लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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देश की जनता जिन पर भरोसा कर उन्हें जनादेश देकर देश की सबसे बडी पंचायत ”लोकसभा” में अपने भविष्य के सपने गढने की गरज से भेजती है, वे ही ”जनसेवक” लोकसभा में उपस्थिति दर्ज कराने के बजाए अपना ही भविष्य गढने में लग जाते हैं। लोकसभा में अनुपस्थित रहने के साथ ही साथ अपने संसदीय क्षेत्र के लोगों के हितों के मामलों में उपेक्षात्मक रवैया अपनाकर न केवल ये जनसेवक अपने निहित स्वार्थ साधते हैं, वरन ये इन्हें मिले जनादेश का भी अनादर ही करते हैं।

जनसेवक भले ही अपने बच्चों को शालाओं में शत प्रतिशत उपस्थिति देने को पाबंद रहने के उपदेश देते हों, पर जब इनकी अपनी बारी आती है तो ये जिम्मेदारियों से मुंह मोडने में गुरेज नहीं करते हैं। लोकसभा की उपस्थिति पंजी पर अगर नजर डाली जाए तो कुछ इसी तरह की बातें निकलकर सामने आती हैं। बजट सत्र के पहले चरण में 22 से 15 मार्च तक के कार्यकाल में ही 544 में से महज 162 संसद सदस्यों ने रोजाना सदन में आकर उपस्थिति दर्ज करवाई है।

विचित्र किन्तु सत्य यहीं देखने को मिलता है। एक ओर कांग्रेस की राजमाता और यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी कांग्रेस संसदीय दल की हर बैठक में सांसदों को सदन में मौजूद रहने पर जोर देती हों, पर जब उनका अपना रिपोर्ट कार्ड देखा जाता है तो वे ही पिछडती नजर आती हैं। गौरतलब होगा कि परमाणु दायित्व विधेयक एवं अन्य मसलों पर सरकार को पहले ही काफी लानत मलानत झेलनी पडी थी। आश्चर्य तो तब होता है जब आम बजट और लेखानुदान मांगों पर चर्चा के दौरान ही सदन में कोरम भी पूरा नहीं हो पाता है।

बजट सत्र के पहले चरण में 22 मार्च से 16 मार्च तक सदन में कुल 15 बैठकें आहूत हुईं हैं। लोकसभा की उपस्थिति पंजी पर नजर डाली जाए तो नेता प्रतिपक्ष श्रीमती सुषम स्वराज, राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी, समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव, भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के गुरूदास दासगुप्ता, मार्क्‍सवादी कम्युनिष्ट पार्टी के वासुदेव आचार्य की उपस्थिति सदन में शत प्रतिशत रही है। कांग्रेस की राजमाता श्रीमती सोनिया गांधी सदन में महज 10 दिन तो युवराज राहुल गांधी ने 13 दिन हाजिरी दी है। कल्याण सिंह और रूपहले पर्दे की अदाकारा जया प्रदा महज एक एक दिन ही अपनी सूरत दिखाने सदन में गए।

सवाल यह उठता है कि आखिर इन जनसेवकों के पास सदन में मौजूद रहने के अलावा एसा कौन सा जरूरी काम है, जिसके चलते ये सदन से गायब रहते हैं। समूचे हिन्दुस्तान में इनका सडक, रेल या वायूमार्ग से आवागमन वह भी विलासिता वाली श्रेणी में बिल्कुल मुफ्त होता है। दिल्ली में रहने को आरामदायक निशुल्क आवास, निशुल्क बिजली एवं अन्य सुविधाओं के होते हुए ये जनसेवक आखिर लोकसभा से गायब रहने में ज्यादा दिलचस्पी क्यों लेते हैं। गौरतलब होगा कि एक प्रोग्राम के दौरान कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी ने अपनी पीडा का इजहार करते हुए भले ही मजाक में यह कहा था कि क्लास बंक करने का मजा कुछ और ही होता है। यहां सोनिया का क्लास से तातपर्य लोकसभा से ही था।

जनता अपने द्वारा दिए गए विशाल जनादेश प्राप्त जनसेवकों से पूछना चाहती है कि आखिर कौन सी एसी वजह है, जिसके चलते ये सदन की कार्यवाही में भाग लेने से इतर कोई और दूसरे काम में अपने आप को झोंक देते हैं। देखा जाए तो इन जनसेवकों की पहली जवाबदारी उनके संसदीय क्षेत्र के लोगों की समस्याओं को सरकार के सामने लाकर उसे दूर करना है। विडम्बना ही कही जाएगी कि आज की राजनीति में गलत परंपराओं का संवर्धन किया जा रहा है।

चुनाव के उपरांत परिणामों का एनालिसिस कुछ इस तरह से किया जाता है कि जिस क्षेत्र से उन्हें वोट नहीं मिलते हैं, उस क्षेत्र के लोगों को नारकीय जीवन जीने पर मजबूर कर दिया जाता है, और जहां लोगों ने उन्हें हाथों हाथ लिया हो उस क्षेत्र को चमन बना दिया जाता है। यही आलम कार्यकर्ताओं का होता है। धडों में बंटे राजनीतिक दलों में जनसेवक अपने अनुयाईयों को पूरी तरह उपकृत कर दूसरे के फालोअर्स की जडों में मठ्ठा डालने से नहीं चूकते हैं।

बहरहाल, जनसेवकों की लोकसभा में इस तरह समाप्त होती दिलचस्पी को बहुत अच्छा शगुन नहीं माना जा सकता है। जिस तरह एक सरकारी कर्मचारी को आकस्मिक, अर्जित और स्वास्थ्य अवकाश मिलता है, उसी तरह चुने गए या मनोनीत जनसेवकों के लिए भी एक आचार संहिता बनकर इसका कडाई से पालन सुनिश्चित होना चाहिए। निर्धारित दिनों से ज्यादा अगर जनसेवक अपने कर्तव्यों से नदारत रहता है, तो उसके वेतन में से दुगनी राशि काटकर सरकारी खाते में जमा करा देना चाहिए। वर्तमान में चुने और मनोनीत जनसेवकों के लिए आचार संहिता है, पर परिस्थितियों को देखकर उसे पर्याप्त नहीं माना जा सकता है।

जब आना, जाना, रहना, बिजली पानी आदि सब कुछ निशुल्क है तो फिर संसद सत्र के दौरान बंक (स्कूल कालेज में पढाई के दौरान विद्यालय या कालेज से गायब रहने के लिए विद्यार्थियों द्वारा प्रयुक्त एक शब्द) मारने का ओचित्य समझ से परे ही है। विद्यार्थियों को तो जुलाई से अप्रेल तक दस माह लगातार (अवकाशों को छोडकर) अपने गुरूकुल जाना होता है, पर संसद के संत्र तो पूरे साल नहीं चला करते। इन जनसेवकों को पगार किस बात की मिलती है, क्या इनकी जवाबदेही तय नहीं होना चाहिए, क्या इन्हें मौज करने और मलाई खाने तथा रसूख दिखाने के लिए जनता के गाढे पसीने की कमाई दी जाती है, आदि न जाने कितने अनुत्तरित प्रश्न देश की जनता के मानस पटल पर उभरते होंगे। नए नियम कायदों में सरकारी नौकर को पेंशन से वंचित रखा जा रहा है, पर जनसेवक चाहे सांसद हो या विधायक उसे बराबर पेंशन की पात्रता आज भी न केवल बरकरार है, वरन् उसे गाहे बेगाहे बढाने के प्रस्ताव भी ध्वनि मत से पारित कर दिए जाते हैं। इस तरह का भेदभाव ‘अनेकता में एकता’ वाले इस हिन्दुस्तान में ही संभव है।

-लिमटी खरे

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