लेखक परिचय

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

प्रोफेसर जैन ने भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के निदेशक, रोमानिया के बुकारेस्त विश्वविद्यालय के हिन्दी के विजिटिंग प्रोफेसर तथा जबलपुर के विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिन्दी एवं भाषा विज्ञान विभाग के लैक्चरर, रीडर, प्रोफेसर एवं अध्यक्ष तथा कला संकाय के डीन के पदों पर सन् 1964 से 2001 तक कार्य किया तथा हिन्दी के अध्ययन, अध्यापन एवं अनुसंधान तथा हिन्दी के प्रचार-प्रसार-विकास के क्षेत्रों में भारत एवं विश्व स्तर पर कार्य किया।

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देश की दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों के आचरण एवं करनी-कथनी के अंतराल के कारण, देश की जनता में राजनेताओं एवं राजनैतिक व्यवस्था के प्रति अवहेलना, उपेक्षा, तिरस्कार एवं नफरत के भाव बढ़ते जा रहे हैं। जनता के मन में यह विश्वास मज़बूत होता जा रहा है कि देश के नेताओं को देश से अधिक, सत्ता पर काबिज़ होने की चिंता है। इन दलों के नेतृत्व को यह सोचना चाहिए कि क्षेत्रीय दलों का प्रभाव क्यों बढ़ता जा रहा है। उनका वर्चस्व क्यों घटता जा रहा है। आज वस्तुतः प्रत्येक पार्टी के नेता को आत्म-मंथन करने की जरूरत है।

भारत एक सम्पूर्ण प्रभुता सम्पन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य है।कुछ स्वार्थी लोग इन बुनियादी मूल्यों को भी विवादास्पद बनाने का षड़यंत्र कर रहे हैं। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद हमने लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था का वरण किया; संविधान निर्माताओं ने तदनुरूप संविधान का भी निर्माण किया। मगर क्या व्यवहार में तदनुरूप शासन व्यवस्था परिचालित हो रही है। क्या प्रत्येक राजनैतिक दल का प्रत्येक राजनेता यह मानता है कि देश के प्रत्येक नागरिक के समान अधिकार हैं। क्या प्रत्येक राजनेता देश के प्रत्येक नागरिक को आत्म तुल्य मानता है एवं तदनुरूप व्यवहार एवं आचरण करता है अथवा वर्णों, जातियों, सम्प्रदायों, प्रान्तों आदि का लेबिल चिपकाकर भारतीय समाज को विभाजित करने वाले दर्शन के रूप में यकीन करता है तथा अपने दल के वोट बैंक के लिए तदनुरूप काम करता है।

यह भी विचारणीय है कि क्या भारतीय समाज की मानसकिता एवं आचरण लोकतंत्रात्मक दर्शन के अनुरूप है। भारतीय समाज की सोच एवं चिंतन लोकतंत्रात्मक दर्शन के अनुरूप है अथवा आज भी उसकी सोच में राजतंत्रात्मक दर्शन के अवशेष विद्यमान हैं।
यदि नेताओं एवं समाज की सोच लोकतंत्रात्मक होती तो हमारे देश का कोई भी नेता राजाओं-महाराजाओं की भाँति आचरण करने की हिम्मत नहीं कर पाता। रथों पर सवार होकर प्रचार करने की जुर्रत नहीं कर पाता। मंच पर मुकुट नहीं पहनता। म्यान से तलवार निकालकर दिखाने की हिम्मत नहीं करता। मैं यह समझने में असमर्थ हूँ कि धर्मनिरपेक्ष  देश में वोट बटोरने के लिए राजनैतिक दल धर्म के नाम पर अपील कैसे ज़ारी कर पाते हैं। समाजवादी देश में राजनैतिक दल जाति के नाम पर सम्मेलन कैसे आयोजित कर पाते हैं।

जिस प्रकार कभी कांग्रेस में कुछ लोगों ने “इंदिरा इज़ इंडिया” का नारा लगाकर व्यक्ति पूजा की परम्परा डाली थी और लोकतंत्रात्मक दर्शन में विश्वास करने वाले लोगों ने उसकी आलोचना की थी, उसी प्रकार अब मोदी को देश के विकास के लिए एक मात्र विकल्प के रूप में पेश किया जा रहा है। विकास के मोदी मॉडल का मिथक गढ़ा जा रहा है। क्या गुजरात के तथाकथित विकास का सारा श्रेय मोदी को है। लाल कृष्ण आडवाणी ने भोपाल में ठीक ही कहा था कि जब हमने नरेंद्र मोदी को गुजरात भेजा था तो गुजरात पहले से विकसित था। गुजरातियों ने अमेरिका में जाकर जो विकास किया है, वह गुजरातियों की निष्ठा एवं श्रम-शक्ति के कारण है अथवा नरेंद्र मोदी के कारण। गुजरात विकसित है तो उसका सारा श्रेय यदि मोदी को है तो फिर ऐसा क्यों है कि गुजराती भाई दुनिया के जिस भाग में जाते हैं, अपनी प्रतिभा के कारण वे वहाँ अपना गौरवपूर्ण स्थान बना लेते हैं। मोदी के मुख्य मंत्री बनने के बाद गुजरात की विकास दर के दावों का इंटरनेट पर मोदी की डिजिटल पेड टीम के द्वारा जो ढिंढोरा पीटा जा रहा है, उसकी हकीकत को जानने की भी जरूरत है। गुजरात की सकल आय से यदि सात-आठ कॉरपोरेट घरानों की आय घटा दें तो फिर गुजरात की विकास दर क्या रह जाएगी।

यह भी विचारणीय है कि विकास के मॉडल के प्रतिमान क्या हों। इस सम्बंध में अलग अलग विचार हो सकते हैं। विकास के अलग अलग मॉडल हो सकते हैं। हम किस मानक या कारक के आधार पर विकास को नाप रहे हैं, इस दृष्टि से भिन्न निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से सामाजिक सरोकारों को चिंता न कर, केवल चुनिंदा कॉरपॉरेट घरानों को लाभ पहुँचाने वाले विकास के मॉडल की वकालत नहीं कर सकता। सामाजिक बदलाव की कसौटी पर परखें तो गुजरात के विकास की अपेक्षा बिहार का विकास श्रेयस्कर है। सामाजिक सरोकारों की कसौटी पर परखें तो गुजरात की अपेक्षा केरल, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश आदि राज्यों का विकास बेहतर है। एक पर्यटक की दृष्टि से विचार करें तो गुजरात राजस्थान के आगे कहीं नहीं ठहरता। दो वर्ष पूर्व, हमने अपने मित्रों सहित राजस्थान एवं गुजरात दोनों राज्यों की यात्रा की तथा दोनों राज्यों के सभी महत्वपूर्ण पर्यटक स्थलों को देखा। राजस्थान के पर्यटन विकास के अतिथि आवास गृहों में हमें जो सुविधाएँ प्राप्त हुईं उनकी तुलना में गुजरात ने हमें निराश किया। गुजरात में पहुँचने पर हमें लगभग हर 50 किलोमीटर के बाद टोल टैक्स चुकाना पड़ा। टोल टैक्स की राशि भी राजस्थान की अपेक्षा बहुत अधिक थी। इसी प्रकार होटल में खाना खाने के बिल पर राजस्थान की अपेक्षा गुजरात में वेट का प्रतिशत अधिक था। कोई भी व्यक्ति राजस्थान और गुजरात के टोल टैक्स और वेट की दर का तुलनात्मक अध्ययन कर ले। मुझे विश्वास है कि वह आज भी उसी निष्कर्ष पर पहुँचेगा। विद्वान एवं तटस्थ चिंतक इस पर विचार करें। वैसे भी लोकतंत्रात्मक देश में किसी भी व्यक्ति को अपरिहार्य नहीं ठहराया जाना चाहिए। आप स्वयं विचार करें कि लोकतंत्र में “लोक” का महत्व है या “व्यक्ति विशेष” का।

भाजपा में आरम्भ से दो तरह के लोग रहे हैं। एक उदारवादी, प्रगतिशील, सहिष्णु, खुले दिमाग वाले, पूर्वाग्रहहीन एवं भारत की सामासिक संस्कृति को स्वीकारने वाले। दूसरी तरह के वे लोग रहे हैं जो कट्टरवादी, अनुदार, हठी, बंद दिमाग वाले, रूढ़िवादी, अपने विचारों से असहमत होने वालों के प्रति अमानवीय व्यवहार करने वाले एवं उन्हें आतंकित करने वाले। पहले वर्ग का प्रतिनिधि चेहरा अटल बिहारी वाजपेयी का था। दूसरे वर्ग का प्रतिनिधि चेहरा गुजरात के मोदी का है। भाजपा के नेतृत्व को यह निश्चित करना है कि वह भविष्य की भाजपा को किस मार्ग पर ले जाना चाहता है। अटल बिहारी वाजपेयी के रास्ते पर अथवा गुजरात के मोदी के रास्ते पर।

भारत का प्रधान मंत्री वही हो सकता है जिसे केन्द्रीय सरकार को चलाने का अनुभव हो। एक राज्य का नेता भारत का नेता नहीं हो सकता। एक समुदाय का नेता भारत का नेतृत्व नहीं कर सकता। सरकार चलाने के लिए अनेक क्षेत्रीय दलों का सहयोग चाहिए। नरेंद्र मोदी के “डॉटकॉम पोस्टर बॉय्ज़” राजेश जैन एवं बी. जी. महेश के नेतृत्व में गठित कथ्य एवं कंप्यूटर की तकनीक दोनों के माहिर विशेषज्ञों की टीम के उत्साही सदस्य रात-दिन  इंटरनेट एवं मीडिया में ऐसा अभियान चला रहे हैं जिससे विदेशों में रहने वाले मेरे कुछ मित्रों को यह भ्रम हो गया है  सन् 2014 के लोक सभा के होने वाले आम चुनावों में भाजपा को 275 सीटें मिल जायेंगी और भारत के अगले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ही होंगे। जमीनी हकीकत से वे बिलकुल अनजान हैं। वे अनजान हैं कि उत्तर-प्रदेश में न तो कांग्रेस का जनाधार है और न भाजपा का। भाजपा के मेरे कुछ मित्र दावा करते हैं कि हमारे पक्ष में वातावरण बनाने का काम पहले चरण में विश्व हिन्दू परिषद करेगी और दूसरे चरण में संघ शामिल हो जाएगा। राम मंदिर निर्माण के मुद्दे पर भाजपा जनता को कब तक दिग्भ्रमित करेगी। गुजरात के फेक पुलिस एन्काउंटर केस के आरोपी अमित शाह अयोध्या में जाकर राम मंदिर निर्माण का पुराना राग जोर-शोर से गुँजाते हैं और उसके बाद राम मंदिर से जुड़े कुछ भाजपा नेताओं के तथा भाजपा के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के चेहरे के बयान आते हैं कि भाजपा के एजेंडे में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा रहा है, वर्तमान में है और हमेशा रहेगा। भाजपा ने कभी भी यह मुद्दा नहीं छोड़ा। हम अयोध्या में राम के भव्य मंदिर का निर्माण करेंगे। दो-तीन दिनों तक भाजपा के नेता राम मंदिर के मुद्दे को फिर से गर्माते हैं। मगर पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह पंजाब के अमृतसर में 7 जुलाई, 2013 को पहुँचते हैं तो उनका बयान 8 जुलाई, 2013 के समाचार पत्र में प्रकाशित होता हैः

“राम मंदिर कभी भाजपा का मुद्दा नहीं रहाः राजनाथ। अमृतसर (पंकज शर्मा)। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि राम मंदिर कभी भाजपा का मुद्दा नहीं रहा है। कांग्रेस और उस जैसी पार्टियाँ हमें कमजोर करने के लिए सांप्रदायिकता का लेबल लगाती रही हैं”। (अमर उजाला, नई दिल्ली, 8 जुलाई, 2013, पृष्ठ 14)

हम किसके बयान पर यकीन करें। अगर राम मंदिर कभी भाजपा का मुद्दा नहीं रहा तो यह स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि राजनाथ सिंह ने जिसे अपने प्रदेश का प्रभारी नियुक्त किया, उसने पार्टी के अध्यक्ष के बयान के ठीक विपरीत बयान किस प्राधिकार से दे दिया। अगर प्रभारी ने गलत बयानी की तो या तो उसे अपनी गलती के लिए माँफी माँगनी चाहिए या फिर उसे भाजपा से उसी प्रकार निष्कासित कर देना चाहिए जिस प्रकार यौन शोषण के आरोप में घिरे मध्य प्रदेश के वित्त मंत्री राघव को भाजपा से निष्कासित कर, पुलिस में उनके खिलाफ एफ.आई.आर. भी दर्ज करा दी गई। दोहरे मापदण्ड के क्या कारण हैं। राम मंदिर निर्माण के मुद्दे के कारण एक बार भाजपा का उत्तर-प्रदेश में ग्रॉफ बहुत ऊँचा चला गया था। जनता भूली नहीं है कि राम के सहारे वैतरणी पार करने के बाद भाजपा ने भगवान राम के साथ क्या किया था। काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती।

यह जमीनी हकीकत है कि उत्तर-प्रदेश में या तो एस.पी. का जनाधार है या बी.एस.पी. का। उपचुनावों में जो परिणाम आए हैं उनमें कांग्रेस और भाजपा के प्रत्याशी तो जमानत भी न बचा पाए। विदेशों में निवास करने वाले भाजपा के समर्थक यह तो मानते हैं कि कर्नाटक में भाजपा को भारी विफलता मिली और वह राज्य भाजपा के हाथ से निकल गया, मगर वे इसका कारण यादुरप्पा की बगावत को मान कर संतोष कर लेते हैं। वे यह याद नहीं रख पाते कि केवल कर्नाटक में ही नहीं अपितु उत्तराखण्ड एवं हिमाचल प्रदेश में भी भाजपा को पराजय का सामना करना पड़ा और ये दोनों राज्य भी उसके हाथ से निकल गए। यदि भाजपा को वर्तमान प्राप्त सीटों की अपेक्षा कुछ सीटें ज्यादा मिल भी गईं तो मोदी के प्रधान मंत्री बनने का तो सवाल ही नहीं उठता। जिसकी स्वीकार्यता अपनी पार्टी में ही नहीं है तथा जिसके कारण तथाकथित एन. डी. ए. का विगत 17 वर्षों का सहयोगी दल उससे अलग हो गया, उसके नाम पर सहयोगी कहाँ से जुटेंगे। मैं शिव सेना की राजनीति का कभी समर्थक नहीं रहा। इसका कारण यह है कि वह देश की एकता को नष्ट करने वाली पार्टी है। उत्तर-प्रदेश एवं बिहार के मेहनती लोगों पर उसने जो जुर्म किए हैं – यह हम कैसे भूल सकते हैं। मगर शिव सेना के उद्धव ठाकरे के एक वाक्य को अवश्य उद्धृत करना चाहूँगा। “सहयोगी पेड़ों पर नहीं उगते”।

खुदा न खास्ता, यदि भाजपानीत सरकार बनने की नौबत आ भी गई तो भाजपा से प्रधान मंत्री की कुर्सी पर आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा, सुषमा स्वराज तथा जेटली जैसे लोगों में से कोई एक हो सकता है। उत्तराखण्ड की त्रासदी में भी जिसे केवल गुजरातियों की ही चिंता रही, उसे भाजपा का भावी चेहरा निरूपित करने का मतलब होगा कि राजनाथ जैसे नौसिखिया भाजपा को केवल गुजरात तक सिमटा देना चाहते हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से भाजपा के वर्तमान नेताओं में से प्रधान मंत्री की कुर्सी के लिए सुषमा स्वराज को सबसे अधिक उपयुक्त मानता हूँ। वे भारतीय जनता पार्टी द्वारा लोक सभा में विपक्ष की नेता चुने जाने के कारण वर्तमान लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता हैं। अटल जी के मंत्री मंडल में रहकर उनको केन्द्र की सरकार को चलाने का अनुभव प्राप्त है। इसके पूर्व उनको दिल्ली की मुख्य मंत्री के रूप में कार्य करने का भी अनुभव है। एक बात और। सुषमा जी के चयन से देश में यह संदेश जाएगा कि भले ही कोई संघ-परिवार का सदस्य न रहा हो मगर यदि उसने पार्टी के लिए काम किया है और वह अपेक्षाकृत अधिक योग्य है तो उसको कमान सौंपी जाएगी। भाजपा राजनैतिक दल है, उसकी अपनी अस्मिता है, उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व है। वह संघ की बी. टीम नहीं है। अगर भाजपानीत सरकार बनती है तो आडवाणी जी उस भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं जो वर्तमान कांग्रेसनीत सरकार में सोनिया जी की है।

गुजरात के नर संहार के बाद भाजपा के तत्कालीन प्रधान मंत्री एवं सबसे अधिक सम्मानीय एवं लोकप्रिय अटलबिहारी वाजपेयी जी ने गुजरात में अहमदाबाद की आम सभा में  मोदी के सामने राजधर्म का पालन न होने की घोषणा की थी। “डॉटकॉम पोस्टर बॉय्ज़” राजेश जैन एवं बी. जी. महेश के नेतृत्व में गठित कथ्य एवं कंप्यूटर की तकनीक दोनों के माहिर विशेषज्ञों की टीम के सदस्यों में से किसी ने “यू ट्यूब” पर एक सी.डी. डाल दी है जिसमें अटलजी कह रहे हैं कि राजधर्म का पालन हुआ। निषेधात्मक वाक्य को विधेयात्मक वाक्य में बदल दिया गया है। उस सी.डी. के डालने का उद्देश्य युवा पीढ़ी को भ्रमित करना प्रतीत होता है। जिस पीढ़ी ने तत्कालीन असली सी.डी. को अनेक दिनों तक टी.वी. के अनेक चेनलों पर बार बार देखा और सुना है, वह तो नकली सी.डी. से भ्रमित होने से रही।

देश की दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के सदस्यों पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। कुछ मित्र केवल वर्तमान सरकार के घोटालों की एक पक्षीय चर्चा करते हैं। मैं किसी पार्टी का प्रवक्ता नहीं हूँ तथा यह मानता हूँ कि देश की केंद्रीय सत्तारूढ़ कांग्रेस का दामन भी पाक-साफ़ नहीं है। यू.पी.ए. -2 के शासन में एक के बाद दूसरे घोटाले हुए हैं। टूजी के घोटाले में कांग्रेस के नेताओं की दलील थी कि यह घोटाला घटक दल के मंत्री ने किया है। जनता ने इसे गठबंधन की राजनीति की विवशता मानकर खून का घूँट पी लिया। रेल मंत्रालय के मंत्री घटक दल के नहीं अपितु स्वयं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे। उनकी छवि ईमानदार नेता की थी। जब रेलवे के घूसकांड में उनका नाम उजागर हुआ, मंत्री जी ने दलील दी कि मेरे अपने भांजे से कारोबारी रिश्ते नहीं हैं। इस दलील के कारण न केवल यू.पी.ए. के घटक दलों ने ही उनका बचाव किया, तत्कालीन विपक्षी एन.डी.ए. के संयोजक शरद यादव ने भी उनका बचाव किया। मगर जब मामा और भांजे के कारोबारी रिश्ते जग-जाहिर हुए तब मैंने लिखा था कि ऐसी स्थिति में भी उनको मंत्री-मंडल में बनाए रखने का औचित्य नहीं है। ऐसा करके कांग्रेस न केवल नैतिक दृष्टि से अपितु राजनैतिक दृष्टि से भी आत्मघाती काम कर रही है। मूल्यों के प्रति जागरूक कोई भी व्यक्ति इसका समर्थन नहीं कर सकता। अब जनता जागरूक हो गई है। मीडिया भी सजग है। कोई भी पार्टी जनता को अब आसानी से बेवकूफ नहीं बना सकती। यह कांग्रेस के हित में हुआ कि समय रहते उन्होंने पद से त्याग पत्र दे दिया।

इस प्रसंग में, मैं यह सवाल उठाना चाहता हूँ कि क्या भाजपा का दामन बिलकुल पाक-साफ है।वर्तमान सरकार ने जब से हमें सूचना का अधिकार प्रदान किया है तब से भ्रष्टाचारियों के काले कारनामें सामने आ रहे हैं। यदि यह अधिकार जनता को पहले मिल गया होता तो क्या भाजपानीत सरकार के आधे मंत्री जेल में न होते। जिस पार्टी का अध्यक्ष रिश्वत लेते हुए कैमरे में कैद हो गया हो और पैसे के बारे में टिप्पण करे कि यह खुदा से कम नहीं, उस पार्टी के बाकी कितने लोगों ने रिश्वत खाई होगी, इसकी कल्पना की जा सकती है। विचारणीय है कि मीसा में बंदी होने के पहले जिनके घर में चूल्हा भी मुश्किल से जलता था, वे एन.डी.ए. के शासन के दौरान “अरबपति” कैसे बन गए।

जब कर्नाटक में भाजपा का शासन था और रेड्डी बंधुओं और तत्कालीन मुख्यमंत्री यादुरप्पा के भ्रष्टाचार के किस्से समाचार-पत्रों की सुर्खियाँ बन रहे थे, तब आडवाणीजी ने गडकरी से इन लोगों को हटाने के लिए कहा था। गडकरी ने आडवाणीजी की बात बहुत विलम्ब से मानी। परिणाम सबके सामने है।

चूँकि आडवाणीजी ने यादुरप्पा को हटाने के लिए कहा था, इस कारण अब तमाम ऐसे भ्रष्ट लोगों को भाजपा में वापिस लाने की कोशिशें होंगी जिनको आडवाणीजी के कारण हटाया गया था। भाजपा के अधिकांश प्रवक्ता टी. वी. के विविध चेनलों द्वारा संचालित बहसों में हर मुद्दे पर एक शब्द का प्रयोग अवश्य करते हैं। वह शब्द है, “शुचिता”। लगता है उनको यह शब्द उसी तरह रटाया गया है जैसे तोता पालने वाले अपने तोता को एक-दो शब्द रटा देते हैं और तोता उन रटे शब्दों का उच्चारण करता रहता है। बहस का मुद्दा चाहें कुछ भी हो, वे बार-बार शुचिता का उच्चारण जरूर करते हैं। लक्ष्मण बंगारू भाजपा पार्टी के सामान्य कार्यकर्ता नहीं थे, वे पार्टी के अध्यक्ष थे। उन्होंने जो आचरण प्रस्तुत किया तथा जिसे भारत के लोगों ने टी.वी. पर अपनी आँखों से देखा और कानों से सुना, क्या यही शुचिता का प्रतिमान है। उत्तर-प्रदेश में बसपा से भ्रष्टाचार के लिए निकाले गए बाबू सिंह कुशवाहा को चुनाव के समय भाजपा में शामिल करना तथा बाबू सिंह कुशवाहा द्वारा भाजपा के पक्ष में प्रचार कराना  शुचिता ही तो है। उत्तर-प्रदेश के भाजपा के वर्तमान 47 विधायकों में से 25 विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं और इनमें 14 विधायकों पर गम्भीर आरोप हैं। यह शुचिता ही तो है। कर्नाटक के यादियुरप्पा और रेड्डी बंधु, गुजरात के बाबूभाई बोखरिया और अमित शाह, मध्य प्रदेश के राघव, छत्तीसगढ़ के दिलीप सिंह जूदेव आदि-आदि शुचिता के उदाहरण हैं। यह तथ्य है कि प्रायः प्रत्येक राजनैतिक दल के संसद सदस्य एवं विधायकों पर गम्भीर अपराध के प्रकरण न्यायालय के विचाराधीन हैं मगर यदि हम तुलनात्मक अध्ययन करें तो इस मामले में भाजपा का स्थान पहले नम्बर पर आता है। भाजपा के 118 निर्वाचित माननीयों पर गम्भीर अपराध के प्रकरण दर्ज हैं। ( देखें – टॉइम्स ऑफ इंडिया, पृष्ठ 9, दिनांक 13 जुलाई, 2013)।

बोधगया के बौद्ध मंदिर में आतंकवादी घटना के तत्काल बाद राज नाथ सिंह ने अपना प्रिय वक्तव्य दोहरा दिया कि वर्तमान सरकार आतंकवादी घटना से निबटने में सक्षम नहीं है। वे भूल जाते हैं कि आतंकवादी घटनाएँ संसार में हर जगह हो रहीं हैं और फिर भाजपानीत सरकार के दौरान तो संसद भवन पर भी आतंकवादी हमला हुआ था और मोदी की नाक के नीचे अहमदाबाद का अक्षरधाम मंदिर भी आतंकवादी घटना से अछूता नहीं रहा। मैं यह कहना चाहता हूँ कि आतंकवादी घटना होने के बाद राजनीति नहीं होनी चाहिए, आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति नहीं होनी चाहिए। सबको एकजुट होकर इसका मुकाबला करना चाहिए।

जिस प्रकार “लोकतंत्र” संवैधानिक जीवन मूल्य है उसी प्रकार “धर्मनिरपेक्ष” संवैधानिक जीवन मूल्य है। एक बार भारत की प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने देश पर आपात काल थोपकर लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत कदम उठाया था और उनको इसका परिणाम भुगतना पड़ा था। जो देश के सेकुलर अथवा  धर्मनिरपेक्ष स्वरूप से छेड़छाड़ करने की कोशिश करेगा, उसको भी उसका परिणाम भुगतना पड़ेगा। लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता एवं समाजवाद हमारे जीवन मूल्य हैं। हमारे विकास का मॉडल इन्हीं जीवन मूल्यों पर आधारित होना चाहिए। विकास के परिप्रेक्ष्य में प्रत्येक राजनैतिक दल को सचेत रहना है कि ऐसा कोई काम न होने पावे जिससे भारतीय समाज की मूलभूत एकता में कोई दरार न पड़ जाए।

क्या यह सही नहीं है कि कुछ राजनीतिज्ञों का व्यवहार कुटिलता की सीमायें भी लाँघ गया है। संसद के पवित्र मंदिर में बैठकर जो संसद-सदस्य स्कूलों, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों के शरारती, ऊधमी, अराजक एवं बदमाश लड़कों अथवा मौके की तलाश में रहने वाले असामाजिक-तत्वों के समान उछलकूद, उठापटक, हुल्लड़ एवं हुड़दंग करते हैं, संसद की सारी मर्यादाओं को तार-तार करते हैं क्या उनकी अंतरात्मा उन्हें कभी नहीं कचोटती, कभी नहीं धिक्कारती। क्या जनता के लिए कल्याणकारी विधेयकों को पारित होने से रोकने के लिए संसद को न चलने देना किसी भी तर्क से जायज़ ठहराया जा सकता है। उनके प्रति यदि जनता की आस्था समाप्त होती जा रही है तो यह दोष उनका है या यह दोष भी जनता का ही है। क्या लोकतंत्र में राजनैतिक जीवन की सफलता एवं स्थायित्व के लिए जनता के मन में अपने राजनेताओं के प्रति यह विश्वास नहीं होना चाहिए कि उनका प्रतिनिधि ईमानदार है, विश्वसनीय है ; उसके अन्दर जनसेवा की भावना है। यदि ऐसी स्थिति निर्मित हो गई है कि जनता का बहुमत कुछ राजनेताओं के कथन पर विश्वास नहीं कर पा रहा है अथवा उनके  क्रियाकलापों को संशय एवं सन्देह की दृष्टि से देख रहा है तथा उनके विरुद्ध टिप्पणी करने का साहस कर पा रहा है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? क्या लोकतंत्र में जनता के प्रतिनिधि के व्यवहार एवं आचरण में निष्कपटता एवं ईमानदारी नहीं होनी चाहिए।

हमें अपने हाथों अपने देश का भविष्य बनाना है। यह आपस में लड़कर नहीं, मिलजुलकर काम करने से ही सम्भव है। यह भारत देश है। भारत में रहने वाले सभी प्रांतों, जातियों, धर्मों के लोगों का देश है। सबके मिलजुलकर रहना है, निर्माण के काम में एक दूसरे का हाथ बटाना है। समवेत शक्ति को कोई पराजित नहीं कर सकता।क्या हम ऐसे नेताओं की आरती उतारें जो वोट-बैंक की खातिर हमारे देश के समाज को समुदायों में बांटने का तथा उन समुदायों में नफरत फैलाने का घृणित काम करते  हैं।

अलकायदा एवं भारत के विकास तथा प्रगति को अवरुद्ध करने वाली विदेशी शक्तियाँ तो चाहती ही यह हैं कि भारत के लोग आपस में लड़ मरें। भारत के समाज के विभिन्न वर्गों में द्वेष-भावना फैल जाए। देश में अराजकता व्याप्त हो जाए। देश की आर्थिक प्रगति के रथ के पहिए अवरुद्ध हो जायें। मेरा सवाल है कि जो नेता अपनी पार्टी के वोट बैंक को मज़बूत बनाने की खातिर देश को तोड़ने का काम करते हैं,  वे क्या भारत-विरोधी शक्तियों के लक्ष्य की सिद्धि में सहायक की भूमिका का निर्वाह नहीं कर रहे हैं। देश को कमजोर करने तथा समाज की एकता एवं समरसता को तोड़ने वाले नेताओं का आचरण वास्तव में लोकतंत्र का गला घोटना है। नेताओं को यह समझना चाहिए कि दल से बडा देश है, देश की एकता है, लोगों की एकजुटता है। लोकतंत्र में प्रजा नेताओं की दास नहीं है। नेता जनता के लिए हैं, जनता के कल्याण के लिए हैं। वे जनता के स्वामी नहीं हैं; वे उसके प्रतिनिधि हैं।यह तो पढ़ा था कि राजनीति के मूल्य तात्कालिक होते हैं। उत्तराखण्ड की विनाश-लीला में भी जिस प्रकार की घिनोनी राजनीति हुई, उससे क्या यह संदेश नहीं गया कि  राजनीति मूल्यविहीन हो गई है। क्या यह संदेश नहीं गया कि नेताओं के लिए देश की कोई चिंता नहीं है,  उन्हें चिंता है तो बस किसी प्रकार सत्ता मिल जाए।

भारत के उज्जवल भविष्य के लिए मैं आशान्वित हूँ। सुप्रीम कोर्ट ने दागी नेताओं का राजनीति में आकर पूरे माहौल को गंदा बनाने का जो रास्ता बंद किया है, उसके दूरगामी सुखद परिणाम होंगे। परम परमात्मा इन नेताओं को सद् बुद्धि प्रदान करे कि वे आत्मसात कर सकें कि दल से बड़ा देश होता है। जब तक हम अपने देश के विकास एवं प्रगति के लिए कटिबद्ध रहेंगे, एकजुट रहेंगे, समवेत शक्ति को कोई ताकत पराजित नहीं कर सकती, आतंकवादी ताकतों के मंसूबे पूरे नहीं हो सकते, विश्व की सबसे बड़ी ताकत बनने से कोई हमें रोक नहीं पाएगा। विकास से ज्यादा महत्वपूर्ण है – भारतीय समाज की एकता।

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