लेखक परिचय

डा.राज सक्सेना

डा.राज सक्सेना

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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bhartiya sanskriti डा.राज सक्सेना

समाज में सामान्य रूप से ‘संस्कृति’ शब्द को,सुरुचि और शिष्ट व्यवहार के रुप में लिया जाता है | विस्तृत अर्थों में संस्कृति की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती

है-“संस्कृति किसी एक समाज में पाई जाने वाली उच्चतम मूल्यों की वह चेतना है,जो सामाजिक प्रथाओं,व्यक्तियों की चित्तवृतियों, भावनाओं,मनोवृतियो,आचरण के साथ-साथ उसके द्वारा भौतिक पदार्थों को विशिष्ट स्वरूप दिये जाने में अभिव्यक्त होती है |”

संस्कृति शब्द का दूसरे अर्थों में सभ्यता के परिप्रेक्ष्य में भी प्रयोग किया जाता है | किन्तु अधिकतर संस्कृति के ऊंचे स्वरूप के अर्थों में | यथार्थ में-“सभ्यता,मानव

के सांस्कृतिक विकास  की वह स्थिति है,जिसमें नगर कहे जाने वाले जनसंख्या के क्षेत्रों में जब वे रहना प्रारम्भ कर देते हैं और उच्च श्रेणी के भौतिक जीवन या उच्च जीवन –

स्तर के प्रतीक हो जाते हैं | किन्तु उच्च स्तर के भौतिक जीवन में संस्कृति का अंश  तब ही आता है जब वह उसमें संश्लिष्ट हो या उच्च नैतिक मूल्यों को प्राप्त करने का कोई

माध्यम बने | जब ऐसा जीवन नैतिक मूल्यों में से किसी एक के प्रतिकूल होता है या ऐसे किसी नैतिक मूल्य से दूर रहता है तब वह सांस्कृतिक विकास का अवरोधक बन –

जाता है | ऐसे अवरोधक कभी-कभी लहलहाती संस्कृतियों के समूल नष्टीकरण के कारक  बन जाते है |” इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है |

आलेख में हम संस्कृति के इसी पक्ष का भारतीय परिप्रेक्ष्य में उपलब्ध

साक्ष्यों के आधार पर मूल्यांकन करने का प्रयास करते हैं |

जनविज्ञानियों ने संसार की समस्त जातियों को मुख्य्तः तीन नस्लों में –

बांटा है | प्रथम को जन विज्ञान में काकेशियन कहा जाता है यह गोरे लोगों की नस्ल

है | दूसरी नस्ल मंगोलायड कहलाती है जिसका रंग पीला होता है और तीसरी नस्ल

इथोपियन परिवार कही जाती है जिनका रंग काला होता है | इस प्रकार दुनिया   में

गोरे,पीले और काले तीन प्रकार के लोग मुख्यतः पाये जाते हैं या फिर किसी एक –

रंग की प्रधानता लिये इनमें से किन्ही दो या अधिक का सम्मिश्रण |

भारतीय उप महाद्वीप में इन तीनों नस्लों के लोग तो हैं ही इनके सम्मि-

श्रित लोग भी बहुतायत में पाये जाते है | इस दृष्टि से भी भारतीय परिवेश संसार

में एक विशिष्ट स्थान रखता है | इससे थोड़ा हट कर जनविज्ञान की दूसरी दृष्टि से

 

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विचार करें तो भारत वर्ष में चार प्रकार के लोग मिलते हैं | पहले वे जिनका कद

छोटा,रंग काला,बाल घुंघराले और नाक चौड़ी होती है | इस तरह के लोग मुख्यतः

जंगलों में आदिम जनजातियों के रूप में पाये जाले हैं | दूसरी तरह के वे लोग हैं

जिनका रंग काला,मस्तक लम्बा,बाल घने और काले,नाक खड़ी मगर चौड़ी होती है,

ये द्रविड़ जाति के लोग हैं जो विन्ध्याचल से दक्षिण में पाए जाते हैं | अगर आर्य

भारत में बाहर से आये मान लिये जायें जैसा कि कई विद्वानों का विश्वास है तो ये

लोग आर्यों से भी पहले भारत आये होंगे और इन्होंने ही भारत में व्यवस्थित नगर

नगर व्यवस्था की नींव डाली होगी ऐसा विश्वास किया जाता है | मोहन जोदड़ो और्

हड़्प्पा प्रमाण हैं | तीसरी जाति के लोगों का कद लम्बा,रंग गोरा या गेहुंआ,दाढी

व मूंछ घनी,मस्तक लम्बा तथा नाक पतली तथा नुकीली होती है | ये आर्य जाति

के लोग कहे जाते हैं | अन्य जातियों से वैवाहिक सम्बन्धों के कारण उत्पन्न इनकी

संतानों का रंग गेहुंआ अथवा हल्का गोरा हो रहा है | चौथे प्रकार के लोग जो असम,

भूटान,सिक्किम,पूर्वोत्तर राज्यों और उत्तर प्रदेश,उत्तराखण्ड,हिमाचल,पंजाब,उत्तरी –

बंगाल,कश्मीर के उत्तरी किनारे के कुछ हिस्सों में बहुतायद से पाए जाते हैं | इनका

रंग पीला,कद छोटा, नाक चपटी-चौड़ी और रोम विहीन चेहरा होता है | सदियों –

पहले आर्यो के आगमन के उपरान्त ये मंगोल नस्ल के लोग चीन और तिब्बत  से

पलायन कर हिमालय के निचले हिस्से या तराई में बस गए | इन तथ्यों के आधार

पर भारतीय समाज आर्य,द्रविड़,मंगोल और आदिवासी लोगों का समाज है | आज

हम जिन्हें आदिवासी मानते हैं उनमें से कुछ को छोड़ कर अधिकांश नीग्रो और –

औष्ट्रिक जातियों से मिलकर बने लोग हैं | जो अंण्डमान नीकोबार,मध्य भारत और

देश के अगम क्षेत्रों में पाए जाते हैं | इसी प्रकार मंगोल नस्ल के लोगों का पौरा-

णिक नाम किरात माना जाता है |

भाषा की दृष्टि से विवेचना में हम पाते हैं कि भारत में 76.4  प्रतिशत

आर्य भाषी,20.6 प्रतिशत द्रविड़ भाषी और 03 प्रतिशत शबर-किरात भाषी लोग –

निवास करते हैं | मंगोल नस्ल के लोगों की मूल भाषा तिब्बती या चीनी मूल की

है | जहां तक द्रविड़ भाषा का प्रश्न है,विन्ध्याचल से उत्तर में इससे मिलती जुलती

दो भाषायें एक बलूचिस्तान में ब्रहुई और दूसरी बिहार के ओरांव जनजाति के लोगों

की भाषा मुण्डा द्रविड़ परिवार की भाषायें लगती हैं | यह सिद्ध करता है कि  पूरे

भारत में द्रविड़ संस्कृति का प्रभाव अवश्य था | समाज विज्ञानियों और मानव –

विज्ञानियों ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है | यदि आर्य भाषा संस्कृत का –

साक्ष्य स्वीकार करें तो उसमे किरातों का उल्लेख यह सिद्ध करता है कि आर्यों के

आने से पूर्व किरात भारत आ चुके थे | किन्तु अगर यह मानलें कि आर्य भारत

से ही अन्य देशों में फैले तो सारी समस्याओं का निदान स्वंय हो जाता है | हिन्द

 

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जर्मन परिवार की भाषाओं में जो अद्भुत साम्य है वह भी यह सिद्ध करता है कि –

ये एक मूल की भाषायें हैं | भारतीय आर्यों का ऋगवेद दुनिया की सबसे प्राचीन

पुस्तक होने का गौरव प्राप्त कर चुका है | संस्कृत को सभी आर्यवंशियों की  मूल

भाषा सिद्ध करते हुए सुप्रसिद्ध विद्वान मैक्समूलर ने लिखा है-“संसार भर की सब

आर्य भाषाओं में जितने शब्द हैं, वे संस्कृत की सिर्फ पांच सौ धातुओं से निकले-

हैं |” भी यह सिद्ध करने में योगदान करता है कि आर्य मूल रूप से भारत के ही

निवासी थे और यहीं से दुनिया भर में फैले |

आर्य संस्कृति एक उदार संस्कृति के रूप में सामने आती है | आर्यों ने

समय-समय पर भारत में किसी भी रूप में आईं जातियों और संस्कृतियों को समा-

हित करने में जो बुद्धिमानी और महानता का परिचय दिया है वह कहीं  और  नहीं

मिलता है | इस विषय में जय चन्द्र विद्यालंकार के कथन का उल्लेख आवश्यक हो

जाता है | उन्होंने कहा-“भारत वर्ष की जनता,मुख्यतः आर्य और द्रविड़ नस्लों की

बनी हुई है और उसमें थोड़ी सी छौंक शबर और किरात (मुण्ड और तिब्ब्त-बर्मी)-

की है |” यह वास्तविकता भी है कि रक्त,भाषा और संस्कृति,सभी दृष्टियों से भारत

की  जनता अनेक विभिन्नताओं के रहते हुए भी सम्मिश्रित है |

भारत के बारे में अटकलों का बाजार बहुत गर्म रहा है | एक अटकल के

अनुसार भारत में सबसे पहले बरास्ता ईरान अफ्रीका से नीग्रो आये | यह भी माना

गया कि जब आर्य इस देश में आए उस समय तक नीग्रो जाति समाप्त हो चुकी थी |

नीग्रो जाति का कार्यकाल अब से सात हजार से दस हजार वर्ष पूर्व माना गया | –

अगर बाहर से आने की थ्योरी को मान लिया जाय तो नीग्रो के बाद आग्नेय (आ-

स्ट्रिक) इनके बाद द्रविड़ और फिर आर्य आए | आर्यों के आने के बाद ही भारत में

समन्वय की थ्योरी पर कार्य प्रारम्भ हुआ | एक मिश्रित संस्कृति का जन्म हुआ,

जिसमे देश में उपलब्ध समस्त संस्कृतियों को उचित और सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त –

हुआ और वे भारत में रच-बस गईं |

अगर हम किसी अटकल,अनुमान या कथन से परे एक निष्पक्ष दृष्टि –

इतिहास और धटनाओं के तारतम्य पर डालें तो हम पाते हैं कि आर्य और द्रविड़्

नाम से अभिहित किये गये भारत वासियों का धर्म एक है,भाव और सोच एक है,

संस्कार भी एक ही हैं यहां तक कि जीवनशैली और उसके प्रति उनका दृष्टिकोण भी

समान है | गहनता से पर्यावलोकन करें तो वैष्णव,शैव-शाक्त,बौद्ध और जैन ये

आर्य भी थे और द्रविड़ भी | इनके धार्मिक विश्वासों के अतिरिक्त इनकी साहित्यिक

गतिविधियां रचनाधर्मिता,भाव और शैली में समानता | प्राचीन मन्दिरों का शिल्प,

मूर्तियों की समरूपता जीवन की आवश्यक और मनोरंजन साधनों और वाद्य यन्त्रों

में थोड़े विभेद के अतिरिक्त गहरी समानता मिलती है | कुछ स्थानीय परिस्थितियों

 

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के वशीभूत मामूली अन्तर तो लगता है किन्तु जाति या संस्कारगत भेद बिल्कुल

नहीं हैं |

यदि इस प्रश्न पर विचार करें कि आर्यों के साहित्य में धर्म का जो स्व-

रूप वर्णित है,संस्कृति की जो व्याख्या आर्यग्रन्थों में दी गई है उसका वास्तविक

स्वरूप कहां है तो उसका सर्वश्रेष्ठ स्वरूप दक्षिण में द्रविड़ों में ही उपलब्ध होता  है |

इस तथ्य के अधीन क्या यह अनुमान पुष्ट नहीं होता कि यदि द्रविड़ आर्यों से पूर्व

के निवासी हैं तो फिर हिन्दू संस्कृति भी आर्यों से पूर्व की है,या आर्यों की संस्कृति

को द्रविड़ों ने इसप्रकार समाहित कर लिया कि शिष्य गुरू से आगे निकल गया,या

फिर कोई कहीं से नही आया इसी देश की मिट्टी में वातावरण,प्रकृति और परि-

स्थिति के अधीन शारिरिक रूप से थोड़ी भिन्नता लिये दो प्रजातियों का उदय हुआ

और वे पली बढीं समान मान्यताओं और विश्वासों की एक छतरी के नीचे,एक –

संस्कृति के अधीन |

आर्य कहां से आए, द्रविड़ कौन थे इस सम्बन्ध में कोई प्रमाण प्राप्त

नहीं है मात्र अनुमान और अटकलों से इस गंभीर प्रश्न को जब हल करना है तो

फिर यह मानने में क्या हर्ज है कि न द्रविड़ बाहर से आए न आर्य | ये यहीं

पैदा हुए और इन्होंने मिलकर एक साझा संस्कृति को जन्म दिया जो मनोवैज्ञानिक

परिवेश में तर्क और विज्ञान के आधार पर विश्वासों की एक-एक ईंट जमा कर

खड़ी की गई थी ,जो हजारों साल से मात्र मामूली परिवर्तनों के साथ आज भी –

जिन्दा है और सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है |जबकि इसके साथ फली फूली या इसके बाद

अस्तित्व में आई सभ्यताएं आज कहां हैं कोई नहीं जानता ?

अगर हम यह दुराग्रह मन से हटा कर निष्पक्ष रूप से निम्न तथ्यों

पर विचार करें तो हमें पश्चिमी विद्वानों की कपोलकल्पनाएं हास्यास्पद लगने लगती

हैं-  आइये तथ्यों पर नज़र डालें-

हिन्दू इतिहासग्रंथ ‘पुराण’ सिद्ध करते हैं कि भारत के ब्रह्मावर्त –

प्रदेश में ही ब्रह्मा जी ने सृष्टि संरचना प्रारम्भ की थी |

कर्नल टाड ने ‘राजस्थान का इतिहास’ में लिखा है कि आर्यावर्त के

अतिरिक्त अन्य किसी देश के साहित्य या इतिहास में सृष्टि के आरंभ का हिसाब

नहीं पाया जाता | इससे आदि सृष्टि यहीं हुई, इसमें कोई संदेह नहीं |

सर वाल्टर रेले ने अपने ग्रंथ ‘विश्व का इतिहास’ में कि जलप्रलय

के बाद भारतवर्ष में ही वृक्ष, लता आदि की उत्पत्ति और मानवों की बस्ती हुई |

यह स्वीकार किया है |

अमेरिका के सुप्रसिद्ध दार्शनिक बिल ड्यूरां का कथन है,” भारत-

हमारी प्रजाति की जन्मभूमि और संस्कृत यूरोप की भाषाओं की जननी रही है |

 

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वह हमारे दर्शन की भी जननी, अरबों के माध्यम से गणित की जननी,बुद्ध के

माध्यम से ईसाइयत में अन्तर्निहित मूल्यों की जननी और ग्राम पंचायतों के

माध्यम से जनतंत्र की भी जननी रही है |भारत माता अनेक दृष्टियों से हम –

सब की माता है |

अमेरिका के ही प्रसिद्ध साहित्यकार मार्क ट्वेन ने 1906 में लिखा

था,”भारत मानव जाति का पालना,भाषा की जन्म भूमि,इतिहास की माता,-

कथाओं की दादी और परम्पराओं की परदादी रही है |वह ऐसी जन्मभूमि रही है

जिसके दर्शन के लिये सब लालायित रहते हैं |”

वर्ष 1884 में ‘डेली ट्रिब्यून’ में छपे अपने आलेख में ब्राउन ने भी

स्वीकार किया कि,” यदि हम पक्षपात रहित होकर भली-भांति परीक्षा करें तो हम

को स्वीकार करना पड़ेगा कि हिन्दू ही सारे ससार के साहित्य, धर्म और सभ्यता

के जन्मदाता हैं |”

तथाकथित सभ्य संसार यह विश्वास करता है कि 1498 ई. में अमे-

रिका की खोज कोलम्बस ने की थी | यह भ्रामक है | वहां हिन्दू और बौद्ध मत

के बहुत पुराने चिन्ह मिलते हैं | द० अमेरिका के पेरू राज्य में एक सूर्य मन्दिर

की मूर्ति का आकार उनाव (दतिया) के सूर्य मन्दिर की मूर्ति से मिलता है | –

और भी बहुत से हिन्दू और बौद्ध धार्मिक चिन्ह फैले पड़े हैं जो यह सिद्ध करते –

हैं कि कोलम्बस से सैकड़ों वर्ष पूर्व बौद्ध धर्मप्रचारक वहां गये थे और उन्होंने –

बौद्ध धर्म और एशियाई सभ्यता का प्रचार किया था |

लगभग सभी नये और पुराने इतिहासवेत्ता इस बात को स्वीकार करते

हैं कि दर्शन, विज्ञान और सभ्यता सम्वन्धी सारी बातें यूनान ने भारत से सीखीं

और वहां से अथवा इसी प्रकार परस्पर सारे संसार ने प्राप्त की |

यूनान के प्राचीन इतिहास से पता लगता है कि अपरिचित लोग पूर्व –

की ओर से आकर वहां बसे | वे बहुत बुद्धिमान , विद्वान और कला कुशल थे |

उन्होंने वहां पर विद्या और वैद्यक का प्रचार किया, वहां के निवासियों को सभ्य

और अपना विश्वास पात्र बनाया

महाभारत जो मूलतः एक इतिहासग्रंथ है से ज्ञात होता है कि कुरू-

क्षेत्र युद्ध के अनन्तर कितने ही हिन्दू राज घराने पश्चिम की ओर पलायन कर गए

और यूनान,फीनीसिया,कार्थेज,रोम और मिश्र आदि देशों में बस गये कुछ ने तो

अपने साम्राज्य भी स्थापित किये |

हाल ही में एक रूसी यात्री नोटविच को तिब्बत के हीसिस नामक

मठ में एक हस्त लिखित ईसा का जीवन चरित्र मिला,यह पाली भाषा में है और

बड़ी-बड़ी दो जिल्दों मे सुरक्षित है | इस जीवनी से यह ज्ञात होता है कि ईसा –

 

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का जन्म गरीब मां बाप से वर्तमान इसराईल में हुआ था | 13-14 वर्ष की आयु

में वह अपने मां बाप से रूठ कर घर से भागा और भारत आ गया | यहां वह

राजगृह्, काशी और जगन्नाथपुरी आदि स्थानों में वेदाध्ययन करता रहा | यहां

उसने पाली भाषा सीखी और बौद्धग्रंथों का अध्ययन कर बौद्ध मतानुयाई हो गया |

वापस जाकर अपने देश में उसने अपना मत चलाना चाहा तो लोग उसके विरूध

हो गये और उसे क्रास पर लटका  दिया गया | अर्थात ईसाई धर्म जो अहिंसा के

आधार पर खड़ा है की पृष्ठभूमि भी भारत में ही तैयार हुई थी |

भारत का भाषिक ढांचा बिगाड़ने वाले इंग्लैण्ड के लार्ड मैकाले ने –

स्वंय स्वीकार किया था कि ईसासे अनेक शताब्दियों पूर्व जब इंग्लैण्ड के लोग

अपने रंगे-पुते शरीरों पर कच्चा चमड़ा लपेट कर वनचरों की भांति जंगलों में

घूम रहे थे,तब उस सुदूर भूतकाल में भी भारत ने एक उन्नत स्तर की –

सभ्यता विकसित कर ली थी |

सुप्रसिद्ध फ्रान्सिसी विद्वान रोम्या रोलां का कथन है,”इस पृथ्वीपटल

पर यदि कोई ऐसा स्थान है,जहां मानव के उन सारे स्वपनों को,जो मनुष्य  ने

अस्तित्व में आने के बाद से देखना प्रारम्भ किये थे,साकार किये थे,साकार होते

देखा गया है,वह स्थान भारत ही है |”

कोन्ट जार्न्स जेर्ना ने अपने ग्रंथ थियोगोनी आफ हिन्दूज (हिन्दू देव-

ताओं की वंशावली)में लिखा है -“आर्यावर्त्त केवल हिन्दू धर्म का ही घर नहीं है,

वरन वह संसार की आदि सभ्यता का भंडार है | हिन्दुओं की सभ्यता क्रमशः –

पश्चिम की ओर इथोपिया,ईजिप्ट और फीनीशिया तक,पूर्व दिशा में स्याम,चीन

और जापान तक, दक्षिण में लंका, जावा, सुमात्रा तक और उत्तर की ओर पर-

शिया,चाल्डिया और कोल्विस के रास्ते यूनान तथा रोम हियर वोरियन्स के रहने

के स्थान तक पहुंची |”

अधिक काल नहीं बीता जब न्युयार्क निवासी डेलमार ने ‘इन्डियन-

रिव्यु’ में एक लेख लिख कर यह सिद्ध किया था कि पश्चिमी संसार को जिन –

बातों पर गर्व है, वे सब वास्तव में भारत से ही वहां गई हैं |

राय बहादुर सी.वी.वैद्य ने यह सिद्ध किया है कि पश्चिमी विद्वानों

का यह मत कि विक्रम संवत ईसा के छठे दशक का है उन्होंने प्रमाणित –

किया है कि शकारि विक्रमादित्य ने ईसा से 57 वर्ष पहले शकों को परास्त कर

उन पर विजय की स्मृति में विक्रम संवत चलाया था |

यूरोप के प्रथम दार्शनिक प्लेटो और पायथागोरस दोनों ही दर्शन

शास्त्र के सम्बन्ध में भारत के ऋणी हैं यह उन्होंने स्वीकार किया है |

यह यथार्थ सिद्ध हो चुका है कि कपिल, गौतम और पतंजलि –

 

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जैसे अद्वितीय दार्शनिकों से पूर्व ही आर्य सभ्यता चरम शिखर पर थी |

प्रोफेसर वेवर और काल्ब्रुक ने सिद्ध किया है कि चीन और अरब

की ज्योतिष विद्या का विकास भारत से ही हुआ | हिन्दुओं का क्रान्तिमण्डल उन्ही

का है |  निःसन्देह उन्ही से अरब वालों ने संज्ञान लिया |

आर्यजाति के गणित में अट्ठारह अंको तक संख्यायें थीं जबकि –

अन्य सभ्यताओं में हजार की संख्या से अधिक कोई नाम नहीं पाया गया था |दश-

मलव के सिद्धान्त के लिये विश्व भारत का ऋणी है | अरब वाले जिनसे गणित

का प्रसार विश्व  में हुआ ने भी भारत से ही यह विद्या सीखी तभी वे अंक विद्या को

‘इल्मे हिन्दसा’ कहते हैं |बीज गणित और रेखा गणित का आविष्कार भी भारत

में ही हुआ यह सिद्ध हो चुका है | यूनान ने इन्हें भारत से ही सीखा |

श्केजल ने अपने एक लेख में लिखा है कि संसार की प्रचलित –

भाषाओं में कोई भाषा इतनी पूर्ण नहीं है जितनी कि संस्कृत | इतने शब्दों के

धातुओं(रूट्स)का पता साफ-साफ रीति से किसी भाषा में नहीं मिलता है जितना

कि संस्कृत में मिलता है |

डा. वैलेण्टाइन लिखते हैं कि संस्कृत समस्त भाषाओं की जननी है|

मुस्लिम इतिहासग्रंथ’तब्काते नासिरी’ में उल्लिखित है कि जब बिहार

फतह हुआ तब एक लाख के करीब तो ब्राह्मण (शिक्षक) मारे गये और हिन्दुओं

का एक ‘कदीमी कुतुबखाना’ जिसमे बहुत पुरानी किताबें मौजूद थीं,जलाया गया |

बख्तियार खिलजी के सेनापति मुहम्मद बिन साम के आदेश से सन

1212 ई. में उदन्त पुरी बिहार,नालन्दा और बुद्धगया के पुस्तकालय जला दिये गये|

अलाउद्दीन खिलजी ने अनहिलवाड़ – पाटन का    प्रसिद्ध    पुस्तकालय  –

जलवा दिया था | तारीख-ए-फिरोज शाही के अनुसार फीरोज तुगलक ने कोहाने में

बहुत सी पुस्तके जलवा दी थीं |’सैर मुखातरीन’ के अनुसार औरंगजेब जहां जो

संस्कृत पुस्तक पाता था उसे जलवा देता था |

लौह कला मे आर्यों की उच्चतम तकनीकी प्रवीणता के प्रमाण कुतुब-

मीनार के सामने खड़े लौह स्तम्भ को आर्यों का मानते हुए बगलार ने सिद्धान्त प्रति-

पादित किया(जर्नल ए.बी.बेन्गाल फोर 1864 वाल्युम-33) कि कुतुबमीनार हिन्दु-

ओं की संरचना है | सुप्रसिद्ध अलीगढ यूनिवर्सिटी के निर्माता सर सैयद अहमद खां

ने कर्नल कनिंघम को इस विषय में एक पत्र (कनिंघम्स आर्कियोलौजिकल सर्वे –

आफ इन्डिया वौ.-चार) लिखा था कि कुतुबमीनार कभी मुसलमानों का बनाया हुआ

नहीं हो सकता |

जिस समय विलियम जोन्स ने ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम’ का अनु-

वाद अंग्रेजी में किया तब तक योरोपवासी भारत वासियों को निपट असभ्य ही समझते थे | किन्तु अनुवाद पढ कर सबकी आंखे खुल गईं | इस अनुवाद के बाद ही

जर्मन और फ्रैन्च आदि अनेक भाषाओं में हुए अनुवाद ने भारतीय साहित्य की सर्व-

श्रेष्ठता सिद्ध करदी | वे यह भी जान गए कि जिस ग्रीक भाषा के साहित्य के वे

इतने प्रशंसक थे संस्कृत साहित्य उससे कहीं अधिक प्राचीन और श्रेष्ठ है |

उपरोक्त तथ्य स्पष्ट करते हैं कि आर्य सभ्यता भारत में ही जन्मी –

कहीं बाहर से नहीं आई | यही परवान चढी और अन्य देशों में गई | आर्य कहीं

बाहर से नहीं आए अपितु भारत से ही आर्य अपनी संस्कृति के प्रसार के लिए

विश्व के अनेक देशों में गए | आर्य संस्कृति भारत की अपनी संस्कृति है आया-

तित नहीं  है यह स्वंय सिद्ध है किसी प्रमाण या कल्पना की मोहताज नहीं है |

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