लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

Posted On by &filed under व्यंग्य.


जैसे- जैसे हम जितनी भी असली नकली दवाएं ईजाद करते जा रहे हैं, हैरत, वैसे-वैसे ही समाज-दफ्तर में दिन पर दिन बीमारियां बढ़ती ही जा रही हैं। पर दफ्तर की बीमारियां समाज की बीमारियों से जरा भिन्न होती हैं। हर साल चाहे दफ्तर के कर्मचारी की एसीआर में साहब फिजिक्ली और मेंटली फिट-अनफिट के खाने में फिट क्यों न लिखते रहें, पर सच तो यह है कि दफ्तर के कर्मचारियों के बाहर से फिट दिखने के बाद भी इनके दिमाग में इतनी मानासिक बीमारियां डेरा जमाए होती हैं कि….. राम ही जाने इतनी बीमारियों के बीच कैसे जीते होंगे बेचारे ये?  असल में आम आदमी को इनकी बहुत सी गंभीर बीमारियों का पता नहीं चल पाता। जो पता चल भी जाए तो उसके पास तो उसके पास, अस्पताल वालों के पास  इनकी बीमारियों का कोई परमानेंट तो छोड़िए, टेंपरेरी इलाज तक नहीं होता। बस, वे आंखें बंद कर दवाइयां लिखते रहते हैं और कर्मचारी भाई दवाइयों के बदले केवल बिल कैमिस्ट से ले उन्हें क्लेम करते रहते हैं।

जिस तरह आज हर दूसरा बंदा बीपी, हार्ट की बीमारी से जूझ रहा है वैसे ही दफ्तर चाहे कोई भी हो,  हर दूसरा आपको ऐसा आसानी से मिल जाएगा जो राजरोग बोले तो टांग खींचने की गंभीर  बीमारी से चौबीसों घंटे जूझ रहा है। इस बीमारी का उद्भव और विकास बहुधा आदमी में तब होता है जब वह दूसरे को अपने से आगे बढ़ते देखता है। ईर्ष्यावश उसे अपने से आगे न बढ़ने देने की बहुत असफल कोशिशों के बाद भी जब वह उसे रोक नहीं पाता तो अंत में वह थक हार कर अपने अहं को स्थापित किए रखने के लिए अपने से आगे वाले की टांग खींचने लग जाता है, इधर- उधर से गठजोड़ कर उसकी टांग खिचवाने लग जाता है। पहले तो वह ये सब चोरी छिपे करता है पर धीरे- धीरे जब उसे यह बीमारी परमानेंट  घेर लेती है तो…. वह इसे अपने जरूरी काम में शुमार कर लेता है। इस रोग से पीड़ित रोगियों को तब तक रोटी नहीं पचती जब तक वे किसीकी टांग नहीं खींच लेते। और जिस दिन उन्हें किसीकी टांग खींचने  का सौभाग्य न मिले, ये अपनी ही टांग खींचने से भी नहीं हिचकिचाते, अपने को तनिक रिलीफ देने के बहाने।

हमारा दफ्तर आपके दफ्तर की तरह वैसे तो कागजों में दस बजे ही लगता है और पांच बजे बंद होता है पर उनके सिवाय न तो कोई दस बजे दफ्तर आता है और न ही पांच बजे दफ्तर से घर जाता है। वे कर्मठ कर्मचारी ठीक दस बजे से पहले दफ्तर में आ जाते हैं और स्टाफ रूम में शाम के पांच बजने के बाद भी दफ्तर के लोगों की टांगें खींचने में जुटे रहते हैं। तब थकहार कर चौकीदार को ही कहना पड़ता है कि साहब…… सात बजने को आ गए। अब तो घर जाइए न! कल भी टांग खींचने दफ्तर आना है।

टांगखींचुओं को दफ्तर के कामों में उतनी रूचि नहीं होती जितनी दूसरों की टांग खींचने में होती है। बदन में खून की कमी होने के बाद भी ये जिसका मन किया उसकी टांग खींचने का काम इतनी शिद्दत से करते हैं कि टांग खींचने के प्रति इनकी लग्न को देख इनके चरणों के रजकणों को माथे लगाने को मन करता है। ये सज्जन दूसरों की टांग खींचने का काम इतनी तन्मयता से करते हैं कि इतना तो भगवान को पाने के इच्छुक भी उसका भजन नहीं करते।

दफ्तर का छोटे से छोटा काम इन्हें दे दीजिए तो ये आंखें न होने के बाद भी आपको ऐसी आंखें तरेरेंगे कि….. इनकी बराबर कोशिश होती है कि दफ्तर का अपने हिस्से का काम जैसे कैसे दूसरों की टेबुल पर मारा जाए। पर इन्हें जो किसीकी टांग खींचने को कहो तो ये  सांस लेना तक बंद कर टांग खींचने के लिए योजना बनाने में ऐसे जुट जाएंगे कि…. जैसे देश की पंचवर्षीय योजना पर काम कर रहे हों।

कल वे तीनों टांग खींचने में माहिर, टांगों पर टांगें धरे स्टाफ रूम में मिल गए, हर किसीकी टांग खींचने की तैयारी करते। सोफे पर पसरे, चाय पर चाय पीते हुए। वैसे वे अपनी सीट पर कम ही देखे जाते हैं। स्टाफ रूम का सोफा भी उनको झेलते- झेलते टूटने को आ गया है। पर उन्हें न दफ्तर के सोफे की परवाह है और न किसीकी टांगों की। वे साहब से लेकर चौकीदार तक की टांगें इतनी बार खींच चुके हैं कि ….ये तो उनके सहयोगियों का दम है कि वे हर रोज अपनी टांगों में मालिश करके आते हैं और न चाहते हुए भी अपनी टांगें उनके आगे खींचने को छोड़ कुर्सियों पर बिन टांगों के दफ्तर के काम निपटाने में मग्न हो जाते हैं।

टांग खींचने वालों की सबसे बड़ी विशेशता यह होती है कि वे अक्सर अपनी सीट पर बैठ टांग खींचने का काम कम ही करते हैं। क्योंकि किसीकी टांग अकेले खींचने में दिक्कत होती है। साथ में जोड़ीदार हो तो टांग खींचने में सहूलियत भी होती है,  और आनंद भी आता है। टांग खींचने वाले दो तरह के होते हैं, एक तो वे जो आनंद के लिए हर किसी की टांग को हाथ डाल देते हैं तो दूसरे वे जो नियोजित ढंग से किसीकी टांग को हाथ डालते हैं, और तब तक नहीं छोड़ते जब तक कि उन्हें यह नहीं लग जाता कि अब बंदे की टांग चलने लायक नहीं रही। ये दूसरी किस्म के टांग खींचने वाले बेहद खतरनाक किस्म के होते हैं। कई बार तो ये ऐसा दाव मार टांग पकड़ते हैं कि जब तक बंदे को पता चले, तब तक वह चारों खाने चित्त हुआ पाता है खुद को।

आपको लग रहा होगा तो लगता रहे कि टांग खींचना बड़ी जलालत का काम है। पर पूछिए उनसे जो दफ्तर में आते ही टांग खींचने के लिए हैं। ऐसे में उन्हें सारा दिन किसीकी टांग खींचने को न मिले तो उनको लगता है कि आज दफ्तर में आना बेकार गया। तब घर जाते- जाते वे इतने डिप्रेशन में होते हैं कि…..

जैसे ही तीनों ने सोफे पर पसरे-पसरे ठहाका लगाया तो मैं समझ गया कि उनकी पकड़ में किसीकी टांग आ गई है, पर  किसकी है, ये  पता न चला। सो मैंने उनसे निवेदन करते कहा,‘ बंधुओ! आखिर आपको क्या मिलता है किसीकी टांग खींच कर? सरकार आपको टांग खींचने की पगार देती है या…. ’, तो शर्मा जी तो शर्मा जी, वर्मा जी भी मेरा मुंह एकटक देखने लगे। कुछ देर तक मुझे देखने के बाद, घूरने पर आए तो मैं ठिठका और अपनी टांगों को सावधानी से सुरक्षा की दृष्टि से संभालने लगा कि इनमें से किसीने मेरी ही टांग खींच दी तो?? क्योंकि जानता हूं कि आज की डेट में मतलब से तो मतलब से ,बेमतलब भी हर किसीकी टांग खींचना एक फैशन सा बन गया है।

‘टांग खींचकर हमें वह परम सुख मिलता है जो भगवान के भक्त को भी नहीं मिलता। तीनों ने एक साथ मुस्कुराते कहा तो में दंग रह गया। टांग खींचने की सोच में कितना एका है तीनों में ?

‘ तो आज किसकी टांग खींचने की योजना है आपकी सर,’ मैंने तीनों को एक-एक हाथ जोड़ते पूछा तो वर्मा जी सीना चौड़ा कर बोले,‘ साहब की!’

‘रोज साहब की ही टांग क्यों?’

‘ तो आज तुम ही अपनी टांग खिचवा कर देख लो? जैसे हाथी की टांग में सबकी टांग होती है वैसे ही साहब की टांग में सबकी टांग होती है,’ तीसरे टांगखींचिए ने मुस्कुराते कहा और मेरी टांग को यों घूरने लगे, जैसे कोई अकेली औरत को देख घूरता है।

‘ टांगें खींचते- खींचते सारा दिन आप लोग थक नहीं जाते क्या?’

‘नहीं, थकते तो हम तब हैं जिस दिन किसीकी टांग न खींचें। सुनो! जैसे तुम सारा दिन फाइलों से लड़कर शाम को घर जाते हो तो डिनर के बाद क्या करते हो?’

‘एकदम कम्बख्त नींद आ जाती है,’ मैंने तपाक से कहा।

‘और जिस दिन दफ्तर में काम न हो, उस दिन क्या होता है?’

‘ नींद ही नहीं आती।’

‘ गुड! तो यही हाल अपना होता है बंधु! जिस दिन हम किसीकी टांग न खींचे उस दिन हमें घर जाकर नींद ही नहीं आती, नींद की चार- चार गोलियां खाने के बाद भी नहीं,’ वर्मा जी ने कहा तो मैं टांग खींचने के काम के प्रति उनकी निष्ठा देख दंग रह गया।

अब तो उनकी देखा देखी में हमारे दफ्तर में पांच-सात जने और पूरे तन मन से इस काम में जुट गए हैं। जिस कमरे में देखो, दो-चार एक दूसरे के गले में बांहें डाले, टेबुल पर फाइलों को नंगी, अधनंगी छोड़े, दूसरे कमरे वालों की टांगें खींचने में मस्त। सच कहूं! अब अपने दफ्तर में टांगें खींचने को कम पड़ने लगी हैं। कई बार तो एक ही बार में एक ही टांग को चार- चार खींचने में जुटे होते हैं। ऐसे में उन्हें खींची जा रही टांग पर तरस आता हो या न, पर मुझे तो बहुत तरस आता है। पर तब उन्हें उस टांग के बदले अपनी टांग दूं तो कैसे? मैं जानता हूं कि वे किसीकी भी टांग इतनी कू्ररता से खींचते हैं, इतनी कू्ररता से खींचते हैं कि…..

स्टाफ सचिव ने दफ्तर में खींचने के लिए टांगों की कमी की बराबर मिल रही शिकायतों के चलते और कुछ की लगातार वजह- बेवजह खिच रही टांगों की बढ़ती वारदातों पर बिहारी बाबू के कहने के बहाने चाय- समोसा हो जाने के साथ- साथ दफ्तर में अपने पद के होने का सबूत देने के लिए खींचने के लिए कम पड़ रही टांगों की कमी पर आपात मीटिंग बुलाई और साहब की आज्ञा पा अधूरे-पूरे स्टाफ को दार्शनिक हो संबोधित करते कहा ,‘  हे मेरे दफ्तर वासियो! हमें अपने किसी कर्तव्य का ज्ञान हो या न, पर हमें अपने एक दूसरे की टांग खींचने के दायित्व का पूरा ज्ञान है। हमने आज तक अपने किसी दूसरे कर्तव्य का निर्वाह किया हो या न, पर हम सड़क से लेकर संसद तक अपने इस कर्तव्य का भली भांति निर्वाह करते  आए हैं।’

सबसे पीछे की कुर्सी पर बैठा सीनियर असिस्टेंट बनिया विनोद यह सुन बड़बड़ाने लगा,‘ साला! बड़ा आया टांग खिचाई पर भाषण मारने वाला। भाषण से देश में सब ठीक हो जाता तो अब तक देश पता नहीं कहां होता? जिसे देखो बस, नेता बना नहीं कि भाषण शुरू हुए नहीं……. अब पता नहीं कितनी देर बोर करेगा? चाय -समोसा जल्दी आ जाते तो…….’, उधर मिसेज वर्मा के  दिमाग में भी पता नहीं क्यों खुजली सी होने लगी थीं। वे अपने को रोकने की बहुत कोशिश कर रही थीं पर…. उनके चेहरे के भाव पढ़ तीसरी रो में कुर्सी पर बैठीं शांता उन्हें इशारों ही इशारों में बराबर चुप रहने को अजीब सा मुंह बना कह रही थीं।

स्टाफ सचिव ने पानी का गिलास पी आगे कहना शुरू किया,‘ टांग खींचना हमारा राष्ट्रीय कौशल है। टांग खींचने के वैसे तो कई तरीके हैं पर कुशल टांग खींचने वाला वह है जो बंदे की टांग ऐसे खींचे कि उसे पता ही न चले कि वह गिरा तो कैसे गिरा? वह शक किसी और पर करता रहे और टांग कोई और ही खींच गया हो। टांग खींचने की बीमारी एक ऐसी आम बीमारी है जो एकबार  लग जाए तो मरने के बाद भी नहीं छूटती। इसका इलाज किसी पैथी, किसी वेद में नहीं। यह आज के वैज्ञानिक युग में भी लाइलाज बीमारी है। और इस बीमारी की सबसे बड़ी खासियत! यह पान की दुकान से लेकर भगवान और उनकी हर दुकान तक पर हर जगह मौजूद है। यह निराकार, साकार की तरह यत्र- तत्र- सर्वत्र विराजमान है।

इस बीमारी और दूसरी बीमारी में आधारभूत अंतर यह है कि यह जेब पर डाका नहीं डालती। यह बिन पैसे की बीमारी है। इसलिए हर कोई इस बीमारी का मजे से शिकार हो जाता है। कभी समय मिला तो अलग से इस विषय पर शर्मा जी का विशेश लेक्चर सुन लाभ जरूर लेंगे।

तो हे मेरे दफ्तर के टांग खींचने वाले सज्जनो! आज की बैठक के मुद्दे पर आने से पहले हम सब ऑफिस की खींच-खींच कर दिवंगत हुई टांगों को श्रद्धांजलि देने के लिए सबसे पहले दो मिनट को मौन रखेंगे,’ उनके कहते ही सब अपनी- अपनी जगह सिर खड़े किए मौन की मुद्रा में खड़े हो गए।  डेढ़ मिनट बाद सब नार्मल हुआ तो स्टाफ सचिव ने साहब को संबोधित करते हुए आगे कहना शुरू किया,’  अब मैं मुद्दे पर आता हूं। वैसे तो हमारे दफ्तर में बहुत सी बीमारियां हैं पर अब एक दूसरे की टांग खींचने की बीमारी भी बढ़ती जा रही है, यह खुशी के साथ- साथ दुख का विषय भी है।  इसी बारे ठोस निर्णय लेने के लिए यह मीटिंग बुलाई गई है।  हमारे स्टाफ  में कई दिनों से कुछ बराबर दबी जुबान में कह रहे हैं कि कइयों को स्टाफ में खींचने के लिए टांगों की निरंतर कमी हो रही है। चार-चार बंदे छुप- छुप कर एक ही टांग को खींचने में लगे रहते हैं। कइयों की टांगों के तो खींच-खींच कर ये हाल हो गए हैं कि उन्हें बैसाखियों के सहारे दफ्तर आना पड़ रहा है। दिस इज वैरी सैड एंड वैरी बैड! भगवान से प्रार्थना कि वे ऐसों की टांगों को असीम शक्ति प्रदान करें। लाख उन्हें खींचने के बाद भी उनका बाल तक बांका न हो। भगवान टांगें खींचने वालों की पीड़ा को मद्देनजर रखते हुए उनकी टांगों को शीघ्र अति शीघ्र स्वस्थ करें।

यह भी नोटिस में आया है कि कोई दिन में दस- दस टांगें खींच रहा है तो किसीको एक टांग तक खींचने को नहीं मिल रही। सभी को कम से कम एक टांग तो खींचने को मिले , ये कैसे संभव हो? इसी यक्ष प्रश्न पर चर्चा करने के लिए इस वक्त हम सब यहां एकत्रित हुए हैं। ऐसे में क्या किया जाए कि हमारा पैशन और फैशन दोनों सुरक्षित रहें। मेरी मानें तो सभी को दिन में कम से कम एक टांग तो खींचने को मिलनी ही चाहिए। इस बारे में आप जो भी सुझाव देंगे, हाउस में उस पर ध्वनि मत से निर्णय लेने के लिए हम सब सौभाग्य से यहां एकत्रित हुए हैं, मुझे आशा ही नहीं विष्वास है कि……’

कुछ देर स्टाफ मीटिंग में सन्नाटा छाया रहा कि तभी गुप्ता जी ने खांसते हुए खड़े होकर सुझाव देना चाहा तो साहब ने कहा,‘ कोई बात नहीं गुप्ता जी! कोई औपचारिकता नहीं। आप बैठे-बैठे ही सुझाव दीजिए। हमें पता है कि आपकी टांगें कई दिनों से बहुत खींची जा रही हैं। उनमें अब खड़े होने का दम नहीं।’

‘ टांग यहां सेफ है ही किसकी सर? जिसकी टांग में दम हो वह अपनी टांग बचा ले, और दूसरों की टांग खींचता रहे,’ पीछे से जोशी ने दबी जुबान में कहा तो सब पीछे मुड़कर उसकी ओर देखने लगे। तब वह बस मुस्कुराता रहा।

……तब गुप्ता जी ने कुर्सी पर बैठे- बैठे अपनी टांगें दबाते हुए सुझाव दिया,‘ सदन को जो मंजूर हो तो क्यों न स्टाफ फंड में से जयपुर से नकली टांगें खींचने के लिए मंगवा ली जाएं। इससे दफ्तर की असली टांगें भी बच जाएंगी और….’

‘ सर , ये तो जागरूक टांग खींचने वालों के साथ सरासर धोखा होगा। जब दफ्तर में खींचने के लिए असली टांगें मौजूद हैं तो नकली टांगें क्यों? नकली टांग खींचने में वह आनंद कहां जो असली टांग खींचने में आता है? हम कोई बच्चे तो हैं नहीं। सब पढ़े लिखे हैं। कमीशन से आए हैं। डेली वेजर तो हैं नहीं।  इधर देश शुद्धता की ओर बढ़ रहा है और एक हम हैं कि…. अगर असली टांगें खींचने से रोक दी जाएं तो इन हरामी असली टांगों का औचित्य ही क्या? अब तो लोगों को शौच भी जाना हो तो वे शौच रोक घंटों ऑटो का इंतजार करते रहते हैं, ’ साहब के घूरने के बावजूद भी उस टांगें खींचने वाले में जितना गुस्सा था, सब निकाल कर ही दम लिया। उसका तो मन कर रहा था कि सबके सामने स्टाफ सचिव की ऐसी टांग खींचे- ऐसी टांग खींचे …. पर पता नहीं किस अदृष्य शक्ति ने उसे रोके रखा।

अंत में बहुमत से जो कानाफूसी के बीच तय हुआ उसे स्टाफ रजिस्टर पर उकेरने के बाद स्टाफ सचिव ने खड़े होकर साहब की ओर मुंह कर पढ़ना शुरू किया…. ‘ प्रसन्नता है कि इन दिनों दफ्तर में टांगें खींचने वाले सच्ची को ज्यादा हो गए हैं और टांगें कम। ऐसे में दफ्तर में टांगें कम पड़ना नेचुरल है। जब हम इस दफ्तर में सब बराबर हैं तो टांगें खींचने को सभी को बराबर मिलें, यही समाजवाद कहता है। टांगें खींचने में सीनियर, जूनियर का कोई अंतर नहीं होता। होना भी नहीं चाहिए। अतः हाउस बहुमत से निर्णय लेता है कि जयपुर से स्टाफ फंड में से नकली टांगें मंगवाकर सबकी सीट के आगे लटका दी जाएं और जब किसीका मन किसीकी टांग खींचने को करे तो वह फाइल बंद कर सामने लटकी टांग खींच ले। इससे कम से कम  यार-दोस्तों के काम प्रभावित न होंगे। और दफ्तर की कार्यक्षमता भी बढ़ेगी।’

तभी साहब ने सचिव को बीच में रूकने का इशारा कर गंभीर हो कहा,‘  पर हां! एक बात का जयपुर से टांगें लाते हुए विशेश ख्याल रखा जाए। जो भी वहां टांगें खरीदने जाए वह असली का आभास देने वाली टांगें ही लाए ताकि सभी असली सी टांगें खींचने का समान रूप से मजा ले सकें। और हां! इसके बाद असली टांगें खींचना गैर कानूनी माना जाएगा। फिर मत कहना मैंने किसीकी एसीआर में रेड एंट्री कर दी । शर्मा जी! आपसे और आपके सहयोगियों से तब तक खास निवेदन है कि……’कह साहब ने उनकी ओर हाथ जोड़े।

‘ पर सर! जयपुर से टांगें कब तक आएंगी? ज्यादा लेट किया तो…….’कहते हुए शर्मा जी साहब को ऐसे घूरे कि……

अशोक गौतम

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz