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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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gas प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर एलपीजी सब्सिडी छोड़ने का असर देश भर में दिखायी दे रहा है. 31 मार्च 2015 तक तीन लाख ग्राहक अपनी सब्सिडी छोड़कर लागत मूल्य पर घरेलू गैस खरीद रहे हैं. बैंगलोर में राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक के बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी के सभी सांसद-विधायकों से सब्सिडी छोड़ने का अनुरोध किया है उन्हांेने एक पत्र भी इस आशय का जारी किया। निश्चित तौर पर मोदी का यह अभियान प्रसंसनीय है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन विपक्ष इसे भी अपनी आलोचना के निशाने पर ले रहा है. खासकर वामपंथी दल तो इसे मोदी की तानाशाही तक बताकर विरोध कर रहे हैं. अतुल अंजान, डी. राजा सरीखे नेता इसका स्वागत करने की जगह कारपोरेट छूट का मामला उठाकर इस पहल को बेकार का बता रहे हैं. कांग्रेस प्रवक्ता अजय माकन भी इससे खुश नहीं है. कुल मिलाकर देश की संसदीय राजनीति इतनी अनुद्धार हो चली है कि देश हित के किसी भी निर्णय पर सर्वानुमति का तत्व गायब हो चुका है. वरन् 70 के दशक तक सरकार के निर्णयों का गुणदोष के आधार पर आंकलन कर आलोचना के अधिकार का प्रयोग होता रहा है। सिर्फ विरोध के लिए विरोध की राजनीति संसदीय राजनीति के भविष्य पर भी सवाल खड़े करने का काम कर रहा है.

इसी संसद में बांग्लादेश विजय पर तबकी प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी का समवेत अभिनंदन पूरी दुनिया ने सुना था. और अटल जी ने इंदिरा गांधी को संसद में दुर्गा का अवतार कह कर संसदीय राजनीति की खूबसूरती और शक्ति को प्रदर्शित करने में संकोश नहीं किया. इलाहाबाद की सड़कों पर जब श्रीमती गांधी का काफिला गुजर रहा था तबके विपक्षी नेताओं ने उनका रास्ता रोककर स्वागत करने में गुरेज नहीं किया। लेकिन राष्ट्रीय हितों से जुडे़ मसलों पर भी आज की राजनीति सिर्फ राजनीति करा रही हैं हमारे नेताओं से। घरेलू गैस पर सक्षम लोग सब्सिडी छोड़े इस विचार में कहां से बुराई है ? लोकतंत्र अच्छे नागरिक बोध के बिना भेड़तंत्र से अधिक महत्व नहीं पा सकता. दुनिया के विकसित देशों ने यदि लोकतंत्रीय व्यवस्था में विकास और ताकत को अर्जित किया है तो वहां नागरिकों के योगदान के बल पर ही। लोकतंत्र की सफलता ‘सिविक सेन्स’ के पैमानों से तय होती है. दुर्भाग्य की बात है कि भारत ने उच्च नागरिक चरित्र पर आधारित संसदीय व्यवस्था को तो आत्मसात कर लिया पर नागरिकबोध को कभी प्राथमिकता पर नहीं रखा। जाति, धर्म, आरक्षण, तुष्टिकरण, और अधिकार ही हमारे संसदीय शासन के उपकरण बन गए क्योंकि ये सिर्फ सत्ता का समीकरण तय करते है. और सत्ता ही साध्य जब हो जाती है तो लोकतंत्र का भारतीय स्वरूप बन जाती है। मुफ्तखोरी की सरकारी शह ही आज हमारी राजनीति का आभूषण है. हर राजनीतिक दल इसे अपने गले में उतारना चाहता है. कर्ज माफी, मुफ्त अनाज, मुफ्त राशन, साड़़ी, साइकिल, सिलेण्डर, लैपटॉप, टी.व्ही., घर, तीर्थ यात्रा, छात्रवृत्ति, जैसे तमाम लोकलुभावने वादे और कार्य (बिना वास्तविक जरूरतमंदों की पहचान के ) आज देश को कहां ले जा रहे हैं इसकी चिंता किसी स्तर पर नहीं हो रही है। काफी समय बाद कोई प्रधानमंत्री इस दिशा में आगे बढ़ने का साहस दिखा रहा है लेकिन वोट की राजनीति इसमें अडंगे लगाने में पीछे नहीं है.

लगभग मृत हो चुके वामपंथी वर्ग की बात करते हैं लेकिन वर्ग का भला वे शासन में रहकर भी नहीं कर पाए। बंगाल, त्रिपुरा इसके उदाहरण है। आज देश में 40 करोड़ लोग ऊर्जा गरीबों से ग्रस्त हैं। एसोचेम का अध्ययन बताता है कि भारत में 50 प्रतिशत सबसे गरीब लोगों में से 25 फीसदी के पास घरेलू गैस(एलपीजी) कनेक्शन नहीं है. और देश के खजाने से प्रतिवर्ष 30 हजार करोड़ रूपया गैस की सब्सिडी पर जा रहा है. क्या इस भारी भरकम सरकारी खैरात पर हमें जरूरतमंदों के नजरिए से समीक्षा करने की जब आवश्यकता नहीं है ? देश का जनादेश यदि मोदी के पक्ष में सुशासन और बदलाव के लिए है तो क्या सियासी पार्टियां सिर्फ इसलिए विरोध करेंगी कि सुशासन या सुधार का श्रेय सरकार को न मिल जाये ? यह देश के लिए खतरनाक संकेत है जो भी दल इसमें शामिल हो। गैस सब्सिडी बहुत ही मामूली रकम है यदि समेकित आंकडा देखा जाए। राशन, डीजल, कैरोसिन, हज, और इससे जुड़ी मुफ्तखोरी की सभी योजनाओं को जोड़ दिया जाए तो ये आंकडा प्रतिवर्ष लाखों करोड़ का है। यह सही है कि हमारे देश में गरीबी है. करोड़ों लोग भंयकर गरीबी से पीडि़त है उनके लिए जीवित रह पाना ही उपलब्धि है इसलिए जीवन उपयोगी सुविधाओं पर सब्सिडी अपरिहार्य है लेकिन सिर्फ वोट के लिए खैरात बांटना कौन सा सामाजिक आर्थिक न्याय है ?

यह बहुत ही सुंदर अवसर है जब हम एल.पी.जी. के माध्यम से ही वास्तविक जरूरतमंदों को चिन्हित करने की शुरूआत देश में करें। तर्क दिए जा सकते है कि कारपोरेट छूट के नाम पर सरकारें लाखों करोड़ उद्योगपतियों को देती रही हैं यह सही है लेकिन क्या इस लूट को समझने और रोकने की शुरूआत किसी स्तर से तो आरंभ होनी ही चाहिए या नहीं ? दिहाड़ी मजदूरी करने वाला मजदूर, खेतीहर किसान, को सब्सिडी मिले ये तो समझ आता है लेकिन सरकारी नौकरी करने वाले भारतीय को इस खैरात की क्या जरूरत ? रिलायंस, टाटा, अडानी, महिन्द्रा, भारती, वेंदाता या इनकी जैसी तमाम कंपनियों के काम करने वाले उच्च वेतनभोगी भी सब्सिडी युक्त सिलेंडर प्राप्त करें ? यह कौन सी आवश्यकता है ? केन्द्रीय सरकार के देश भर में 30 लाख नियमित और इतने ही रिटायर्ड कर्मचारी है। राज्य सरकारों के कर्मचारी, देश के 793 सांसद, 4 हजार विधायक, उद्योगपति, बड़े मध्यम व्यवसायी सबको मिला दिया जाये तो यह आंकड़ा कहां पहुंचता है इसे आसानी से समझा जा सकता है। अभी प्रति कनेक्शन हमें लगभग 3300 रूपया सरकारी सब्सिडी प्रतिवर्ष मिल रही है. और देश भर के उपभोक्ताओं का यह आंकड़ा हर साल 30 हजार करोड़ पर पहुंचता है।

अच्छा होगा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अपनी पार्टी के सभी सांसदों, विधायकों को सब्सिडी छोड़ने के सीधे निर्देश दें और समय-सीमा तय करें। क्योंकि सांसदों को वर्तमान में 1.40 लाख प्रतिमाह वेतन तो मिलता ही है साथ में 18 लाख लागत की मुफ्त सुविधायें भी सालाना मिल रही हैं। अभी हर सांसद को 34 हवाईयात्रा, एसी फर्स्ट क्लास में दो अन्य लोगों के साथ अनियंत्रित रेल यात्रा, हर महीने 25 हजार रूपया, बंग्ला रखरखाव 1.50 लाख, लोकल फोन, 40 लाख लीटर मुफ्त पानी, मुफ्त फोन, 50 हजार यूनिट बिजली मुफ्त मिलती है। जाहिर है सांसद को सब्सिडी का कोई औचित्य नहीं है ? कुछ कम करके यही सुविधा 4 हजार विधायकों को भी मिली हुयी है। यदि देश चलाने वाले नीतिनियंता आगे आकर सब्सिडी छोड़ने के लिए आगे आते हैं तो देश भर में न केवल नेताओं की छवि चमकेगी बल्कि गैर जरूरतमंदों के लिए भी नैतिक निर्देश होगा। यदि भाजपा अपने सांसद/विधायकों के लिए ये अनिवार्य करती है तो अन्य विरोधी दलों के लिए भी यह करना जनता के सामने अनिवार्य हो जायेगा। फिर कारपोरेट के लिए भी इसे सख्ती से लागू कराये जाने में परेशानी नहीं आयेगी। ऐसौचेम के अनुसार यदि सांसद, विधायक, रिलायंस, टाटा, अडानी, महिन्द्रा, फ्यूचर, आदित्य बिडला, मेदांता, भारती, ग्रुप के कर्मचारी सब्सिडी छोड़ दे ंतो 7500 करोड़ रूपये साल की सब्सिडी बचेगी।

जाहिर है यदि देश का 15 फीसदी उच्च एवं मध्यम वेतनभोगी सरकारी खैरात लेना बंद कर देें तो इस देश में एक ऐसा वातावरण निर्मित होगा जिसके दूरगामी फायदे भारत को एक महाशक्ति बनाने में मील के पत्थर साबित होगें। यह देश कभी भी उपभोक्ता वादी और मुफ्तखोरी की संस्कृति का हामी नहीं रहा है। परंपरागत रूप से सहकार और सह असतित्व इस भूमि के आभूषण रहे हैं। जरूरतमंद और निर्बल के लिए दान की अद्भुत परंपरा इस देश में अनादिकाल से रही है। जाहिर है जब सक्षम लोग सब्सिडी छोड़ेगें तब देश के संसाधनों से प्रेम करने में संकोच नहीं करंेगे। अनादिकाल से यह देश अपने नायकों के चरित्र का अनुशीलन करता रहा है। आज जब नेताओं और कारपोरेट जगत के बारे में यह धारणा घर कर चुकी है नेता-अफसर-कारपोरेट का गठबंधन देश को लूट रहा है तब शासित समाज से चरित्र में ईमानदारी और कर्त्तव्य की आशा बेमानी है। यह एक ऐसा मौका है जब मोदी सरकार ने पूरी संसदीय राजनीति की साख को कुछ बहाल करने की पहल की है। देखना होगा कि एलपीजी सब्सिडी के इस मामले को हमारे नेता नौकरशाह और पूंजीपति कैसे विश्वसनीयता बहाली के लिए उपयोग करते हैं।

 

(डॉ. अजय खेमरिया)

 

 

 

 

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1 Comment on "गैस की खैरात बनाम संसदीय राजनीति की साख……."

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suresh karmarkar
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सांसदों ,विधायकों, शासकीय अधिकारी वर्ग एक, निजी क्षेत्र की कंपनियों में कार्यरत अधिकारी, बड़े व्यापारी जो आयकर के छापे में करोड़ों सरेंडर कर देते हैं यदि वे सब्सिडी छोड़ दें तो क्या हर्ज़ है?दूसरे प्रधानमंत्री यदि इस बात की अपेक्षा करते हैं ,और ३ लाख लोग उसे पूरी करतें हैं तो इस बात का स्वागत होना चाहिए,विरोध की मानसिकता स्वस्थ नहीं बल्कि रुग्ण है.

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