लेखक परिचय

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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विकास गुप्ता

देश के हालात बहुत बद्तर हो चुके है। इसे हम घटिया भी कहे तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी। हमारे समाज में सब चलता है। आप गुटखा खाईये , आपके दांत खराब हो रहे हैं, चलता है। लोग कैंसर से मर रहे है कोई बात नहीं जनसंख्या में कमी हो रही है। विदेशी कंपनीयों की लूट जारी है लेकिन उसकी समझ समाज के बहुत नगण्य लोगों को है। शायद ये नगण्य लोग वहंी है जो खुद या तो बाजारवादी मीडिया के हिस्से है अथवा देशभक्ति के खंभे के नीचे रोटी-रोटी की चिन्ता में परेशान है। देश में घोटालों की लम्बी फेहरस्ती है… आजादी से ही घोटाले हो रहे है लेकिन सजा इक्के दुक्के को भी मिला हो कहना मुश्किल है। लेकिन सच्चाई से हमारा समाज कबतक भागेगा। भ्रष्टाचार के कीड़े चहुंओर बजबज़ा रहे है… तो समाज का कहना है कि आखिर हम क्या कर सकते है?

 

समाज के विपक्ष में:-

भ्रष्टाचार का असली जिम्मेदार समाज ही है। समाज का यह कथन की हम क्या कर सकते है? बहुधा असत्य प्रतीत हो रहा है। प्रश्न उठता है आखिर समाज जिम्मेदार क्यों है? तो अनेको ऐसे तथ्य हैं जिससे साबित होता है कि समाज ही जिम्मेदार है। आज समाज ग्लैमर के पीछे दिवाना हो चुका है। और दिवाना भी ऐसा कि लैला-मजनूं होते तो उनको शर्म आती।

अरस्तु की माने तो ”मनुष्य एक समाजिक प्राणी है” और ”समाज का निर्माण मनुष्य ही करता है” तब यह साबित हो जाता है कि मनुष्य ही समाज की स्थिति के लिए जिम्मेदार है। और जैसा हमारे समाज की अपेक्षाये है मनुष्य से, तो मनुष्य उसकी पूर्ति भी सही तरीके से कर रहा है। इससे इतर हमारे समाज ने परिभाषायें गढ़ ली है कि सफल वहीं है जिसके पास पैसा है, पदवी है आदि… आदि..। लेकिन समाज ने उन पैसों के सृजन में होने वाले कृत्य के प्रति अपनी तीसरी आंख बन्द कर रखी है। समाज की अपेक्षाओं पर जो खरा नहीं उतर रहा उसका हश्र इस नव समाज में क्या हो रहा है यह किसी से छुपा नहीं है। मेरा नाम जोकर समेत सैकड़ो फिल्मों में यादगार रोल करने वाले संतोष खरे कुछ दिनों पहले हजरतगंज, लखनऊ स्थित हनुमान मन्दिर के सामने लोगों के सामने हाथ फैला कर भीख मांगते नजर आये। उनके परिवार वाले सरकारी नौकरियों में है लेकिन उन्हें कोई नहीं पूछ रहा। आज समाज परिवारवाद और संयुक्तता को दरकिनार कर व्यक्तिवाद, अलगाववाद, एकान्तवाद आदि सिद्धान्तों को बहुधा अपनाने लगा है। अपार्टमेन्ट लाईफ इसका सटीक उदारण हो सकता है। कहा जाता है कि जुल्म करने वाले से ज्यादा जुल्म बर्दाश्त करने वाला जिम्मेदार होता है। आज समाज भेड़ो से भी बद्दतर तरीके से टेªनों, बसों में यात्रा करता है। लेकिन आवाज नहीं उठाता। थानों, कचहरी, सरकारी कार्यालयों में घूस देकर भी चुप रहता है। छुटभैये माफियाओं की दादागीरी से लेकर अनेकों मामलों में समाज मौन बनाये रखता है। रेहड़ी वाले, ठेले वाले, पान की दूकान से लेकर हर वो दूकान जो सरकारी जमीन पर है, थानों के रहनुमाओं को कमीशन देते ही है। और अपने ही लोगों पर अत्याचार, जुल्म होते देखकर मजे भी तो यही समाज लेता है। एक पक्ष यह भी है कि आजादी पश्चात् देश में चाणक्य टाईप के दूरदर्शी लोगों की नगण्यता थी जो अंग्रेजों और वैश्विक स्तर की साजिश और षडयंत्र को मात दे पाते। लेकिन प्रश्न यही खड़ा होता है कि अब तो हम पिछले 65 सालों से आजाद है तो फिर यह दशा क्यों है। अतः हम कह सकते है कि समाज भी वर्तमान समाज के ढांचे के लिए जिम्मेदार है।

 

समाज के पक्ष में

कहा जाता है कि समाज का काम शासन करना नहीं वरन शासित होना है। व्यवस्था प्रबंधन का कार्य शासन-प्रशासन और समाज के रसूखदार लोगों के लिये है। आम आदमी तो हमेशा ही मजबूर होता है। ट्रेन में जगह नहीं है अथवा यात्रियों की हिसाब से ट्रेने कम है तब आम आदमी मजबूर है भेड़-बकरियों की तरह यात्रा करने के लिये। कई बार तो ऐसा भी देखा जाता है कि आम आदमी को जबरन मजबूर किया जाता है। चाहे ट्रेन हो अथवा कोई अन्य सार्वजनिक यात्रा के साधन। बात मार-पीट तक पहुंच जाती है लेकिन टेम्पों और अन्यों को पता है आम आदमी जायेगा नहीं तो करेगा क्या? तो यह धंधा चल ही रहा है? कदम-कदम पर भ्रष्टाचार के ऐसे अनेको उदाहरण है कि आम आदमी मजबूर हो जाता है। सरकारी नौकरी, टेण्डर अथवा कुछ भी हो। पाने वालों की सूची बहुत लम्बी है। लोग कमीशन ले-लेकर लाईन में लगें है। दूसरा नहीं तो तीसरा और तीसरा नहीं चाौथा। तो समाज मजबूर होकर पैसे ले-देकर अपनी स्थिति मजबूत कर लेता है। और उसे डर भी है कि अगर हमारी स्थिति कमजोर हुयी तो फिर इस दोगलेपन की मानसिकता वाले समाज में जीना दूभर हो जायेगा।

 

वर्तमान समाज का रहस्य

पहले गीता रहस्य के बारे में आपने सुना होगा। क्योंकि गीता में बहुत से ऐसे गूढ़ रहस्य बताये जाते है जो अच्छे-अच्छे बाबाओं के समझ से बाहर हैं। ठीक वैसे ही आज के समाज का रहस्य भी समझना नितांत आवश्यक हो गया है। समाजिक प्रतिद्वंद्विता के दौर में जिस समाज में हम रह रहे हैं कम से कम उसकी थोड़ी-बहुत समझ तो होनी ही चाहिये। वर्तमान में समाज के पांच मुख्य प्रकार है हालांकी इन पांच वर्गो में बहुत सारे अपवाद भी है फिर भी पहले स्थान पर है देश के गैरसरकारी दामाद। इनके लिये कोई भी नियम-कानून लागू नहीं। जो जी में आये करों सब माफ। मतलब सात खून माफ। और इनके समूह में चमचागीरी की पाठशाला के अनेको गणमान्य प्रोफेसरों की लम्बी कतारें हैं। समाज के अन्य वर्गों में यहीं से चाणक्य नीति की समझ और अनेकों अपरम्पार कर देने वाली लीलायें भी समय-समय पर पहुंचती रहती है।

दूसरे है सरकारी दामाद तो इनके लिये अंग्रेजी व्यवस्था की अपने कर्मचारियों के उपर लागू की गयी दरियादिली वाला कानून लागू है। अतः किसी मामले में फंस जाने पर भी इनके मरने तक मुकदमें चलते रहते है और इनकी नौकरी भी चलती रहती है। और अगर कोई सरकारी दामाद देश के गैर सरकारी दामाद के करीबी है तब पूछना ही क्या इनके उपर भी सात खून माफ वाला कानून प्रभावी हो जाता है। और इनके समाज में सबसे बड़ा रहस्य है चमचागीरी का जोकि देश के गैरसरकारी दामादों से इन्हें विरासत में मिला है। क्योंकि प्रमोशन और अन्य भत्ते अथवा कमीशन में ज्यादा हिस्सेदारी के लिये ओहदा बड़ा होना चाहिये तो ये जिन्दगी भर इसी फिराक में रहते है। और इनके लिये भी चाहे जो हो.. करते रहो…देश आजाद है और देश के सरकारी और गैर सरकारी दामाद भी आजाद है। जैसे भगवान की आरती करने से भगवान खुश होते है वैसे ही ओहदे में रसूख वालों लोगों की आरती करते रहो नैया पार हो जायेगी।

तीसरे है पैसो के दामाद। देश की आर्थिक ताकत अपने बाजुओं में समेटे इन लोगों का एक ही प्रोटोकाॅल है। जो भी देश का गैरसरकारी दामाद हो उसकी आरती करते रहो और सरकारी दामाद को हड्डी पकड़ाते रहो। खुद भी लूटों और लूट का हिस्सा उन्हें भी देते रहो। नैया नदी की धार में बहती रहेगी। सोसायटी में इनके पीछे देश के गैर सरकारी दामाद और सरकारी दामाद लगे रहते है पैसों के लिये। तो ये पैसों के दामाद ज्यादा से ज्यादा पैसा बनाने की हर जुगत करते है। ताकि गैर सरकारी और सरकारी दामादों की कमीशन पूरी की जा सके।

चैथे में साधारण दामाद है। इस वर्ग में छोटी मोटी बिना घूस की नौकरी वाले लोग। साधारण व्यापारी और छोटे-मोटे मीडिया के लोग आते है। इनमें होड़ लगी है कि कैसे ऊपर के तीन दामादों में शामिल हो जाये। चैथे समाज से ही लोग उपरोक्त तीनों समाजों में पहुंचते रहते है। इसीलिए इस चैथे समाज में एक कूढ़न होने लगी है। अपने ही बीच के लोगों को ऊपर के तीन दामाद बनते देखकर। अतः यह वर्ग हैरान, परेशान है। कभी इस वर्ग का झुकाव अध्यात्मवाद की तरफ तो कभी सांख्यवाद की तरफ तो कभी पूंजीवाद की तरफ। इस चैथे समाज की डोर हमेश गैरसरकारी दामादों की हाथों में रहता है और वे ससमय इसका सटीक प्रयोग करते है।

 

और पांचवे में वे लोग है जो फूटपाथ और रोड पर भीख मांगते देखे जाते है।

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