दी जा सके ? मसलन राजग सरकार विपक्ष के नेता की भूमिका को तो संवैघानिक नियुक्तियों के सिलसिले में गौण करना चाहती ही है, न्यायपालिका को भी नजरअंदाज करना चाहती है ?

लोकपाल की जरुरत कार्यपालिका में आला दर्जे के आधिकारियों द्वारा बरते जा रहे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना और उन पर प्रभावी निगरानी एवं निष्पक्ष जांच के लिए जताई गई थी। नागरिक समाज और अन्ना हजारे का आंदोलन इसके गठन की पृष्ठभूमि में था। लोकपाल विधेयक सप्रंग सरकार के कार्यकाल में बड़ी जद्दोजहद के बाद पारित हो पाया था। हालांकि इस विधेयक का मसौदा न तो अन्ना हजारे द्वारा प्रस्तावित लोकपाल के प्रारुप से मेल खाता है और न ही सिविल सोसायटी की अपेक्षाओं के अनुरुप है। बावजूद इसके कानूनी प्रावधानों को और लचीला बनाए जाने के संशोधित प्रावधान सरकार संसद में पेश करने वाली है ? इसकी नियुक्ति में लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता के रखने के प्रावधान को तो बदला ही जाएगा, आला-अधिकारियों पर शिकंजा कसने वाले प्रावधानों को भी लचीला करने के मूड में सरकार है। मसलन लोकपाल कानून को नख-दंत विहीन करने की मंशा सरकार की है। जबकि इस सरकार को ध्यान रखने की जरुरत है कि भ्रष्टाचार से मुक्ति और कालाधन की वापिसी दो ऐसे मुद्दे रहे हैं, जिनकी बदौलत भाजपा की जीत का रास्ता प्रशस्त हुआ और वह पूर्ण बहुमत से सत्ता पर आसीन हुई। यह विधेयक भी यदि बिना चर्चा के पारित हो जाता है तो संसद में विपक्ष की एकजुटता का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा ?

मोदी सरकार हंगामे के बीच अन्य महत्वपूर्ण विधेयकों को संशोधित करने के साथ करीब 65 विधेयक पारित कराना चाहती है। इनमें से कई संप्रग सरकार के कार्यकाल के है। यदि इनमें से कुछ चंद विधेयक ही पारित हो जाते है तो मोदी सरकार के आर्थिक अजेंडे को गति मिल जाएगी। इस दृष्टि से बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेष की सीमा 26 से बढ़ाकर 49 फीसदी करना, कोयला खदान आबंटन के नए नियम तय करना, वस्तु एवं सेवा कर विधेयक लाना,भूमि अधिग्रहण विधेयक और श्रम कानूनों को संशोधित कर औद्योगिक घरानों के हित में बनाना भी केंद्र सरकार की मंशा है। इनमें से ज्यादातर संशोधन विवादास्पद हैं और विपक्षी इन बदलावों के विरुद्ध संसद में लामबंदी का दावा भी कर रहे हैं। ऐसे में विधेयकों को पारित कराने में सरकार को अग्नि-परीक्षा से गुजरना होगा ? लेकिन वित्तमंत्री अरुण जेटली आर्थिक सुधारों के प्रति अपनी वचनबद्धता मीडिया के समक्ष दोहरा चुके हैं। लिहाजा सरकार की पूरी कोशिश होगी कि वह आर्थिक सुधारों से जुड़े विधायी कार्य को जल्द से जल्द संपन्न कराने में रुचि दिखाए। अन्यथा उद्योग-जगत में नकारात्मक संदेश जाएगा और अर्थ जगत में जो उत्साह बना है, उस पर भी पानी फिर जाएगा। लिहाजा संसद में मौजूद सभी विपक्षी दलों की जिम्मेबारी बनती है कि वह विधेयकों का बिना बहस-मुवाहिषे के पारित न होने दें ? अलबत्ता आम आदमी, खेती-किसानी और मजदूर के हित प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे ? वैसे भी सजग विपक्ष की प्रतिबद्धता हंगामे के नए-नए तरीके खोजने की बजाय, ऐसे नए-नए कानून बनाने में है, जो व्यापक जन व राष्ट्रहित से जुड़े हों ?

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