लेखक परिचय

जावेद उस्मानी

जावेद उस्मानी

कवि, गज़लकार, स्वतंत्र लेखक, टिप्पणीकार संपर्क : 9406085959

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कोषपूर्वा: सर्वारम्भाः। तस्मात पूर्वं कोषमवेक्षेत। कौटिल्य अर्थशास्त्रमःअघ्याय 8 प्रकरण 24 श्लोक 1
(सभी कार्य कोष पर निर्भर है। इसलिये राजा को चाहिये कि सबसे पहले कोष पर ध्यान दे।)
सभ्यता के प्रारंभ से ही मानवों ने पहले समाज एंव फिर एक सामाजिक सत्ता की आवश्यकता महसूस कर ली थी। शक्ति आधारित राजतंत्रीय ब्यवस्था मे प्रारंभिक प्रशासनिक ढांचे खड़े हुये और व्यवस्था और स्वंय के खर्च हेतु राजकोष बने। भगवान श्री राम और रावण के राज्यों के वर्णनों में आमात्य, सेनापति, युवराज, गुप्तचर आदि का उल्लेख आता है। कौटिल्य अर्थशास्त्रम नामक ग्रन्थ, आचार्य चाणक्य रचित होने की मान्यता है। इसमे एक विस्तृत विवरण प्राप्त होता है । जिसमे आंतरिक व्यवस्था से विदेश संबध तक के संबंध मे विस्तृत निर्देश है। साथ ही साथ ब्यूरोक्रेसी के स्वरुप का भी विशद विवरण है। इनमे आमत्य, मंत्री परिषद, पुरोहित, सेनापति, युवराज, द्वौवारिक(राजप्रसाद का प्रमुख अधिकारी), अंतर्वंशिक(राजवंश के गृह कार्यों का प्रधान अधिकारी),प्रशास्तृ या प्रशास्ता ( कारागरों का प्रधान अधिकारी), समाहर्ता (माल विभाग का मंत्री), सन्निधाता (राजकोष का मंत्री), दुर्गपाल, नायक, कार्मातिक (खानों और कारखानों का प्रधान अधिकारी), गणिकाघ्यक्ष, रसाध्यक्ष, अश्वशालाध्यक्ष, सभ्य( मंत्री परिषद का अध्यक्ष), दण्डपाल आदि। इस प्रकार हमारे देश का प्रशासनिक ॉचा सदियो पहले वजूद मे आ गया था। राजा के कोष संचालक थे,, सलाह देने के लिये मंत्री परिषद ,रक्षा के लिये सेना और दंड के लिये कारावास थे। आदिकाल से ही राज्य के प्रबंध व्यय एंव राजतंत्र का खर्च प्रजा के सर रहा है। हमारा इतिहास साक्षी है कि तत्कालीन अधिकारी जानते थे कि उन्हे यह धन किसी भी प्रकार से जनता से जुटाना है । राजतंत्रीय काल मे बनी ,गुलामी के दौर मे पल्लवित हुई यह परिपाटी मजबूती के साथ आज भी कायम है । कौटिल्य अर्थशास्त्रम मे साफतौर से कहा गया कि सरकारी कर्मचारी चोरी करेगा ही ,राजा को उस पर नजर रखनी चाहिए। 2000 हजार से पहले चाणक्य के सूत्र आज भी अक्षरशः सत्य है । चाणक्य ने जो कहा था आज भी राजकर्मचारी वही करते साफ नजर आ रहे है। कौटिल्य अर्थशास्त्रम के प्रकरण 24 अघ्याय 8 का शीर्षक ही है भ समुदस्य युक्तापह्नतस्य प्रत्यानयनम(अध्यक्षों द्वारा गबन किये गये धन की पुनः प्राप्ति)। इसमे गबन के 40 तरीके है यथा भ तेषां हरणोपायाश्र चत्वारिंशत पूर्वं सिद्धं पश्रचादवतारितम, पश्चातसिद्धं पूर्वमावातारितम, साध्यं न सिद्धम्, असाध्यं सिद्धम (पहली फसल मे प्राप्त द्रब्य को दूसरी फसल आने पर रजिस्टर मे च़ना, दूसरी फसल की आमदनी का कुछ हिस्सा पहली फसल के रजिस्टर मे च़ा देना। राजकर को रिश्वत ले कर छोड़ देना आदि) और वो सभी तरीके जो ऊपरी आमदनी के लिए ,आज के नौकर शाह अपनाये हुये है। चाणक्य ने स्पष्ट रुप से कहा है कि , राजा को अपने अधीनस्थो की खोज खबर लेते रहना चाहिए जिससे वे पदभ्रष्ट न हो सके । हमारे शासको को भी कभी कभी अपने अफसरो की कारस्तानी को जॉचना, परखना चाहिए जिससे व्यवस्थागत खामिया और नौकरशाही मे व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके।
मघ्य युग छोटी रियासतों और विदेशी आक्रमणों को झोलती भारत भूमि मे राजशाही, मुगल सल्तनत, जमींदारी और कारिंदों के जाल से कोष का संग्रहण करती रही और उनकी अफसरशाही तत्कालीन सिंहासनारु़ या तख़्तनशीन की मर्जी और सनक के अनुसार धन की ब्यस्था अपने और उनके लिये करती रही थी। मुगल शासन ने इसमे मध्य एशिया की प्रचलित ब्यवस्था का पुट दिया लेकिन मूल काम जनता से अपने और अपने आकाओं के लिये धन एकत्र करना ही रहा।
वर्तमान नौकरशाही वर्तमान नौकरशाही को ब्रिटिश शासकों ने अपनी वफादारी सुनिश्चित करने के लिये यूरोपियन माडल के अनुरुप ाला था। लेकिन लक्ष्य वही रहा आकाओं के लिये कोष एकत्र करना, उनके खिलाफ कोई आवाज न उठे इसका ध्यान रखना, उठती आवाज़ों का गला घोंट के रख देना। सोने की चिड़िया की लूट इस नौकरशाही के ही हाथों होती रही। लूट इगंलैण्ड जाती रही या फारस, लूटने वाले हाथ अफसरशाही के रहे है। यही नौकरशाही आजादी के बाद बंटवारे की विभिषिका झेल रहे रक्त और स्वेद से लथपथ देश ने भी अपना ली थी। लेकिन इसकी हकीकत लोगों ने जल्द ही भांप ली। 1952 के पहले चुनाव के दो साल के अंदर जोश मलीहाबादी की कलम ने मातमे आजादी मे लिख दिया कि,
बर्तानिया के ख़ास ग़ुलामने ख़ानाजाद (दास), देते थे लाठियों से हुब्बे वतन(देश प्रेम) की दाद
एक एक ज़र्ब (चोट) जिनकी है अब तक सिरों को याद, वो आई0सी0एस0 अब भी हैं ख़ुशबख़्तो बामुराद
शौतान एक रात मे इन्सान बन गये, जितने नमक हराम थे कप्तान बन गये।
यह अफसरशाही केवल अपने लिये जवाबदेह है। सदियों से अपने आकाओं के लिये कुछ भी करने के लिये तैयार। लेकिन हमेशा अपना ध्यान पहले रखने वाली ब्यूरोक्रेसी आजाद भारत की जनता को आज भी अपना शासक नही मानतीै। 26/01/1950 से 26/01/2011 तक संविधान की प्रस्तावना ही अभी तक इनकों समझ नही आई है। आका खुश और जनता बेहाल। वही चाल बे़ंगी, जो पहले थी वो अब भी है। ये जनता से कोष वसूलते है। ये जनता को कर अदा करने लायक बनाते है। कर देने लायक कल्याणकारी काम करते है। जीवित रखने के जिये प्रयास करते है। जिंदा रखते हैं और टैक्स वसूलते है। रिश्वत लेते हैं और देश भक्त कहलाते है। ये अपने आकाओं की जूतियां पोंछते हैं और जनता पर लाठियां बरसाते है ।  पूरे देश का परिदृश्य गवाह है कि आज बेइमानी , बदनीयती का पलडा इतना भारी है कि ईमानदारी खो गयी है । पर कम ही सही मानवीय मूल्य और कत्तर्व्यपरायणता भी कही न कही जिन्दा है । इसमे कोई शक नही है कि आज यदा कदा जब प्रशासनिक नेकी सामने आती है तो हमारी छाती चौड़ी हो जाती है । पर अगले क्षण बदी का कारवॉ हमारी भावनाओ को रौदते गुजर जाता है । हमारा अतीत ऐसी मिसालो का खजाना है और हमारा वर्तमान इसका खुला सबूत है ।
2011 के पहले महिने मे नसिक के एडिशनल क्लेक्टर यशवंत सोंनावने को तेल माफिया द्घारा जिन्दा जलाने की घटना की चर्चा पूरे देश मे हुई । स्व0 सोनावने कत्तर्व्य की बेदी पर शहीद हुए थे । जिसने प्रशासनिक अधिकारियो का सर देश भर मे ऊचा कर दिया था । अभी उसकी स्याही सूखी भी नही थी कि ,फरवरी 2011 को मुबंई मे पदस्थ डिप्टी क्लेक्टर नीतिश ठाकुर 500 करोड़ कमाने के आरोप मे एंटी करप्शन ब्यूरो ने गिरफतार करके जेल भेज दिया । आरोपो के पाश मे बंधे नीतीश ठाकुर ने न्याय के लिये मुबंई उच्च न्यायालय मे अर्जी दाखिल कर दी है । स्व0 यशवंत सोनावने और नीतीश ठाकुर हमारी प्रशासनिक व्यवस्था के दो चेहरे है । पहला चेहरा उज्जवल दूसरा चेहरा धूमिल है । पहला चेहरा मुबंई आतंकी घटना मे शहीद हुए स्व0 हेमंत करकरे का है और दूसरा चेहरा राष्ट्रमंडलीय खेल के लिये कम और उसमे हुए भ्रष्टाचार के लिये अधिक चर्चित सुरेश कलमाड़ी , आदशर सोसायटी घोटाला मे नामजद महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चाव्हाण जैसो का है । पर पहला चेहरा बहुत कम नजर आता है । और दूसरा चेहरा पूरे देश के गली मुहल्ले मे दिखते है । इनकी फेरहिस्त बहुत लंबी है । पिछले साल फरवरी 2010 को मघ्यप्रदेश के आई पी एस अफसर अरविंद जोशी और उनकी पत्नी टीनू जोशी सचिव महिला बाल विकास के यहां इन्कम टेक्स के छापे मे 300 करोड़ रुपये की बेहिसाब संचति बरामद हुई थी , फरवरी 2010 मे ही छत्तीसग़ के सचिव बाबूलाल अग्रवाल के यहां से आयकर विभाग ने 40करोड की संपति और 220 बैक खातो का पता लगाया है । इनसे भी आगे एम सी आई के पुर्व अघ्यक्ष केतन देसाई है जिन्हे पंजाब के एक मेडिकल कालेज के लिये दो करोड रुपये रिश्वत लेने के आरोप मे पकडा गया था के पास से 1801.5 करोड रुपये नगद और डे टन सोना बरामद हुआ है । यह वह धनराशिया है जो बरामद हुई है केतन देसाई , अरविंद जोशी ,बाबूलाल अग्रवाल , नीतीश ठाकुर जैसे लोगो ने कितना नगद खर्च , अपने ऐशो आराम , दान , उपहार ओर थैलिया भेट करने पर खर्च कर दिया है उसका कोई हिसाब किताब नही है । न ही इसकी जांच की जाती है । निजि विदेश यात्राओ के खर्चे यदाकदा जोड लिये जाते है पर ज्यदातर खर्चीली यात्राए प्रायोजित ही होती है । आज देश के पैमाने पर छोटे बडे हजारो कर्मचारी अधिकारी है जिनके खिलाफ आर्थिक अपराध के मामले दर्ज है । छत्तीसग़ मे जलसंसाधन उपसचिव दीवान के पास से 5.5 करोड की काली कमाई मिली है । कोरिया जिला मुख्यालय बैकुंठपुर के सीएमओ गंभीर सिंह के पास पकडी गयी चार करोड़ से अधिक की काली संपति चर्चा मे है । ऐसे नख से शिख तक , हजारो प्रकरण उजागर हो चुके है । देख जाये तो हमारे देश को संचालित करने वाले तीनो अंग कही न कही से भ्रष्टाचार की महामारी के शिकार है ।
देश मे भ्रष्टाचार रोकने के लिये एक से बकर एक कानून गे़ गये है , पर जितने उपाय हुए है आर्थिक अपराध उसी पैमाने पर ब़ा है । भ्रष्टाचार के अंत के लिये , सरकारी स्तर से हटकर भी कई पहल हुई है । न्यायलय ने इस दिशा मे अग्रणी भूमिका निभायी है न्यायलय के संज्ञान मे आने के बाद हालिया स्पेक्ट्रम जैसे घोटाले उजागर हुए है और इस तरह के मामलो मे कईयो को जांच एजेन्सिी का सामना करना पडा है तो कइयो को पुर्व केन्द्रीय मंत्री ए.राजा की तरह जेल की हवा भी खानी पडी है । पर इसका एक पहलू यह भी है कि अधिकांश आरोपी सजा से बच निकलते है । मिडिया के स्टिग आपरेशनो की धूम रही है कई सांसदो ,मंत्रियो , व्यापारियो ,आला अफसरो के नाम सामने लाने मे मिडिया के स्टिग आपरेशनो की महत्वपूर्ण भूमिका रही है । पर इन पर भी कानुन की नकेल कस दी गयी है । कुछ स्टिग आपरेशन करने वालो का कहना है कि उन पर कई तरह का दबाब बनाया गया । जागरुक नागरिको द्घारा भी समय समय पर कम पहल नही हुई है । 2006 मे आई ए एस लाबी ने खुद होकर भ्रष्ट अधिकारियो का नाम उजागर करने की पहल की थी इंडिया रिजुवनेशन इनसिएटिव ( आई आर आई ) नाम की संस्था से कई बडे नाम जुडे थे सर्वोच्च न्यायलय के पूर्व मुख्य न्यायधीश आर सी लोहाटी ,पुर्व चुनाव आयुक्त जे एम लिंगदोह ,मुबंई के पुर्व पुलिस कमिश्नर जूलियस रिबैरो , वायुसेना के पुर्व प्रमुख एस कृण्णास्वामी पुर्व महालेखा परीक्षक वी के शुगलू , बी एस एफ के पुर्व मुखिया प्रकाशसिंह जैसे ख्यातिनाम लोग थे । देखने मे आया है कि , हर स्तर पर आम नागरिक या उसके संगठन की मोर्चेबंदी भ्रष्टाचार के खिलाफ है ,पर भ्रष्टाचार का तिलिस्म नही टूटा है । आज हमारे देश का शुमार दुनिया के भ्रष्टतम देश मे होता है । आई आर आई ने साफ तौर माना है कि अधिकांश आथीर्क अपराधियो को सजा इसलिये नही मिल पाती है कि न्यायिक अधिकारी स्वंय प्रतिदिन के भ्रष्टाचार मे लिप्त है और इसके बाद प्रख्यात वकील शांतिभूषण ने सर्वोच्च न्यायलय के आठ मुख्य न्यायधीशो के आचरण पर खुले आम उगली उठायी और इसका खामियाजा भी भुगता । सर्वोच्च न्यायलय पूर्व मुख्य न्यायधीश के.बालकृण्णन ने अपने कार्यकाल के दौरान न्यायधीशो की संपति जगजाहिर करने पर काफी आपित्त की थी जिसको लेकर समाज मे यह भ्रान्ति फेल गयी कि न्यायधीशो मे कुछ कमी है जिसके चलते वे संपति का खुलासा करने से हिचक रहे है । हाल मे ही उनके पारिवारिक सदस्य पर कमाई से ज्यादा संपति बटोरने के सवाल उठे है ? यह आम आदमी भी जानता है कि , छोटी अदालतो मे पेशी लगाने , जल्दी नकल निकलवाने , रिहाई के आदेश लेने के लिये पैसे वसूले जाते है । पर न्याय व्यवस्था की रुचि घर मे सुधार के बजाये दूसरो का घर सुधारने मे ज्यादा है । जबकि न्याय का तकाजा है कि इस मसले पर उसकी दृष्टि सम हो और सत्य यह है कि ऐसा नही है इसलिये अपनी पूरी कोशिश् के बाबजूद न्यायालय शिकंजा काने मे पूरी तरह कामयाब नही है ।यही हाल कार्यपालिका का भी है कार्यपालिका अपने पराये से मुक्त नही है वहां कमजोर मजबूत का अपना वर्गीकरण समीकरण और व्याख्या है । न्याय कहता है बेहगुनाह को सजा न मिले पर कामकाजी व्यवहारिकता के चलते यह ध्यान रखा जाता है कि किसी मजबूत का अहित न हो , भले ही इसके एवज मे लाखो कमजोरो के अरमान मर जाये ।
काला धन आज चर्चाओ मे है । बहुमत की इच्छा है विदेशो से जमा काला धन देश मे आना चाहिए और देश मे फेले काले धन को जब्त किया जाना चाहिए और इस विपूल राशि को सार्वजनिक हित मे खर्च किया जाना चाहिए मांग नैतिक है और तार्किक भी है पर यह अभिलाषा हमारी उस सोच का भी खुलासा करता है जो हम दूसरो से आपेक्षित करते है और इसी सोच के चलते भ्रष्टाचार का रावण मरता नही है क्योकि हमारा निशाना रावण की नाभि नही है हमारा लक्ष्य सोने की लंका को लूटना है । भ्रष्टाचार का दानव तभी मरेगा जब हम निर्मल बनेगे । हमे भी ईमानदारी से अपने आप को टटोलना होगा कि इसके लिये हम खुद कितने तैयार है ?

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7 Comments on "भारतीय अफसरशाही की दशा और दिशा"

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radheshayam
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अफसर के बिना यह व्यवस्था कैसे चलेगी यह सोचने वाली बात है , लिखने के लिए कुछ भी लिखा जा सकता है पर सच्चाई यह है कि मंत्री हो चाहे जनता सबकी समस्या का हल अधिकारी ही करता है और केवल अफसर ही बिगड़ा हुआ नहीं है बिगड़ी तो सरकार भी है और उसके विरोधी भी है , चर्चित अन्ना हजारे के समर्थक भी है पर अफसर सबके लिए जीता और मरता है उलको बदनाम किया जाना न्यायसंगत नहीं है .

Chitranjan
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काला धन वापस कैसे आएगा . काला धन तो कुर्सी का असली मालिक है . कुर्सी पर कौन बैठा है , इससे क्या फर्क पड़ता है . बाबा रामदेव बहुत दिनों लस मांग उठा रहे हैं . विदेश तो दूर देश के अन्दर जमा मॉल भी बाहर नहीं आया है . पुलिस तो ताश के पते खेलने वालो से दस पचास लेकर छोड़ देती है और इमानदार पुलिस है उसे तो डिपार्टमेंट से निकल बाहर किया जाता है .नेता लोग जानते है .जिस दिन उन लोगो नस जनता की इस मांग को मन लिया उस दिन उनको भी इमानदार पुलिस… Read more »
shashikant
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लेख एक मुकम्मल बयाँ है .चाणक्य ने जिस अफसरशाही के दंश से दो हजार साल पहले सावधान किया था .उसकी उपेक्षा का फल देश चख रहा है . न जाने वह दिन कब आयेगा जब देश इस रोग से मुक्त होगा . लालफीताशाही नासूर बन चुकी हैं .i

Ajay
Guest

लेखक का नाम अंत तक पता नहीं चल पाया फिर भी उन्हें बधाई .
अजय

sunil patel
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बढ़िया लेख है.
जब जड़ ही कमजोर हो तो वृक्ष कहाँ से मजबूत होगा. http://ias-minimum-age.blogspot.com/
हमारे देश में सौ में से पचास प्रतिशत कर्मचारी अपना कार्य नियम के अनुसार करने की बजाय उपरी अधिकारी के मन के हिसाब से करतें है.

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