लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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कुछ लोग देश की अर्थव्यवस्था के संचालन में खेती का प्रमुख योगदान मानते हैं, तो कुछ उद्योगों का। कुछ व्यापार को सर्वाधिक महत्व देते हैं, तो कुछ भ्रष्टाचार को; पर शर्मा जी विवाह को भारतीय अर्थव्यवस्था का इंजन मानते हैं। उनका मत है विवाह के बाद बच्चे होते हैं। उनकी पढ़ाई, लिखाई, दवाई और सुख-सुविधाओं में लाखों रु. खर्च होते हैं। बड़े होने पर उनके लिए घर, काम-धंधे और फिर विवाह का प्रबंध किया जाता है। इससे सैकड़ों लोगों को काम मिलता है। यदि विवाह न हों, तो हमारी अर्थव्यवस्था चैपट हो जाएगी।
आप जानते ही हैं कि हम कई मित्र हर दिन सुबह-शाम ‘आजाद पार्क’ में मिलते हैं। आजाद पार्क उसे इसलिए कहते हैं कि वहां आजादी के समय से ही सभी राष्ट्रीय पर्वों पर तिरंगा झंडा फहराया जाता है। वहां देश और विदेश की हर समस्या पर पूरी गंभीरता से चर्चा होती है। कभी-कभी तो वातावरण मोदी और ओबामा की वार्ता जैसा हो जाता है। आप तो अपने खासमखास हैं, इसलिए बता रहा हूं। आप किसी से कहना भी नहीं कि वहां घरेलू नीति की चर्चा बिल्कुल नहीं होती। क्योंकि वहां हममें से कोई कुछ कर भी नहीं सकता। वह मोर्चा पूरी तरह गृहमंत्रियों के अधीन है।
यों तो हम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों में भी फली नहीं फोड़ सकते; पर हां, बात करने में किसी का क्या घिसता है ? और वही हम करते हैं। इससे कुछ घंटे घर से बाहर ‘आजादी’ के माहौल में कट जाते हैं। धन्य है वह चिरदुखी आत्मा, जिसने इसे ‘आजाद पार्क’ नाम दिया। अब जो लोग घर-गृहस्थी के जंजाल में नहीं फंसे, वे इन गूढ़ बातों को क्या समझेंगे ?
आपने सुना होगा कि कुछ लोगों पर भूत-प्रेत या देवियां आती हैं। शर्मा जी पर भी कभी-कभी चाणक्य और सुकरात की आत्माएं आती हैं। तब वे बहुत ऊंची बातें करने लगते हैं। आज सुबह भी ऐसा ही हुआ। वे बोले कि देश की अर्थव्यवस्था ही नहीं, तो देश की राजनीति का इंजन भी विवाह ही है। हम आश्चर्य में पड़ गये; पर उन्होंने इसकी जो व्याख्या की, उससे हमें उनकी बुद्धि का लोहा मानना पड़ा।
शर्मा जी के मन में राहुल बाबा और उनकी पूज्य मम्मी जी के लिए बहुत आदर है; पर इन दिनों बाबा जिस तरह अपने कुछ खास मित्रों के साथ अज्ञातवास पर हैं, उससे वे परेशान हैं। फिर भी वे पूरी तरह निराश नहीं हैं। उनका कहना है कि कई जगह विवाह से पहले दूल्हा कुछ देर के लिए रूठ जाता है। फिर सबके कहने पर वह विवाह के लिए मान भी जाता है। ऐसा ही यहां हो रहा है।
इससे मुझे अपने गांव की याद आ गयी। वहां तिलक के लिए कन्या पक्ष के लोगों के आने से कुछ देर पहले लड़का रूठकर पास के एक मंदिर में चला जाता है। वह ऐसा प्रदर्शित करता है मानो उसे संसार से विरक्ति हो गयी है और वह संन्यास ले रहा है। फिर परिवार और मोहल्ले की महिलाएं वहां जाकर उसे मनाती हैं। मिठाई खिलाकर नये वस्त्र आदि देती हैं। इससे वह मान जाता है और सब गीत गाते हुए उसे लेकर घर वापस आते हैं।
शर्मा जी का कहना है कि राहुल बाबा के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। वे पार्टी में बड़ी से बड़ी जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं; पर उन्हें वह रूठने और मनाने वाली परम्परा भी तो निभानी है। यह बात दूसरी है कि उन्हें मनाएं या नहीं, इस पर घर में भारी मतभेद हैं। कुछ लोगों का कहना है कि इस रूठने-मनाने के चक्कर में पार्टी चैपट हो रही है; पर अंततः चलेगी तो मम्मी जी की ही। सो वे शीघ्र ही मान जाएंगे और उनका तिलक भी हो जाएगा।
कांग्रेस जहां विवाह से पूर्व की परम्पराओं में व्यस्त है, तो आम आदमी पार्टी (आपा) विवाह के बाद की समस्याओं से ग्रस्त है। विवाह के बाद हनीमून होता है; पर यहां उससे पहले ही तलाक के कागज बन गये हैं। प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, प्रो. आनंद कुमार आदि को केजरी ‘आपा’ ने लात मारकर राजमहल से बाहर कर दिया है। उन्हें चेतावनी दी गयी है कि वे पटरानी बनने की कोशिश न करें। हां, राजाओं के यहां जैसे कई रानियां होती हैं, वैसी ही रानी या उसकी दासी बनकर रहना चाहें, तो उन्हें महल के कोने में जगह मिल सकती है। खाने-कपड़े की उन्हें कोई समस्या नहीं होगी; पर इससे अधिक की आशा वे न करें।
लेकिन प्रशांत भूषण आदि को विवाह के बाद यह चैथे दर्जे की नागरिकता स्वीकार नहीं है। कई समझदार लोगों ने पहले ही कहा था कि ये बेमेल विवाह टिकेगा नहीं; पर वे नहीं माने। दुल्हन और दहेज को केजरी ‘आपा’ ने कब्जा लिया है। फिर भी वे ‘न छोड़ेंगे न तोड़ेंगे’ के गीत गा रहे हैं। किसी ने लिखा है – इब्तिदाए इश्क है रोता है क्या, आगे आगे देखिये होता है क्या ?
ऐसे ही एक बेमेल विवाह के लिए फिर से बैंड वालों को निमन्त्रण मिला है। उन्हें कहा गया है कि ‘बूढ़े भारत में भी आयी फिर से नयी जवानी थी’ की तर्ज पर नये मंगलगान की रचना करें। कई साल से ट्रंक में रखे पुराने शाही कपड़ांे को झाड़कर धूप लगायी जा रही है।  दर्जी उनके पैबंद संवार रहा है। नकली दांत जबड़े में फिट करने की कोशिश हो रही है। बालों में मेंहदी लगाने के लिए नाई आ गया है। यद्यपि वह परेशान है कि जिनके बाल ही उड़ गये हैं, उन्हें क्या लगाये ? मोची की समझ में यह नहीं आ रहा कि जन जूतों में तला ही नहीं है, उन्हें पाॅलिश करने से क्या होगा ?
आप समझ ही गये होंगे। ‘हम मिले तुम मिले, फिर लड़ने के लिए’ के अनुगामी बुढ़ापे में पुनर्विवाह की तैयारी कर रहे हैं। विवाह के लिए दोनों ओर कुछ समानता चाहिए। पंडित जी वर-कन्या की कुंडली मिलाते हैं, तो मध्यस्थ लोग दोनों परिवारों के जाति और गोत्र के साथ ही आर्थिक और सामाजिक स्थिति का ध्यान रखते हैं। विवाह में एक दूल्हा और एक दुल्हन होते हैं; पर यहां परम आदरणीय मुलायम सिंह, लालू यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव, चैटाला, देवेगौड़ा.. आदि कई दूल्हे हैं। सत्ता रूपी कन्या पाने के इच्छुक इन बुजुर्गों में समानता यह है कि ये सब मोदी के सताए और जनता के ठुकराए हुए हैं। बाहर चाहे ये जो कहें; पर अंदर से सब यही चाहते हैं कि घोड़ी पर बस वे अकेले ही बैठें और बाकी भाड़ में जाएं।
पर शर्मा जी के पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं है कि इतने सारे दूल्हों को देखकर यदि घोड़ी ही इन्हें लात मार दे तो.. ?
– विजय कुमार

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