लेखक परिचय

सतीश सिंह

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

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भले ही हाल में आईआईएम के द्वारा संचालित कैट की ऑनलाईन परीक्षा त्रुटिपूर्ण और विवादस्पद रही है, बावजूद इसके इस परीक्षा ने हमारे सामने एक नजीर कायम है। यह सच है कि आईआईएम के द्वारा संचालित कैट की ऑनलाईन परीक्षा कोई पहली ऑनलाईन परीक्षा नहीं थी, लेकिन इसके साथ यह भी सच है कि इतने व्यापक पैमाने पर किसी संस्थान ने इसके पहले कभी भी ऑनलाईन परीक्षा नहीं संचालित करवाया था।

परिवर्तन प्रकृति का शाश्‍वत सत्य है। भारतीय परीक्षा प्रणाली में लगातार बदलाव आते रहे हैं। पहले हमारे देश में गुरुकुल की परम्परा थी। उस समय शिक्षण के पश्‍चात् अभ्यास सत्र होता था और उसके तदुपरांत गुरुजी शिष्‍यों की परीक्षा लेते थे। इस परम्परा के तहत शिष्‍यों को शास्त्रों के अलावा व्यावहारिक ज्ञान भी दिया जाता था। फिर गुलामी के दौरान आया मैकाले का जमाना।

मैकाले का जमाना था रटंत विधा का हिमायती, जो आज भी कायम है। इस शिक्षा पद्धति के कारण हमारे देश के विधार्थी आज दिमाग का इस्तेमाल करना ही भूल गये हैं।

आज पाठयक्रम के अनुसार शिक्षण का कार्य हमारे शिक्षा के मंदिरों में किया जाता है और परीक्षा में प्रश्‍न भी सिलेबस से पूछे जाते हैं। अगर गलती से कभी एकाध प्रश्‍न पाठयक्रम के बाहर से पूछ दिया जाता है तो छात्र परीक्षा का बहिष्कार कर देते हैं।

यही कारण है कि आईआईटी और एम्स से स्नातक व स्नातकोत्तार करने के बाद भी कोई भारतीय छात्र आविष्कार नहीं कर पाता है। थ्री इडियटस के वाइरस और उसके छात्रों की तरह आज के छात्र भी कक्षा में बैठकर पूरे पाठयक्रम को शरबत बना कर पीना और पिलाना चाहते हैं। शोधकार्य को कभी हम तव्वज्जो देते ही नहीं हैं। सरकार भी इस मुद्वे पर उदासीन प्रतीत होती है।

हमें आजाद हुए 62 साल हो गये हैं, पर हमारी शिक्षा पद्धति आज भी मैकाले के जमाने वाली ही है। जबकि इस बीच हर क्षेत्र में बदलाव और विकास हुआ है।

संचार एवं अद्यतन तकनीक की बदौलत आज हमारे समाज का चेहरा बदल गया है। गाँव से लेकर शहर तक और आम से लेकर खास तक ने विज्ञान के सहयोग से अपने सारे पुराने मानकों को बदल डाला है।

इस दिशा में अमिताभ बच्चन द्वारा प्रस्तुत केबीसी (कौन बनेगा करोड़पति) ने चुपके से न जाने कब भविष्य की परीक्षा प्रणाली का बीज बो दिया और हमें इसकी भनक तक नहीं लगी।

कहते है न कि हर नई चीज की प्रेरणा कहीं न कहीं से ली जाती है। इसी अवधारणा के आधार पर भारत में ऑनलाईन परीक्षा की संकल्पना बलवान हुई। इस कार्यक्रम की सफलता ने यह सिद्ध कर दिया कि ऑनलाईन की परीक्षा को भारत में सफलता पूर्वक संचालित किया जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि इस तरह से संचालित परीक्षाओं में प्रष्न चरणबद्व तरीके से पूछे जाते हैं। शुरु के प्रष्न सरल होते हैं। क्रमष: प्रश्‍नों का स्तर बढ़ता चला जाता है। इस संदर्भ में छात्रों के पास यह विकल्प होता है कि वे कभी भी परीक्षा का दामन छोड़ सकते हैं। साथ ही इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि परीक्षा परिणाम के लिए छात्रों को इंतजार नहीं करना पड़ता है। क्लिक किया और परीक्षा परिणाम हाजिर है।

वर्तमान व्यवस्था इतनी ढुल-मूल है कि परीक्षा संपन्न होने के बाद बरसों गुजर जाते हैं, फिर भी परीक्षाफल छात्रों को नसीब नहीं हो पाता है। कितने छात्रों को तो सत्र और परीक्षाफल में होने वाले देरी की वजह से नौकरी और कई दूसरे बेषकीमती अवसरों से भी महरुम रहना पड़ता है।

सच कहा जाये तो आईआईएम के द्वारा संचालित कैट की ऑनलाईन परीक्षा में थोड़ी कठिनाई जरुर हुई है, किन्तु इस सफलता ने इतना तो स्पष्ट जरुर कर दिया है कि अब यह कारवां रुकेगा नहीं। पर गलतियों की पुनरावृति से बचने के लिए भविष्य में हमें परीक्षा के पूर्व पूरी चौकसी बरतनी चाहिए तथा परीक्षा की रुप-रेखा की जानकारी हमारे मस्तिष्क में स्पष्ट रुप से अंकित होनी चाहिए। तभी हम अपने मकसद में कामयाब हो पायेंगे।

ऑनलाईन परीक्षा के लिए दो स्तर पर तैयारी की जानी चाहिए। सबसे पहले आधारभूत स्तर पर और पुनश्‍च: शैक्षिणक स्तर पर। यहाँ आधारभूत स्तर के तहत कंप्‍यूटर हार्डवेयर को दुरुस्त करने और उसके रख-रखाव की परिकल्पना की गई है। जबकि शैक्षिणक स्तर के अंतगर्त परीक्षा के लिए प्रश्‍नों का चुनाव एवं उसका वर्गीकरण प्रश्‍नों की कठिनाई के हिसाब से किये जाने का प्रावधान है अर्थात प्रश्‍नों का गुणात्मक स्तर बढ़ता चला जाएगा और उसमें चरणबद्ध तरीके से बदलाव भी आता रहेगा।

ऑनलाईन परीक्षा विविध चरणों में विभाजित होती है। शुरुआती चरण आसान होते हैं और बाद वाले कठिन। अगर कोई छात्र सफलता पूवर्क सभी चरणों के प्रश्‍नों को हल कर लेता है तो माना जाता है कि उसका मानसिक स्तर औसत से ऊपर है।

इस परीक्षा प्रणाली का आगाज तो हो चुका है। अब इस शुरुआत को देशव्यापी स्तर पर हकीकत में तब्दील करने की जरुरत है। इन सब के लिए एक ईमानदार कोशिश के साथ-साथ ढेर सारे रुपयों की भी आवश्‍यकता है। अगर सबकुछ ठीक रहा तो बहुत जल्द शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति आने वाली है।

नई परीक्षा प्रणाली के आने से मैन्यूल परीक्षा को संचालित करने में खर्च होने वाले करोड़ों-अरबों रुपयों का प्रयोग लोक-कल्याणकारी कार्यों में खर्च किया जा सकेगा।

कदाचार को बढ़ावा देने वाले षिक्षा माफियों का भी धंधा इससे रुक जायेगा। फर्जी तरीके से नौकरी करने वालों पर लगाम लगेगा। अधतन तकनीक बायोमैट्रिक्स की मदद से फर्जी विधार्थी या उम्मीदवार परीक्षा में शामिल ही नहीं हो पायेंगे।

स्कूल-कॉलेजों और नौकरी के लिए संचालित होने वाली परीक्षाओं के परिणाम तुरंत आ जायेंगे। इसकी मदद से षिक्षण सत्र में सुविधानुसार बदलाव एवं पारदर्षिता को लाया जा सकेगा।

नामांकन के लिए प्रतियोगिता परीक्षा एवं वार्षिक परीक्षा को कभी भी साकार किया जा सकेगा। इतना ही नहीं प्रष्नोत्तारी एवं अन्यान्य शैक्षिक गतिविधियों को भी समयानुसार अमलीजामा पहनाया जाएगा। छात्र स्कूल-कॉलेज की बजाए घर से भी परीक्षा देने की स्थिति में रहेंगे।

बदलते परिवेश में पूरे देशमें शिक्षा को व्यावहारिक रुप देने के लिए नित दिन नये प्रयोग किये जा रहे हैं। इसकी ही अगली कड़ी है विज्ञान और गणित के पाठयक्रम को पूरे देशमें एकसमान करने के दिशा में मानव संसाधन मंत्री श्री कपिल सिब्बल द्वारा पहल करना। सच कहा जाये तो शिक्षा प्रणाली में आ रहे इस तरह के बदलाव के कारण देश में शिक्षा के स्तर को ऊपर उठाने में हमें मदद मिलेगी।

यदि सरकार परीक्षा प्रणाली में चल रहे बदलाव को रेखांकित करते हुए हर तरह की सहायता पूरे देश के स्कूल-कॉलजों में उपलब्ध करवाती है तो यह महत्ती कार्य जल्द से जल्द अपनी मंजिल तक पहुँच जाएगा और भविष्य में कोई टुच्चे कोर्स करने के लिए आस्ट्रेलिया जाकर अपनी जान भी नहीं गवांएगा।

-सतीश सिंह

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