लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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images1हाल ही में इक फिल्म आई है। यह फिल्म वर्ष 2002 में गुजरात दंगे पर आधारित है। फिल्म की शुरुआत दंगे में मारे गए लोगों की कब्र पर से होती है। तत्काल लेखक के मन में सवाल पैदा होता है कि इस फिल्म की शुरुआत गोधरा ट्रेन हादसे में मारे गए लोगों के शव के अंतिम संस्कार से क्यों नहीं की गई? सवाल गहरा है।खैर! देश में कई लोग सांप्रदायिकता के नाम पर अपनी दुकान खूब चमका रहे हैं। अपनी राजनीति का एक मात्र आधार इसे बना रखा है। लेकिन, इनका सच डर पैदा करने वाला है। राजधानी में दो लोकसभा सीट पर जीत पक्की करने के लिए कांग्रेस ने जगदीस टाइटलर और सज्जन कुमार को अपना उम्मीदवार बनाया। सिख विरोधी दंगे में कथित तौर पर दोषी पाए गए दोनों नेताओं को सीबीआई ने आरोप मुक्त कर दिया। ठीक चुनाव से पहले इस फैसले का आना कई शंकाओं को जन्म देता है।

दोनों उम्मीदवारों की उम्मीदवारी का देश भर में विरोध हुआ। अंततः पार्टी को अपना फैसला बदलना पड़ा। अब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा जा रहा है। लगातार कोशिश हो रही है। चुनाव आते ही गुजरात दंगे की बात प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उठाई जाती है। सरकारी अमला हरकत में आ जाता है। लेकिन वे अब भी डटे हैं। उनपर जनता का विश्वास कायम है। यह साफ हो गया है कि कांग्रेस पार्टी तमाम कोशिशों के बावजूद टाइटलर और सज्जन कुमार के मामले में यह विश्वास प्राप्त नहीं कर पाई है। लोग उनकी पार्टी के नेता को शंका की दृष्टि से देखते हैं।

दूसरा उदाहरण भी है। संप्रग सरकार में शामिल लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस पार्टी सन् 1989 में हुए भागलपुर दंगे के मामले में एक दूसरे को कटघरे में खड़ा कर रही है। लेकिन, साफ बात दोनों में से कोई नहीं कर रहा है। दोनों पार्टियां चुनाव से ठीक पहले इस मामले को उठाकर वोट पाने की कोशिश में है। पर भागलपुर की जनता इनका सच जानती है। इसलिए दोनों पार्टियों का वहां कोई आधार नहीं है।

सांप्रदायिकता के नाम पर किसी एक संप्रदाय के लोगों के मन में असुरक्षा की भावना जगा कर वोट पाने वाले इन दिनों धर्मनिर्पेक्षता के भारी समर्थक बन बैठे हैं। वे नरेंद्र मोदी के पीछे पड़े हैं। लेकिन, गुजरात में लौटने वाले बतलाते हैं कि राष्ट्रवाद का फलक बहुत विशाल है। धर्मनिर्पेक्षता इसके जरूरी अंगों में से एक है। हां, गुजरात में जो कुछ हुआ उसे हादसे के तौर पर लिया जाना चाहिए। लेकिन कुछ लोग इन जख्मों की आंच पर अपनी रोटी पकाना चाहते हैं।

पर जनता उनका सच जानती है। ऐसा मालूम पड़ता है कि आगे मोदी का रंग और भी जमेगा। दूसरे राज्य भी गुजरात की तरह विकास की राह पर होंगे। सिनेमा निर्माता और राजनेता कला और समाज सेवा के नाम जो कर रहे हैं, उसका रंग अब और फीका होगा।

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