लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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-शैलेन्द्र चौहान-

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मानवीय नैतिकताएं वास्तव में ऐसी सर्वमान्य अवधारणाएँ हैं जिन्हें सभी लोग जानते हैं और सदियों से मानते चले आ रहे हैं। अच्छाई और बुराई रहस्यमय वस्तुएं नहीं हैं कि उन्हें कहीं से ढूँढ़कर निकालने की आवश्यकता हो। वे तो मनुष्य मात्र की चिरपरिचित चीज़ें हैं जिनकी चेतना मानव प्रकृति में पूर्णरूपेण समाहित कर दी गई है। यही कारण है कि क़ुरआन अपनी भाषा में नेकी और भलाई को ‘मारूफ़’ (जानी-पहचानी हुई चीज़) और बुराई को ‘मुनकर’ (मानव की प्रकृति जिसका इन्कार करे)  के शब्दों से अभिहित करता है। अर्थात् भलाई और नेकी वह चीज़ है जिसे सभी लोग भला जानते हैं और ‘मुनकर’ वह है जिसे कोई अच्छाई और भलाई के रूप में नहीं जानता। इसी वास्तविकता का कु़रआन दूसरे शब्दों में इस प्रकार वर्णन करता है: ‘‘मानवीय आत्मा को ख़ुदा ने भलाई और बुराई का ज्ञान अंतः प्रेरणा के रूप में प्रदान कर दिया है।’’ (9:18)

अब प्रश्न यह है कि यदि नैतिकता की अवधारणा में भलाई और बुराई जानी-पहचानी चीज़ें हैं और दुनिया सदैव कुछ गुणों के अच्छा और कुछ के बुरा होने पर एकमत रही है तो फिर दुनिया में ये भिन्न-भिन्न नैतिक व्यवस्थाएँ क्यों पाई जाती हैं? उनके बीच अन्तर क्यों है? वह कौन-सी चीज़ है जिसके कारण हम कहते हैं कि इस्लाम या फलां धर्म के पास अपनी एक स्थायी नैतिक व्यवस्था है? और ‘नैतिकता’ के संबंध में इस्लाम का विशिष्ट योगदान (Contribution)  है। जब हम विश्व की विभिन्न नैतिक प्रणालियों पर नज़र डालते हैं तो पहली दृष्टि में ही जो अन्तर हमारे सामने आता है वह यह है कि विभिन्न नैतिक गुणों को जीवन की सम्पूर्ण व्यवस्था में लागू करने, उनकी सीमा, स्थान और उपयोग निश्चित करने तथा उनके उचित अनुपात को निर्धारित करने में सब प्रणालियाँ परस्पर भिन्न हैं। अधिक गहराई से देखने पर इस अन्तर का कारण यह प्रतीत होता है कि वास्तव में वह नैतिकता की अच्छाई व बुराई का स्तर निर्धारित करने तथा भलाई और बुराई के ज्ञान का स्रोत तय करने में सब भिन्न-भिन्न मत रखते हैं। उनके बीच इस मामले में भी मतभेद है कि आचारसंहिता की क्रियान्वयन शक्ति (Authority) कौन-सी है जिसके बल पर वह लागू की जा सके और वे कौन-से प्रेरक तत्व हैं जो मनुष्य को इस क़ानून के पालन पर तैयार कर सकें। जब हम इस मतभेद के कारणों की खोज करते हैं तो अंततः यह निष्कर्ष निकालता है कि वह विचार जिसने इन सब नैतिक व्यवस्थाओं के रास्ते अलग-अलग कर दिए हैं वह है उनके बीच ब्रह्माण्ड की अवधारणा। विश्व में मनुष्य की हैसियत तथा मानव-जीवन के उद्देश्य के संबंध में मतभेद है। इसी मतभेद ने जड़ से लेकर शाखाओं तक उनकी आत्मा, उनके स्वभाव और उनके स्वरूप को एक-दूसरे से बिल्कुल अलग कर दिया है। मानव-जीवन में मौलिक निर्णायक प्रश्न ये हैं कि इस विश्व को कोई स्वामी है या नहीं? है तो वह एक है या अनेक हैं? उसके गुण क्या हैं? हमारे साथ उसका संबंध क्या है? उसने हमारे मार्गदर्शन का कोई प्रबंध किया है या नहीं? हम उसके सामने उत्तरदायी हैं या नहीं? उत्तरदायी हैं तो किस बात के? और हमारे जीवन का लक्ष्य और परिणाम क्या है जिसे सामने रखकर हम कार्य करें? इन प्रश्नों का उत्तर जिस प्रकार का होगा उसी के अनुसार जीवन-व्यवस्था बनेगी और उसी के अनुरूप नैतिक नियमों का निर्माण होगा।इस्लाम के अनुसार  इस सृष्टि का स्वामी ‘ईश्वर’ है और वह एक ही स्वामी है। उसी ने इस सृष्टि को पैदा किया। वही इसका एकमात्र प्रभु, शासक और पालनहार है। उसी के आदेशानुपालन के कारण यह सारी व्यवस्था चल रही है। वह तत्वदर्शी, सर्वशक्तिमान है, प्रत्यक्ष और परोक्ष का जानने वाला है। सभी दोषों, भूलों, निर्बलताओं तथा कमियों से मुक्त है। उसकी व्यवस्था में लाग लपेट या टेढ़ापन बिल्कुल नहीं है। मनुष्य उसका जन्मजात बन्दा (दास)  है। उसका कार्य यही है कि वह अपने स्रष्टा की बन्दगी (गु़लामी)  और आज्ञापालन करे। उसके जीवन का लक्ष्य ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और आज्ञापालन है जिसकी पद्धति निर्धारित करना मनुष्य का अपना काम नहीं बल्कि उस ईश्वर का काम है जिसका वह दास है। ईश्वर ने उसके मार्गदर्शन हेतु अपने दूत (पैग़म्बर)  भेजे हैं और ग्रंथ उतारे हैं। मनुष्य का कर्तव्य है कि अपनी जीवन-व्यवस्था इसी ईश्वरीय मार्गदर्शन के स्रोत से प्राप्त करे। मनुष्य अपने सभी कार्यकलापों के लिए ईश्वर के सामने उत्तरदायी है और इस उत्तरदायित्व के संबंध में उसे इस लोक में नहीं बल्कि परलोक में हिसाब देना है। वर्तमान जीवन तो वास्तव में परीक्षा की अवधि है इसलिए यहां मनुष्य के सम्पूर्ण प्रयास इस लक्ष्य की ओर केन्द्रित होने चाहिएँ कि वह परलोक की जवाबदेही में अपने प्रभु के समक्ष सफल हो जाए। परलोक की इस परीक्षा में मनुष्य अपने पूरे अस्तित्व के साथ सम्मिलित है। उसकी सभी शक्तियों एवं योग्यताओं की परीक्षा है। पूरे विश्व की जो चीज़ें भी मनुष्य के सम्पर्क में आती हैं उसके बारे में निष्पक्ष जांच होती है कि मनुष्य ने उन चीज़ों के साथ कैसा मामला किया और यह जांच करने वाली वह सत्ता है जिसने धरती के कण-कण पर, हवा और पानी पर, विश्वात्मक तरंगों पर और ख़ुद इन्सान के दिल व दिमाग़ और हाथ-पैर पर, उसकी गतिविधियों का ही नहीं बल्कि उसके विचारों तथा इरादों तक का ठीक-ठीक रिकार्ड उपलब्ध कर रखा है।

नैतिकता संबंधी निर्देश देने से पहले इस्लाम आदमी के दिल में यह बात बिठाता है कि तेरा मामला वास्तव में उस अल्लाह के साथ है जो हर समय हर जगह तुझे देख रहा है। तू दुनिया भर से छिप सकता है मगर उससे नहीं नहीं छिप सकता। दुनिया भर को धोखा दे सकता है मगर उसे धोखा नहीं दे सकता। दुनिया भर से भाग सकता है मगर उसकी पकड़ से बचकर कहीं नहीं जा सकता। दुनिया केवल तेरा बाहरी रूप देख सकती है मगर ईश्वर तेरी नीयत तथा तेरे इरादों तक को देख लेता है। दुनिया के थोड़े-से जीवन में तू जो चाहे कर ले मगर तुझे अंततः मरकर उसकी अदालत में उपस्थित होना है जहां वकालत, रिश्वत, सिफ़ारिश, झूठी गवाही, धोखा कुछ भी न चल सकेगा और तेरे भविष्य का निष्पक्ष फ़ैसला हो जाएगा। इस विश्वास के द्वारा इस्लाम मानो हर व्यक्ति के दिल में पुलिस की एक चैकी स्थापित कर देता है जो अन्दर से उसको अदेश पालन पर विवश करती है। चाहे बाहर उन आदेशों की पाबन्दी कराने वाली पुलिस, अदालत और जेल मौजूद हो या न हो। इस्लाम के नैतिक क़ानून के पीछे यही वास्तविक शक्ति है जो उसे लागू कराती है। जनमत और शासन का समर्थन भी इसे प्राप्त हो तो कहना ही क्या! वरना मात्रा यही ईमान और विश्वास मुसलमानों को व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से सीधा चला सकता है। शर्त यही है कि सच्चा ईमान दिलों में बैठा हुआ हो।
संसार और इन्सान के संबंध में यह इस्लामी दृष्टिकोण वे प्रेरणाएँ भी प्रस्तुत करता है जो इन्सान को नैतिक नियमों पर चलने के लिए उभारती हैं। इन्सान का ईश्वर को अपना ईश्वर मान लेना और उसके प्रति समर्पण को अपना जीवन लक्ष्य बनाना और उसकी प्रसन्नता को अपना जीवन लक्ष्य ठहराना पर्याप्त प्रेरक है कि वह उन आदेशों का पालन करे जिनके विषय में उसे विश्वास हो कि वे ईश्वरीय आदेश हैं। इसके साथ परलोक पर विश्वास की यह धारणा एक दूसरा शक्तिशाली प्रेरक है कि जो व्यक्ति ईश्वरीय निर्देशों का पालन करेगा उसके लिए परलोक के शाश्वत जीवन में एक उज्जवल भविष्य निश्चित है, चाहे दुनिया के इस अस्थायी जीवन में उसे कितनी ही कठिनाइयों, कष्टों और हानियों को झेलना पड़े। इसके विपरीत जो यहां ईश्वर की अवज्ञा करेगा वह परलोक में स्थायी दंड भोगेगा, चाहे यहां के थोड़े दिनों के जीवन में वह कितने ही मज़े लूट ले। यह आशा और यह भय अगर किसी के दिल में घर कर जाए तो वह ऐसी परिस्थिति में भी बुराई से दूर रह सकता है जहां बुराई अत्यंत लुभावनी या लाभप्रद हो। यहां यह बात स्पष्ट हो जाती है कि इस्लाम के पास सृष्टि के संबंध में अपना एक दृष्टिकोण है, अच्छाई और बुराई के अपने पैमाने हैं। नैतिकता के ज्ञान के अपने स्रोत हैं, अपनी क्रियान्वयन शक्ति है और वह अपना प्रेरक बल अलग रखता है। उन्हीं की सहायता से इस्लाम परिचित मान्य नैतिक सिद्धांतों को अपने मूल्यों के अनुसार व्यवस्थित करके जीवन के सभी क्षेत्रों में लागू करता है।

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