लेखक परिचय

अखिलेश आर्येन्दु

अखिलेश आर्येन्दु

वरिष्‍ठ पत्रकार, टिप्पणीकार, समाजकर्मी, धर्माचार्य, अनुसंधानक। 11 सौ रचनाएं 200 पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। 25 वर्षों से साहित्य की विविध विधाओं में लेखन, अद्यनत-प्रवक्ता-हिंदी।

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vegअखिलेश आर्येन्दु
पिछले कुछ सालों में जब से नए शोधों ने यह साबित कर दिया कि शाकाहार इंसान के लिए मंासाहार से अधिक मुफीद और निरापद है तब से पश्चिमी देशो में शाकाहारियों की एक बड़ी तादाद देखने में आ रही है। इतना ही नहीं लोगों को यह भी समझ में बखूबी आने लगा है कि मांसाहार महज बीमारियों की वजह नहीं है बल्कि पर्यावरण, कृषि, नैतिकता और मानव-मूल्यों के विपरीत है। यह अर्थव्यवस्था के लिए भी नकारात्मक है। पश्चिम में शाकाहारी होना माडर्न फैशन बन गया है। आए दिन लोग खुद को शाकाहारी घोषित कर इस नए चलन के अगुला बताने में गर्व अनुभव करते देखे जा सकते हैं। पश्चिमी दर्शनों की विचारधारा, जो कभी मांसाहार को सबसे मुफीद मानती थी वही दर्शनों की धारा अब शाकाहार की ओर रुख करने लगी है। यह कई नजरिए से शाकाहार के हक में एक अच्छा संकेत कहा जाना चाहिए। लेकिन भारत सहित दुनिया के तमाम विकासशील देशो की स्थिति इससे ठीक उलट है। विकासशील देशो में बूचड़खाने बढ़ रहे हैं और मांसाहार को बढ़ावा देने के लिए वहां की सरकारें भी लगी हुई हैं। यह जानते हुए कि मांसाहार कई समस्याओं का कारण है और इससे कृषि-संस्कृति को जबरदस्त नुकसान पहुंच रहा है। पौल्ट्री-फार्मिंग, फिश-फार्मिंग, वैटरी-फार्मिंग,रैबिट-फार्मिंग, क्वेल-फार्मिंग जैसे भ्रामक शब्दों के जरिए लोगों को गुमराह करने का सिलसिला जारी है। पिछली सरकारों ने केंद्र से जितनी भी योजनाएं इस तरह की गांवों, कस्बों और शहरों के लिए बनाईं वे सभी हिंसा को बढ़ावा देने वाली और अहिंसक कृषि-संस्कृति का नाश करने वाली रही हैं। मोदी सरकार को इस सच पर गौर करते हुए देशभर में की जा रही इस तरह की हिंसा की खेती को बंद कराने की पहल करनी चाहिए।
शाकाहार के दर्शन और अर्थशास्त्र को मानने वाले महज भारतीय दार्शनिक और वैज्ञानिक नहीं रहे हैं, बल्कि पश्चिमी दुनिया की विख्यात हस्तियों ने भी इसका खुलकर समर्थन किया और लोगों को शाकाहार की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया। अरस्तू, राबर्ट चाल्स डार्विन, अल्बर्ट आइंस्टीन, लियो टालस्टाय, हर्बर्ट जाॅर्ज बेल्स, जाॅर्ज बर्नार्ड शाॅ, बेंजामिन फें्रकलिन, वाल्टेअर, न्यूटन, विलियम शेक्सपीयर, पर्सी बिसे शेली जैसे अनेक नाम लिए जा सकते हैं। भारत में तो कभी सारा का सारा युग शाकाहारी हुआ करता था। वे लोग ही मांस खाते थे जो समाज के सबसे निकृष्ट तबके के होते थे। यही कारण है, वेद, उपनिषद, गीता, महाभारत, कुरान, पुराण जैसे अनेक धर्म ग्रंथों में शाकाहार करने पर ही जोर दिया गया है। आयुर्वेद में मांसाहार को विपत्तियों का घर कहा गया है। कृषि-संस्कृति का ध्वजवाहक देश अहिंसा और प्रेम जैसे अनेक मूल्यों का हमेशा से संवाहक रहा है।
यह बहुत कम लोग जानते हैं कि मांसाहार और देश-समाज की आर्थिक स्थिति में गहरा रिश्ता है। जो लोग मांसाहार और अर्थ-व्यवस्था से रिश्ता नहीं मानते उन्हें उन तथ्यों पर जरूर गौर करना चाहिए, जिसमें मांसाहार को आर्थिक संवृद्धि के लिए बहुत बड़ा अवरोध बताया गया है। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में हर साल वैध-अवैध तरीके से 20 करोड़ पशुओं का वध किया जाता है। आई सी ए आर के अनुसार यदि मात्र भेडों को ही कत्लखाने में न ले जाया जाए तो उनसे 450 करोड़ से अधिक की आय हो सकती है। जब कि देश को उनके मांस से करोड़ से भी कम की आय होती है। यदि केवल अलकबीर बूचड़खाने में भैसों का वध न किया जाए तो देश को 5 वर्ष में ही केवल ईंधन से देश को 610.25 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है। एक सामान्य उदाहरण से इसे तरह से भी समझ सकते हैं। एक भैंस प्रतिदिन 12 किग्रा. गोबर पैदा करती है, जिसमें 6 किग्रा. सूखा गोबर होता है। एक पांच सदस्यसीय परिवार के लिए रोज़ाना औसतन 12 किग्रा. उपलों की जरूरत होती है। अलकबीर में 8200 भैंसे रोज़ाना कत्ल की जाती हैं। ये भैंसें 91,200 परिवारों के ईंधन की जरूरत पूरी कर सकती हैं। गांवों में आजादी के दो दशकों तक भोजन बनाने के लिए ईंधन के रूप में उपलों का इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन बूचड़खानों में लाखों की संख्या में पशु वध के कारण गांव पशुओं से सूने हो गए और गांव में गरीबी बढ़ती चली गई। अब गांवों को अपनी रोजमर्रा की जरूरत को पूरा करने के लिए मिट्टी का तेल या एलपीजी के ऊपर निर्भर होना पड़ रहा है। इससे लाखों परिवारों को रोज़ाना लाखों रुपए भोजन बनाने के ईंधन के तौर पर मिट्टी के तेल या एलपीजी में खर्च करना पड़ रहा है। मतलब स्थानीय तौर पर गांव पशुओं के गोबर से अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी कर लेते थे, लेकिन तथाकथित विकास ने गांवों को भोजन बनाने के ईंधन पर भी निर्भरता शासन और प्रशासन पर बढ़ा दिया है। इसी तरह कृषि उत्पादन को भी मांसाहार से परहेज करके बहुत बड़ी तादाद में बढ़ा सकते हैं। आईसीएआर के अनुसार हर साल 9.12 लाख भैंसे बूचड़खानों में कत्ल कर दी जाती हैं। ये भैंसे 2,95,50,000 टन गोबर खाद उत्पन्न कर सकती हैं। इससे 39.40 हैक्टेयर कृषि भूमि को खाद मुहैया कराई जा सकती है। गणना करने पर औसतन हर साल पशुओं द्वारा 10,89,000 टन खाद्यान्न का उत्पादन हो सकता है। इस तरह देखा जाए तो पशुओं के कत्ल से हर वर्ष अरबों रुपए की हानि होती है। लेकिन सरकार इस पर कभी न ध्यान देती है और न ही देशवासियों द्वारा ध्यान दिलाने पर उस पर कोई विचार ही करती है।
पश्चिमी देशो में जन्म के समय एक बछड़े का भार 100 पौंड होता है और 14 महीने बाद जब वह कसाईखाने में भेजा जाता है तो उसका भार 1100 पौंड हो जाता है। उसको इस अवधि तक पालने में 1400 पौंड दाना, 2500 पौंड घास, 2500 पौंड साइलेज और 6000 पौंड पास्चर खर्च हो जाता है। इसमें बछड़े के 1100 पौंड भार में से 460 पौंड मांस उपलब्ध हो पाता है। स्पष्ट है बछडे का 30 प्रतिशत शरीर तो भक्षण के काबिल नहीं होता। मतलब अधिक व्यय में बहुत कम उत्पादन। वहीं दूसरी तरफ जमीन के उसी हिस्से से मांस की जगह 5 गुना अधिक अन्न पैदा किया जा सकता है। यदि दूसरे प्रकार से हिसाब लगाया जाये तो 16 पौंड अन्न से केवल एक पौंड गाय का मांस और 7 या 8 पौंड अन्न से केवल एक पौड सुअर का मांस प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार साबित हो गया कि मांस प्राप्त करना अन्न प्राप्त करने की अपेक्षा हर तरह से घाटे का सौदा है। मतलब यह है कि यदि सारा विश्व शाकाहार अपना ले तो खाद्य समस्या ही नहीं आर्थिक, पर्यावरण, जल संकट, रोग और रसायन रहित अन्न, फल और सब्जी की अनेक समस्याएं हमेशा के लिए हल हो सकती हैं। इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, नैतिकता और धर्म सम्मत अनेक समस्याएं भी कुछ ही दिनों में हल हो सकती हैं।
केंद्र और राज्य सरकारें इस बात पर विचार नहीं करती कि इंसान और जानवर एक दूसरे के पूरक हैं। सहअस्तित्व से ही जैविक विविधता को कायम रखा जा सकता है। मनुश्य यदि एक जानवर को पालता है तो वह जानवर उसके पूरे परिवार को पालता है। इतना ही नहीं बन्दर, रीछ, घेाड़े, बैल, साड़, भैंसा और गाय इंसान की जिन्दगी के अहम हिस्सा हैं। आज भी लाखों लोगों की जीविका इन जानवरों पर आधारित है। राजस्थान में एक कहावत है – कहने को तो भेड़ें पालते हैं, दरअसल भेड़ें ही इनको पालती हैं। इनके दूध घी और ऊन आदि से हजारों परिवारों की जीविका चलती है। भेड़ों के दूध को वैज्ञानिकों ने फेफड़े के रोगियों के लिए बहुत ही फायदेमंद बताया है। भारत में सबसे अधिक गाय की पूजा लाखों वर्षों से की जाती रही है, लेकिन मांस खाने वालों के लिए वे एक आहार बन कर रह गई हैं। एक गाय हमारे लिए कितनी उपयोगी हैं इसका अनुमान लगाना बहुत कठिन नहीं है। एक गाय हमारे जीवन को अपने जीवन काल में कितना क्या कुछ देती है, इसे समझने के लिए इस आंकड़े को समझना जरूरी है। एक गाय यदि औसतन 10 किलो दूध प्रतिदिन देती है तो वह एक वर्ष में औसत 10 महीने तक दूध देती है तो वह एक साल में 3000 किग्रा. दूध देकर 6000 लोगों को एक बार तृप्त कर सकती है। यदि वह पन्द्रह वर्ष तक दूध दे तो एक गाय अपनी उम्र में नब्बे हजार व्यक्तियों को एक बार तृप्त कर सकती है। यह तो केवल उसके दूध के फायदे हैं। गाय से प्राप्त गोबर, मूत्र और दूसरी चीजों की बात अलग है। गाय से प्राप्त बछड़ा बैल के रूप में कृषि के कार्य में कितना उपयोगी और हमारे आय का साधन बनता है, इसे भी समझ लेना चाहिए। आंकड़े के अनुसार एक बैल अपने जीवन काल में कम से कम 40,000 किग्रा. अन्न उत्पादन कर करीब आठ हजार व्यक्तियों को एक बार तृप्त कर सकता है। गाड़ी, सवारी और भार ढोना आदि की सेवा अलग। ऐसे पशुओं का वध करके हम उतना ही लाभ प्राप्त करते हैं जैसे कोई मूर्ख कोयला प्राप्त करने के लिए चन्दन की लकड़़ी जलाए।
‘बाम्बे हामोनेटेरियन लीग’ के अनुसार जानवरों से हर साल दूध, खाद, ऊर्जा और भार ढोने वाली सेवा द्वारा देश को 2,55000 करोड़ से अधिक की आय होती है। इसके अलावा मरने के बाद इनकी हड्डियों और चमड़े से जो आय होती है, वह भी करोड़ों में। कृषि के द्वारा भुखमरी से छुटकारा पाया ही जा सकता है साथ में करोड़ों लोगों की जीविका भी चलती है। यानी 10 एकड़ में धान की खेती करके एक वर्ष में 40 लोगों का पेट पाला जा सकता है। इसी तरह इतनी ही जमीन में सोयाबीन की खेती करके एक साल तक 60 लोगों का पेट पल सकता है। और यदि इतनी ही जमीन पर मक्का की खेती की जाए तो 15 लोगों की जीविका का इंतजाम हो सकता है। लेकिन यदि इतने ही क्षेत्रफल में मांस प्राप्ति के लिए पशु पाले जाएं तो एक साल में केवल और मुश्किल से तीन लोगों को रोजगार मिल सकता है। यह भी विचारणीय बात है कि पशु के शरीर का 30 प्रतिशत भाग खाया नही जा सकता है और जितना खर्च करके मांस प्राप्त करने के लिए उसे मोटा किया जाता है, उसे उसकी हत्या करके कदापि नहीं प्राप्त किया जा सकता है। आर्थिक दृष्टि से देखें तो आहार के रूप में मांसाहार शाकाहार की अपेक्षा बहुत मंहगा पड़ता है। एक मांसाहारी 20 शाकाहारियों की खुराक पेट में डाल लेता है। पशुओं-से-प्राप्त आहार पर उनकी देख-भाल/खुराक पर खर्च होता है, वह इतना अधिक है कि एक शाकाहारी पर एक मांसाहारी खुराक गुर्राता दिखाई पड़ता है। मांसाहारियों का यह तर्क होता है कि यदि विश्व के अधिकांष लोग शाकाहारी हो जाएंगे तो शाकाहार कम पड़ जाएगा और पशु-पक्षियों की आबादी समस्या बन जाएगी। लेकिन यह महज मांसाहार को उचित ठहराने का एक कुतर्क के अलावा और कुछ नहीं है। विश्व के जाने-माने अर्थशास्त्री माल्थस के अनुसार खाने-पीने की वस्तुओं और जन-संस्था के बीच का संतुलन प्रकृति स्वयं बनाए रखती है। यदि मनुष्य अपनी आबादी को बेरोक-टोक बढ़ने देता है तो प्रकृति महामारियों तथा विपदाओं द्वारा उसे संतुलित करती है। इस लिए यह कहना कि मांसाहार को शाकाहार के लिए जीवित रखा जा रहा है, तथ्यों का धूर्त संयोजन है। जो आंकड़े पिछले पचास सालों से देश-विदेश के आहार-शास्त्रियों और अर्थ -विशेषज्ञों ने आकलित किए हैं, उनसे यह सिद्ध होता है कि शाकाहार मांसाहार की तुलना में अधिक सस्ता, गुणकारी, निरापद, रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने वाला और इंसान की प्रकृति के अनुकूल है। मांसाहार करने वालों का एक तर्क यह भी होता है कि मांसाहार शाकाहार की तुलना में अधिक सस्ता है। लेकिन इस तर्क में भी कोई दम नहीं है।
जब हम पशु-वध रोकने के फायदे के बारे में विचार करते हैं तो पता चलता है कि इससे ऐसे अनेक लाभ है जिसे यदि विश्व समाज समझ लें तो विश्व से पशु-वध को सबसे हानिकारक और विध्वंसकारी कार्य
घोषित कर दिया जाएगा। कुछ विशेष बातों पर ध्यान देंकर हम मांसाहार से होने वाली हानियों को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।
भारत के सिर्फ यान्त्रिक कत्लखानों को बंद कर दिया जाए तो लाखों जानवरों का वध ही नहीं रुकेगा बल्कि उसमें इस्तेमाल होने वाला 55 करोड़ लीटर से अधिक पानी की बचत होगी जो कत्लखानों की धुलाई में इस्तेमाल होता है। भारत में आजादी के बाद से दूध देने वाले पशुओं की संख्या कत्लखानों में कटने के कारण बेतहाशा ढंग से कम हुई है। इससे जहां दूधारू पशुओं की संख्या बढ़ेगी वहीं पर दूध की समस्या से भारत को निजात मिलेगी। महज भेड़ों के वध को रोक देने से 600 करोड़़ रुपये का दूध मिलेगा, 450 करोड़ रुपये की खाद, 50 करोड़ रुपये की ऊन प्राप्त होगा। इसी तरह गाय के वध को रोक देने से वर्षभर में जो लाभ होगा वह हैरानी में डालने वाला है। आंकड़े के अनुसार एक गाय के गोबर से सालभर में लगभग 17,000 रुपयों की खाद प्राप्त होगी। रोजाना यान्त्रिक कत्लखानों में 60 हजार गायें कटती हैं जिनके गोबर मात्र से प्रतिवर्ष लगभग एक अरब रुपये की आमदनी हो सकती है। दूध, घी, मक्खन और मूत्र से होने वाले फायदे को जोड़ दिया जाए तो अरबों रुपये की आय केवल गाय के वध रोक देने से देश को हो सकती है।
बूचड़खानों, मांसाहार की प्रवृति को कम करके पर्यावरण प्रदूषण और अन्य कारणों से होने वाले अनगिनत रोगों को कम किया जा सकता है। शाकाहार के हिमायती विचारक पीटर फ्रीमेन के मुताबिक पशुओं द्वारा चरी हुई एक एकड़ भूमि, पांच हजार पाउण्ड अन्न एवं 20 हजार पाउण्ड सब्जी आदि प्रदान कर सकती है। जबकि उस भूमि को चरने वाले जानवरों के मांस से केवल 1 हजार पाउण्ड प्राप्त होता है। मांसाहार दूसरों को भूखा रखने का जिम्मेदार है, क्योकि लाखों जानवर उन लोगों का अन्न खा जाते हैं जो लोग भूखे सोने के लिए मजबूर हो रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि केंद्र और राज्य सरकारें बूचड़खानों को बंद करके देश की जहां खादान्न समस्या का हल निकाल सकती हैं वहीं पर पानी, पर्यावरण, घटते पशुधन, दूध, घी और उर्वरक की समस्या का हल भी निकाल सकते हैं। रोजगार जो करोड़ों लोगों को मिलेगा वह अलग।

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