लेखक परिचय

अरविंद जयतिलक

अरविंद जयतिलक

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं।

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दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में ऐसे सियासतदानों की कमी नहीं जो अपने बोलवचन से न सिर्फ आतंकियों की हौसला आफजाई कर रहे हैं बल्कि उन्हें बेगुनाह बता देश की संप्रभुता से खिलवाड़ भी कर रहे हैं। आश्चर्य है कि जब पूरा देश मुंबई सीरियल बम ब्लास्ट में मारे गए 257 लोगों के मुजरिम याकूब मेमन की फांसी पर राहत महसूस कर न्यायपालिका का साधुवाद कर रहा है वहीं कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह व सांसद शशि थरुर जैसे सियासतदान फांसी को लेकर सरकार अनावश्यक कुतर्क गढ़ रहे हैं। दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया है कि याकूब की फांसी से सरकार और न्यायपालिका की विश्वसनीयता दांव पर लग गयी है वहीं शशि थररु ने ट्वीट कर पीड़ा जतायी है कि सरकार ने एक इंसान को फांसी पर लटका दिया। इन दोनों महानुभावों से पूछा जाना चाहिए कि सैकड़ों लोगों की जान लेने वाले एक हत्यारे को फांसी पर लटकाने से किस तरह सरकार और न्यायपालिका की विश्वसीयता को धक्का पहुंचा है और किस बिना पर ऐसे हत्यारे को इंसान कहना मुनासिब होगा। यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का देश के दुश्मनों और मानवता का दहन करने वालों के प्रति प्रेम उमड़ा हो। याद होगा उन्होंने विश्व के सर्वाधिक वांछित आतंकवादी ओसामा-बिन-लादेन को ‘ओसामा जी‘ कहा था और जब अमेरिका ने ओसामा-बिन-लादेन के शव को समुद्र में डाला तो उन्होंने उसके अंतिम संस्कार को लेकर चिंता जतायी। दिग्विजय सिंह से पूछा जाना चाहिए कि आखिर क्या वजह है कि देश व विश्व के दुश्मन उन्हें प्रिय लगते हैं?

यह शर्मनाक है कि एक ओर दिग्विजय सिंह न्यायतंत्र में अपनी आस्था भी जताते हैं वही याकूब मेमन को फांसी की सजा पर न्यायिक भावना का उपहास उड़ा रहे हैं। समझ में नहीं आता कि उनकी यह किस तरह की देशभक्ति है जो अपने ही बयान से आतंकियों को फायदा पहुंचा रहे हैं। याद होगा संजय दत्त की सजा को लेकर भी दिग्विजय सिंह ने वितंडा मचाया था। तब उन्होंने तर्क दिया था कि चूंकि संजय दत्त के पिता सुनील दत्त मुस्लिम हितैशी थे और मुंबई दंगे में मुसलमानों की हिफाजत की इसलिए संजय दत्त को माफ कर देना चाहिए। यही नहीं उन्होंने यह भी कहा कि जिस समय संजय ने गुनाह किया उनकी उम्र महज 33 साल थी इसलिए वे माफी के हकदार हैं। digviयही नहीं उन्होंने दिल्ली के बटला हाउस कांड और 26/11 मुंबई आतंकी हमले पर भी देश को गुमराह किया। इंस्पेक्टर एससी शर्मा और हेमंत करकरे जैसे वीर जवानों की शहादत का सम्मान करने के बजाए वे राजनीति करते देखे गए। गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस के बहादुर इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा को बटला हाउस मुठभेड़ में अपनी जान गंवानी पड़ी। तब दिग्विजय सिंह और तमाम मानवाधिकार संगठनों ने मुठभेड़ को फर्जी करार देने के लिए किस्म-किस्म के घृणित कुतर्क गढ़े। हद तो तब हो गयी जब उन्होंने कहा कि इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा की हत्या आतंकियों की गोली से नहीं बल्कि उनके ही साथियों की गोली से हुई। जबकि इसके उलट यूपीए सरकार के तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम और प्रधानमंत्री डा0 मनमोहन सिंह लगातार कहते रहे हैं कि बटला हाउस मुठभेड़ में पुलिस की कार्रवाई सही थी। समझना कठिन है कि कौन सच और कौन झुठ बोल रहा है। अब दिग्विजय सिंह याकूब मेमन की फांसी को लेकर राजनीतिक वितंड़ा खड़ा कर रहे हैं तो यह यों ही नहीं है। दरअसल उनकी मंशा इस कुतर्क के जरिए मजहब विशेष के लोगों की सहानुभूति हासिल करना है। ऐसा नहीं है कि आतंकवाद पर कुतर्क के मामले में सिर्फ दिग्विजय सिंह को ही महारत हासिल है। यूपीए सरकार के दौरान देखा गया कि सरकार के मंत्री सलमान खुर्शीद ने भी एक चुनावी जनसभा में कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी बटला हाउस मुठभेड़ की तस्वीरें देखकर भावुक हो गयी थी। उनकी आंखों से आंसू फुट पड़े थे। उनके कथन में कितनी सच्चाई रही यह तो सलमान खुर्शीद या सोनिया गांधी को ही पता होगा। लेकिन कुछ इसी तरह की घुणित सियासत का नतीजा है कि आज देश आतंकवाद की आग में झुलस रहा है और आतंकियों का हौसला बुलंद है। दिग्विजय सिंह और कांग्रेस के बड़बोड़े व मजहबी सियासत करने वाले सियासतदानों को समझना होगा कि याकूब की फांसी पर सर्वोच्च अदालत के फैसले को सियासी और मजहबी फ्रेम में रखकर मूल्यांकन करना और उस पर अनुचित सवाल खड़ा करना किसी भी लिहाज से देश व समाज के हित में नहीं है।

याकूब की फांसी पर आंसू टपकाने वालों का यह तर्क भी उचित नहीं कि मुंबई सीरियल बम विस्फोट बाबरी विध्वंस का प्रतिक्रिया था। अगर इस तर्क को कबूल किया जाए तो फिर यह भी स्वीकारना होगा कि गुजरात दंगा भी गोधरा कांड का परिणाम था। लेकिन क्या इस तरह की दलील से देश का भला होगा? क्या देश की एकता और अखंडता मजबूत होगी? बिल्कुल नहीं। सच तो यह है कि इससे देश व समाज का नुकसान ही होगा। लेकिन षायद ही दिग्विजय सिंह और उन जैसे लोग इस सच्चाई को स्वीकारने को तैयार हों। याद होगा सियासी फायदे के लिए ही दिग्विजय सिंह ने आजमगढ़ के संजरपुर गांव जिसे आतंकियों का नर्सरी कहा जाता है, जाकर अपने घड़ियाली आंसू बहाए। दिग्विजय सिंह की एक दूसरी कुप्रवृत्ति यह रही है कि वे हर आतंकी घटना का रिश्ता-नाता हिंदू संगठनों से जोड़ने की कोशिश करते हैं। समझ में नहीं आता है कि हिंदू संगठनों को बदनाम करने का टेंडर उठा रखे दिग्विजय सिंह की जुबान उस वक्त क्यों खामोश रही जब उनकी सरकार के नाक के नीचे ही नई दिल्ली में कश्मीरी अलगाववादियों के नेता सैयद गिलानी और नक्सलियों की पैरोकार अरुंधती राय ने जहर उगला। दिग्विजय सिंह न सिर्फ तुष्टिकरण के जरिए देशद्रोहियों की मदद करते हैं बल्कि हिंदू संगठनों, समाजसेवियों और अपने विरोधियों के खिलाफ भी जहर उगलते हैं। याद होगा जब केंद्र में यूपीए की सरकार थी तब उन्होंने सारी राजनीतिक मर्यादा को ताक पर रखकर तब देश की मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी को नचैया पार्टी कहा। तब सवाल उठा था कि क्या इस तरह का शर्मिंदगी भरा बयान देश की सबसे पुरानी पार्टी के एक महासिचव को शोभा देता है? लेकिन आश्चर्य की बात यह रही कि कांग्रेस पार्टी ने अपने महासचिव के मुंह पर ताला नहीं झुलाया। हालांकि तब सुषमा स्वराज ने दिग्विजय सिंह को गुलामी की मानसिकता से ग्रस्त व्यक्ति बताकर हिसाब-किताब जरुर चुकता किया। दिग्विजय सिंह ने योगगुरु रामदेव के सहयोगी आचार्य बाल कृष्ण के बारे में भी खूब जहर उगला। उन्होंने योगगुरु बाबा रामदेव को ठग करार दिया तथा मनुस्मृति का हवाला देते हुए कहा कि राजा को चाहिए कि ठग संतों के गले में पत्थर बांधकर नदी में डूबो दे। दिग्विजय सिंह के इस खतरनाक कुवचन और ओछी मानसिकता की चतुर्दिक निंदा हुई और यह भी साफ हो गया कि देश के साधु-संतों को लेकर उनके मन में कितना जहर भरा हुआ है। उनके अंदाज-ए-बयां से इस निष्कर्ष पर पहुंचना गलत नहीं होगा कि वे राजशाही तौर-तरीके से देश व समाज को हांकना चाहते हैं और उनकी नजर में जहां लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी सरकार और संवैधानिक न्यायपालिका का कोई मूल्य-महत्व नहीं है। कुलमिलाकर दिग्विजय सिंह का आतंकियों के प्रति उमड़ने वाला प्रेम उनकी संकीर्ण वैचारिक दिवालिएपन को ही उजागर करता है।

 

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