लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

चुनाव परिणाम के बाद जम्मू-कश्मीर में सत्ता की आसंदी पर पहुंचने के लिए राजनीतिक दलों में नूरा-कुश्ती का दौर चल पड़ा है। कोई भी दल स्पष्ट बहुमत के करीब न होने के कारण समर्थन जुटाने की कश्मकश से गुजर रहा है। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी 28 विधानसभा सीटें जीतने के साथ सबसे बड़े दल के रूप में जरूर उभर आई है,लेकिन भाजपा के बिना सत्ता हासिल करने में उसे नैतिकता के मानदडों से समझौता करना होगा। क्योंकि उसे राज्य से ठुकराई गईं कांगे्रस और नॅशनल कांफ्रेंस के विरूद्ध जनमत मिला है। दूसरी तरफ वह भाजपा से मिलकर सिंहासनारूढ़ होती है तो भी उसे दुविधा के संकट से गुजारना होगा। क्योंकि उसने घाटी में भाजपा को सांप्रदायिक पार्टी ठहारते हुए,मतदताओं को रिझाया है। दूसरी तरफ राज्य में 25 सीटों के साथ सबसे ज्यादा वोट हासिल करने भाजपा भी दुविधा में है। क्योंकि पीडीपी गठबंधन सरकार बनाने की शर्तों में अनुच्छेद-370 तथा अफस्पा समेत अन्य कई मुस्लिम हितों को सुरक्षित रखने वाले मसलों पर आश्वासनसन चाहा है। बहरहाल सरकार बनाने के दोनों दलों के पास विकल्प तो कई खुले हैं,लेकिन एक तो स्थिर सरकार की गारंटी नहीं है,दूसरे भाजपा का मिशन कश्मीर फिलहाल अटक गया है।

जम्मू-कश्मीर में मतदाता द्वारा दिए जनादेश का विश्लेशण करें तो साफ होता है कि राज्य सांप्रदायिक मानसिकता से विभाजित है। घाटी में जहां पीडीपी बहुमत में है,वहीं जम्मू क्षेत्र में मतदाता का समर्थन भाजपा को मिला है। जाहिर है,मुस्लिम मतदाताओं ने पीडीपी और हिंदू मतदताओं ने भाजपा को वोट दिया है। बौद्ध बहुल क्षेत्र लद्धाख से यदि भाजपा को समर्थन मिल गया होता तो वह पीडीपी को पीछे छोड़ गई होती। वोटों के इस धुव्रीकरण ने राज्य को घाटी और जम्मू के बीच बांट दिया है। राजनीतिक मंशाओं के विभाजन की ऐसी आस्था देश के किसी अन्य प्रांत में देखने को नहीं मिली है। धु्रवीकरण की इस स्थिति को समाप्त करना है तो देशहित में अच्छा होगा कि पीडीपी और भाजपा मिलकर सरकार बनाएं। इससे दो बातें साफ होंगी,एक तो कश्मीर में समरसता का वातावरण बनेगा और पर्यटकों की आवाजाही बढ़ेगी ? दूसरे उन आषंकाओं पर विराम लगेगा,कि भाजपा मुस्लिम विरोधी पार्टी है ?

लेकिन गठबंधन की इस सरकार के वजूद में आने को लेकर मुश्किल यह है कि भाजपा और पीडीपी ने परस्पर धुर विरोधी मुद्दों को सामने रखकर चुनाव तो लड़ा ही,इनके घोषणा-पत्रों में परस्पर विपरीत मुद्दे भी शामिल हैं। पीडीपी जहां,कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद-370 की कायमी,अफस्पा का उन्मूलन के साथ राज्य में और ज्यादा स्वायत्ता की हिमाँयती है,वहीं भाजपा एक संविधान एक विधान के तहत अनुच्छेद-370 का खात्मा और कश्मीर राज्य सहित पाक अधिक्रत कश्मीर को भी अखंड भारत में शामिल करने की इच्छा रखती है। हालांकि मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने के लिए इन मसलों की भाजपा ने कश्मीर में मजबूती से पैरवी नहीं की। 370 पर बहस के मुद्दे को भी नरेंद्र मोदी चुनावी साभाओं में छूने से परहेज करते दिखे। फिर भी ये दल राष्ट्रहित में थोड़ी उदारता दिखाएं तो कश्मीर में गठबंधन की मजबूत और स्थिर सरकार बनाने की अनुकूल स्थिति में हैं। मिला जनादेश भी इसी आदर्श स्थिति के निर्माण का संकेत देता है।

पीडीपी अगर कांगे्रस या नॅशनल कांफ्रेंस के साथ सरकार बनाती है तो यह एक तरह से बेमेल गठबंधन होगा। हालांकि पीडीपी और कांग्रेस पहले भी साझेदारी में सरकार बना चुकी है। लेकिन 2008 में अमरनाथ यात्रा को लेकर दोनों के बीच विभाजनकारी मतभेद पैदा हुए और गठबंधन टूट गया। इस चुनाव के पहले तक भी दोनों के बीच यह कड़वाहट बनी रही है। अब भाजपा को सत्ता से बाहर रखने की दृश्टि से सोनिया गांधी ने मुफ्ती मोहम्मद सईद से फोन पर बात करके इस कड़वाहट को विलय करने की कोशिश की है। चूंकि केंद्र में भाजपा की सरकार है,इसलिए पीडीपी विकास तथा बाढ़ पीडि़तों के लिए उदार पैकेज की मंशा रखती है,गोया वह भाजपा के सहयोग से सरकार बनाना ज्यादा बेहतर मानकर चल रही है। बशर्ते अजेंडे में शामिल बुनियादी मुद्दों से समझौता हो जाए ? लेकिन इन समझौतों की प्रतिच्छाया में भाजपा का कश्मीर मिशन का अटक जाना तय है। हां,तीन साल के लिए उसे राज्य में हिंदू मुख्यमंत्री बनाने का अवसर जरूर मिल सकता है।

पीडीपी 12 विधायकों वाली कांगे्रंस के साथ जाती है तो उसे चार और विधायकों की जरूरत पड़ेगी। यदि वह 15 विधायकों वाली नॅशनल कांफ्रेंस के साथ जाती है तो उसे महज एक विधायक का और समर्थन जुटाना होगा। यह समर्थन सज्जाद लोन से मिल सकता है। उनकी पीपुल्स कांफ्रेंस पार्टी के पास दो विधायक हैं। हालांकि लोन चुनाव पूर्व भाजपा के साथ खड़े थे,लेकिन उन्होंने ऐसे संकेत दिए हैं,कि वे पीडीपी के साथ जा सकते हैं। ऐसा होता है तो भाजपा के प्रति सज्जात लोन का नरम रुख अवसरवादी रवैया माना जाएगा। क्योंकि नतीजों से पूर्व एक बार ऐसा लग रहा था कि भाजपा मिशन 44 के लक्ष्य को पूरा कर लेगी।

भाजपा यदि स्वतंत्र रूप से सरकार बनाने के लिए पहल करती है तो उसे नॅशनल कांफ्रेंस के साथ हाथ मिलाने के अलावा चार विधायकों की और दरकार पड़ेगी। सज्जाद लोन के दो विधायकों तो उसे मिल जाएंगे,लेकिन दो निर्दलियों में से जुटाने होंगे। ये विधायक भाजपा पर विसंगत शर्ते मनवाने पर जोर तो डालेंगे ही, शरारत करते हुए सरकार गिराने की धमकियां देकर ब्लेक मेल भी करते रहेंगे। जाहिर है,भाजपा को यह बेमेल गठबंधन दुविधा में डालता रहेगा। हालांकि भाजपा को नॅशनल कांफ्रेंस से कोई ज्यादा परेशानी पेष आने वाली नहीं है,क्योंकि पहले भी नॅशनल कांफ्रेंस भाजपा नेतृत्व वाले राष्ट्रिय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा रह चुका है। बहरहाल स्पष्ट बहुमत लाए बिना भाजपा का मिशन कश्मीर पूरा होने वाला नहीं है,लिहाजा उसका और पीडीपी का संयुक्त दायित्व बनता है कि वे मतदाता द्वारा पराजित कर दिए गए राजनीतिक दलों से दूरी बनाएं और दोनों मिलकर सरकार बनाएं। सरकार की सफलता व स्थिरता के लिए न्यूनतम साझाा कार्यक्रम को राज्य में लागू करने के लिए दोनों दल सहमत हो सकते हैं। ऐसा होता है तो घाटी से भाजपा की अस्पृस्यता दूर होगी और उसे कालांतर में मिशन कश्मीर हेतु जमीन तैयार करने का अवसर भी मिलेगा।

 

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