लेखक परिचय

डॉ.रमेश प्रसाद द्विवेदी

डॉ.रमेश प्रसाद द्विवेदी

लोक प्रशासन व स्थानीय स्वराज्य शासन विभाग राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर

Posted On by &filed under समाज.


डॉ. रमेष प्रसाद द्विवेदी

प्रस्तावना:

भारतीय समाज एक कृषि प्रधान समाज है जिसमें कृषक हस्तशिल्प में संलग्न कारीगर तथा द्वितीयक या निम्न सेवाओं में संलग्न व्यक्ति इस अर्थव्यवस्था के तीन प्रमुख अंग है। इन तीनों वर्गों में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। कृषि हस्तशिल्प से सम्बन्धित वस्तुओं के उत्पादन एवं विक्रय में महिलाओं ने परम्परागत रूप से सक्रिय योगदान दिया है। अधिकतर बाजार स्थानीय प्रवृत्ति के थे या उन तक सरलता से पहुँचा जा सकता था। प्राचीन भारत में महिलाओं को आर्थिक.जीवन में भाग लेने का जितना अवसर प्राप्त था वह मध्ययुगीन भारत में निरन्तर कम होता चला गया। पर्दा.प्रथा के प्रचलन तथा स्त्रियों के क्रिया. कलाप के सम्बन्ध में विकसित नवीन मान्यताओं एवं निषेधों के कारण स्त्रियाँ जीवन में अपेक्षाकृत कम भाग लेने लगीं।

ब्रिटिशकालीन समाज में महिलाओं की आर्थिक स्थिति की निम्नता का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति के तहत् कुटीर उद्योग और हस्तशिल्प का लोप था। इन कार्यों में महिलायें पर्याप्त मात्रा में लगी हुई थीं अतरू ये महिलाएं या तो बेरोजगारी या अर्द्ध.बेरोजगारी की स्थिति में आ गयीं। परिवर्तनशील औद्योगिक.व्यवस्था में नवीन आर्थिक मुल्यों का उदय हुआ जिसमें आर्थिक लाभ, सफलता और अर्जनात्मक उपलब्धि पर बल दिया जाने लगा किन्तु महिलाओं के संकेत में सामाजिक मान्यताएँ पूर्ववत बनी रहीं। ऐसी स्थिति में महिलाओं के सम्मुख नवीन आर्थिक व्यावसायिक संरचना में प्रवेश करना या उससे समायोजना स्थापित करना कठिन था।

शासकीय एवं अषासकीय संगठनों के सक्रिय नियोजन एवं क्रियान्वयन के कारण महिलाओं की स्थिति में सुधार होने लगा है, लेकिन खेद की भी बात है कि भारतीय समाज में महिलाओं को आर्थिक एवं राजनीतिक क्रियाकलापों से पृथक रखा गया है तथा पत्नी एवं माता के रूप में उन्हें पुरूष की तुलना में कम शक्ति और विशेषाधिकार प्राप्त है पुरूषों एवं महिलाओं की असमानता मूलतरू संरचनात्मक असमानता है तथा इसकी वैधता सांस्कृतिक आधार पर प्रस्तुत की जाती है। आर्थिक जीवन में महिलाओं की सहभागिता एवं पुरूष के समान आर्थिक अवसरों एवं अधिकारों से संबंधित विवाद मुख्यतरू निम्नलिखित तीन बिन्दुओं पर केन्द्रित रहा है :

1. महिलाओं की आर्थिक पराधीनता और आश्रित स्थिति समाज में पुरूष और स्त्रियों के मध्य कार्यों का विभाजन है और इस कारण महिलाओं का शोषण होता है सामान्यतरू यह माना जाता है कि स्त्रियों का कार्य क्षेत्र पारिवारिक कार्यों तक ही केन्द्रित है तथा उन्हें सामाजिक एवं आर्थिक उत्पादन कार्यों से विरत रहना चाहिए। मार्क्स के अनुसार नारी मुक्ति और पुरूषों के बराबर उनकी समानता तब तक संभव नहीं है जब तक महिलाओं को केवल गृहस्थी के कार्य जो कि निजी कार्य है तक केन्द्रित रखा जाये तथा उन्हें सामाजिक रूप से उत्पादक कार्यों में संलग्न न किया जाये।

महात्मा गांधी ने स्त्रियों की निम्न दशा के सम्बन्ध में यह लिखा है कि स्त्रियों को केवल संतान उत्पन्न करने, पति की देखभाल करने और गृहस्थ कार्य को सम्पादित करने का माध्यम माना जाता है। उसे घर की दासी बना दिया गया है और जब वो काम करने के लिए जाती है तो उसे पुरूष की तुलना में कम मजदूरी दी जाती है। इस प्रकार से सामाजिक न्याय और मानव.अधिकार का यह तकाजा है कि महिलाओं को उनके आर्थिक समस्या से मुक्त किया जाये एवं उन्हें आर्थिक रूप से सहभागी एवं स्वावलम्बी बनाया जाये।

2. यह तथ्य समाज के हित में है कि मानवीय संसाधन का पूर्ण एवं प्रभावशाली उपयोग किया जाये। विकास का पूर्ण लाभ तभी मिल सकता हैए जब महिलाओं को आर्थिक क्रियाकलाप से पृथक न रखा जायें एवं उन्हें विकास की व्यापक प्रक्रिया में सम्मिलित किया जाये। महिलाओं के प्रति भेदभाव मानवीय गरिमा तथा परिवार एवं समाज के कल्याण के विरूद्ध है। यह भेद.भाव महिलाओं को पुरूष के समान राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में भाग लेने से रोकता है। साथ ही साथ इस अवरोध के कारण महिलाओं के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास भी संभव नहीं हो पाता। किसी भी आर्थिक व्यवस्था का प्रमुख कार्य होता है, विभिन्न प्रकार के आर्थिक क्रियाकलापों के मध्य समुचित परिमाणात्मक संतुलन बनाये रखना। यह तभी संभव है जब पुरूषों और स्त्रियों को समाज में स्वतंत्रता प्राप्त हो। स्त्रियों की समान सहभगिता केवल स्त्रियों के विकास की ही नहीं वरन् सम्पूर्ण देश के विकास की एक आवश्यक पूर्व शर्त है। अत: स्पष्ट है कि मानवीय संसाधनों का विकास राष्ट्र के सामाजिक.आर्थिक विकास के लिए नितान्त आवश्यक है। यह कार्य तभी संभव है जब स्त्रियों को आर्थिक जीवन में भाग लेने का पूर्ण अवसर प्राप्त हो।

3. सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन के परिणामस्वरूप इस बात की आवश्यकता उत्पन्न होती है कि समाज के सभी सदस्यों को ज्ञान और क्रियात्मकता का लाभ प्राप्त हो। आधुनिक समाज में जनसंख्या और सामाजिक परिवर्तन के क्षेत्र में जो नवीन प्रवृित्तयाँ दृष्टिगोचर हो रही है, उसके अनुरूप परिवार और समाज में स्त्रियों की भूमिका को पुर्नपरिभाषित करने की आवश्यकता है। विवाह की आयु, परिवार के आकार, नगरीकरण, जनसंख्या स्थानान्तरण, मूल्यवृद्धि, जीवन.स्तर की उच्चता और निर्णय.प्रक्रिया में अपेक्षाकृत अधिक सहभागिता इत्यादि परिवर्तन के ऐसे क्षेत्र हैं जो महिलाओं की भूमिका और उत्तरदायित्व में परिवर्तन की अपेक्षा करते हैं। सामाजिक संकटों में निवारण और सामाजिक व्यवस्था में संतुलन बनाये रखने के लिए महिलाओं की भूमिका में परिवर्तन आवश्यक है। ऐसा न होने पर सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया सुचारू रूप से संचालित न हो सकेगी।

उपर्युक्त तीनों तर्कों के आधार पर इस बात की आवश्यकता का अनुभव किया जा रहा है कि महिलाओं को आर्थिक जीवन में अपेक्षाकृत अधिक सहभागी बनाया जाये तथा उनकी स्थिति पुरूषों के समकक्ष हो जाये। समकालीन भारतीय समाज में महिलाओं की सहभागिता का विष्लेषण करने से पूर्व यह जानना आवश्यक है कि परम्परागत रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था में महिलाओं का क्या स्थान रहा है?

किसी भी जनसंख्या की सामाजिक परिस्थिति का सम्बन्ध उसके आर्थिक स्थान से अत्यन्त घनिष्ठ है। आर्थिक परिस्थिति का तात्पर्य आर्थिक क्रिया.कलाप में भागीदारी का अवसर, अधिकार एवं भूमिका से है। महिलाओं की आर्थिक परिस्थिति को समाज के विकास का एक महत्वपूर्ण सूचकांक माना जाता है किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि सभी प्रकार की विकास प्रक्रियांएं महिलाओं के आर्थिक स्तर को उन्नत करती हैं। महिलाओं का क्रियाकलाप उन सामाजिक अभिवृत्तियों और संस्थाओं के द्वारा प्रभावित होता है जो किसी काल.विशेष एवं स्थान विशेष में किसी सामाजिक वैचारिकी की उपज होती हैं। विभिन्न प्रकार के आर्थिक विकास के स्तर में यह सामाजिक वैचारिकी भिन्न.भिन्न होती है। उदाहरणार्थ-विकास के एक विषिष्ट स्तर में काम करने की क्षमताए उच्च सामाजिक परिस्थिति का सूचक हो सकती है। विकास की दूसरी अवस्था में जब समाज असमान वर्गों में विभाजित हो जाता हैए तब आराम काम के स्थान पर सामाजिक.परिस्थिति का सूचकांक बन जाता है। लैंगिक असमानता यद्यपि सामाजिक संरचना के विभिन्न क्षेत्रों में व्याप्त है, किन्तु इसका जो स्वरूप आर्थिक जीवन में देखने को मिलता है, वह अन्य क्षेत्रों में नहीं।

मध्ययुगीन भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना के पश्चात समाज सामन्तवादी युग से औद्योगिक युग में प्रवेश करता है। इस युग में उद्योग धन्धों का विस्तार होना प्रारम्भ हुआ। हाथ के स्थान पर मशीन के द्वारा उत्पादन बडे़ पैमाने पर किया जाने लगा। फैक्टरी उत्पादन की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। इन सबका संचयी परिणाम यह हुआ कि महिलायें उत्पादन के कार्यों में निरन्तर कम सहभागी होने लगी। जब तक वस्तुओं का उत्पादन हाथ से होता था, महिलाओं की सहभागिता इसमें अपेक्षाकृत अधिक थी, किन्तु जब उत्पादन मशीन के द्वारा फैक्टरी में होने लगा तो महिलाओं के द्वारा अपने परम्परागत कार्यों को छोड़कर फैक्ट्री में जाकर काम करना कठिन होने लगा। साथ ही साथ औद्योगिक समाज की उत्पादन प्रक्रिया विकसित और विशेषीकृत होती है तथा इसके लिए विशेष प्रषिक्षण की आवश्यकता होती है। महिलाओं के लिए इस प्रकार का प्रषिक्षण सामाजिक मर्यादाओं और प्रतिबन्धों को तोड़कर प्राप्त कर पाना कठिन था। इस कारण भी महिलाओं की सहभागिता औद्योगिक अर्थव्यवस्था में अत्यन्त सीमित और संकुचित हो गयी। जहाँ तक कृषि में संलग्न महिलाओं की आर्थिक भूमिका का प्रश्न है वह भी अपेक्षाकृत कम होती गयी। भूमि संबंधी जो नवीन व्यवस्था लागू की गयी वह जमींदारी या रैयतबाड़ी व्यवस्था के नाम से जानी जाती है। इस व्यवस्था में जमींदार न केवल कर वसूलने का कार्य करता था, वरन् वह भूमि का वैधानिक रूप से स्वामी भी बन गया। साधारणतया जातिगत उच्चता और निम्नता के अनुरूप भूमि.स्वामित्व के अधिकारों का वितरण हुआ।

1. उच्च जाति के सदस्य जमींदार बने तथा इन्हें ब्रिटिश शासन के द्वारा पर्याप्त शक्तिए सुविधा और विशेषाधिकार प्राप्त हो गया।

2. निम्न और मध्यम जाति के सदस्य भूमिहीन कृषक मजदूर के रूप में जीवन.यापन करने के लिए बाध्य हुये। परम्परागत जजमानी व्यवस्था ने ब्रिटिशकालीन जमींदार व्यवस्था की वैधानिक सत्ता को सामाजिक.आधार और शक्ति प्रदान करके कृषक.मजदूर के शोषण मार्ग प्रषस्त किया। निम्न और मध्यम जाति की महिलाएं बेरोजगारी या सस्ते श्रम के द्वारा जमींदारी व्यवस्था को दृढ़ता प्रदान करने लगीं। इन महिलाओं का कृषि उत्पादन की प्रक्रिया में यद्यपि महत्वपूर्ण स्थान था तथापि उन्हें इसका जो स्थान प्राप्त होना चाहिए थाए वह नहीं मिला।

स्वातंत्र्योत्तर भारत में महिलाओं की आर्थिक.सहभागिता के नवीन आयामों का विस्तार हुआ है। एक ओर संविधान ने समानता का अधिकार प्रदान करके लैंगिक आधार पर की जाने वाली असमानता को सैद्धान्तिक रूप से समाप्त कर दिया हैए तो दूसरी ओर विकास.कार्यक्रमए विशेष रूप से महिलाओं के शैक्षणिक एवं आर्थिक.विकास के लिए अनेक विशेष कार्यक्रम अपनाये गये हैं। इनके कार्यक्रमों के अतिरिक्त रोजगार के अवसरों में पर्याप्त मात्रा में वृद्धि हुई है। अत: स्वतंत्रता के पश्चात महिलाओं को आर्थिक.शक्ति एवं स्वातंत्र्य के लिए नवीन परिवेश उपलब्ध हुआ।

विविध अध्ययनों से ज्ञात होता है कि उन महिलाओं की आर्थिक सहभागिता अपेक्षाकृत अधिक पाई जाती है जिसके परिवार का आर्थिक.स्तर अपेक्षाकृत निम्न पाया जाता है। यह सर्वविदित होता है कि प्रत्येक देश में आर्थिक.क्रियाओं में दो आधारों पर अंतर किया जाता है- 1. संगठित और 2. असंगठित क्षेत्र।

संगठित क्षेत्र में उद्योग का व्यापार जितने अधिक व्यापक पैमाने पर किया जाता है उतने व्यापक पैमाने पर असंगठित क्षेत्र में नहीं। असंगठित क्षेत्र में संगठित क्षेत्र की भांति मजदूर संघों तथा मजदूरों के हितों की रक्षा करने वाले कानूनों का अभाव होता है। चूँकि असंगठित क्षेत्र में मजदूर संघ या तो नहीं होते या निष्क्रिय होते हैं, अतरू इस क्षेत्र के श्रमिकों को सौदेबाजी का वह अनुकूल अवसर प्राप्त नहीं होता, जो संगठित क्षेत्र के मजदूरों को प्राप्त है। असंगठित क्षेत्र में महिला श्रमिकों की बड़ी संख्या कार्यरत है। परम्परागत रूप से भारतीय समाज में महिला कार्मिकों का एक महत्वपूर्ण भाग कृषिक्षेत्र में संलग्न रहा है और कृषि कार्यों और स्व.रोजगार के क्षेत्र में इनकी संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। असंगठित क्षेत्र में महिलाओं का स्व.रोजगार मुख्यत: छोटे.मोटे धंधे, खाद्य सामग्री की तैयारी या अन्य छोटे रोजगार जैसे बीड़ी बनानाए कपड़ों की सिलाईए लेस बनाना, अगरबत्ती, दियासलाई बनाना ईत्यादि में मुख्य रूप से केन्द्रित है। परिवार में केन्द्रित जिन उद्योगों में महिलाओं की संख्या पुरूषों से अधिक पाई जाती है, वे गन्न्ाा.उद्योगए सूत कातनाए जूट की वस्तुएँ बनाना, काफी बनाना, रस्सी बनाना, रेषम के कीड़े पालनाए मक्खन, घी, जैम, जेली बनाना और तम्बाकू सुर्ती बनाना है।

असंगठित क्षेत्र महिलाओं के लिए असुरक्षित क्षेत्र है, इसमें उन्हें अधिक परिश्रम किन्तु श्रम पुरस्कार एवं कम उत्पादकता परन्तु लम्बी अवधि तक कार्य करना पड़ता है। किन्तु भारतीय आर्थिक एवं औद्योगिक संरचना के अन्तर्गत अधिकतर उद्योग धन्धे संगठित क्षेत्र में न होकर असंगठित क्षेत्र के हैं। अध्ययन के आधार पर ज्ञात हुआ कि विकास.कार्यक्रम भी ऐसी आर्थिक.क्रियाओं को प्रोत्साहित करते हैं जो कि असंगठित क्षेत्र के रोजगार के अवसरों को विस्तृत कर रहे हैं। उद्यमी का व्यक्तिगत लाभ भी इसी में हैं किन्तु वह उत्पादन का कार्य असंगठित क्षेत्र में करे क्योंकि इस क्षेत्र में कारखाना अधिनियम, श्रमिक अधिनियम इत्यादि कानूनों का हस्तक्षेप कम होता है तथा दूसरी ओर कम मजदूरी पर अधिक कार्य लेना संभव होता है। अध्ययन द्वारा यह विदित होता है कि महिला.श्रम की आपूर्ति परिवार के आय के स्तर से नियोजित होती है, न कि मजदूरी की दर से। चूँकि अधिकतर महिला कार्मिक परिवार की निम्न आय के स्थिति के कारण प्रवेश करती है इसलिए वे किसी भी प्रकार का कार्य और मजदूरी की कोई भी दर स्वीकार कर लेती है। असंगठित क्षेत्र की महिलाओं की आर्थिक.व्यवस्था का विष्लेषण करके सामाजिक न्याय और नीति.निर्धारण के दृष्टिकोण से दो निष्कर्षों का प्रतिपादन किया है-

1. जनसंख्या का उत्तरोत्तर बढ़ता हुआ अंष सीमान्त रेखा पर निवास कर रहा है।

2. असंगठित क्षेत्र में कम मजदूरी का श्रम उपलब्ध है इसलिए उद्यमी अपने अधिक से अधिक आर्थिक क्रिया.कलापों को ऐसे क्षेत्रों में करना होगा।

इनका परिणाम यह होगा कि इन महिला.कार्मिकों को आर्थिक.विकास की प्रक्रिया का कोई विशेष लाभ प्राप्त नहीं होगा। यह स्थिति न केवल महिलाओं की स्थिति के लिए घातक है वरन, आर्थिक.विकास की प्रक्रिया भी असंतुलित हो जायेगी।

परिणामतः भारत के सामाजिक.आर्थिक विकास की वृहद् प्रक्रिया के संदर्भ में ग्रामीण महिला की स्थिति की विवेचना करते हुए ज्ञात होता है कि एक ओर तो सामाजिक.सांस्कृतिक मान्यताओं, मर्यादाओं तथा पुरूष.प्रधान समाज एवं पितृ.सत्तात्मक पारिवारिक संगठन के परिणाम स्वरूप महिलाओं की प्रतिबंधित आर्थिक.सहभागिता को विस्तृत करने में सामाजिक.आर्थिक विकास, ग्रामीण पुनर्निर्माण कार्यक्रम और महिला आरक्षण कार्यक्रम ने पर्याप्त मात्रा में योगदान दिया है। किन्तु दूसरी ओर विकास की इसी प्रक्रिया निष्कर्ष के रूप में हम यह कह सकते हैं कि यदि हम ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक शक्ति एवं उनकी प्रभावषीलता का विस्तार चाहते हैं तो इसके लिए यह आवश्यक है कि पुरूष प्रधान समाज का नारी के प्रति दृष्टिकोण परिवर्तित हो। परिवार में महिलाओं के समाजीकरण एवं उसकी भूमिका के नवीन प्रतिमानों का विकास हो। यदि हम ऐसा करेंगे तो सही मायने में ग्रामीण महिलाएं आर्थिक रूप से सषक्त हो सकती है, जिससे भारतीय ग्रामीण समाज भी शहरीय समाज की भांति आर्थिक रूप से मजबूत एवं सषक्त होगा।

 

 

 

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz