लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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sher-shah-suriतथाकथित ‘न्यायशील’ शेरशाह सूरी का हिंदुओं के प्रति न्याय
राकेश कुमार आर्य
महर्षि दयानंद जी महाराज के जीवन की एक घटना
महर्षि दयानंद जी महाराज के जीवन की एक घटना है। एक बार स्वामीजी सोरों गये तो वहां के लोगों ने स्वामी कैलाश पर्वत को बुला लिया, कि आपका यहां वराह मंदिर होने के उपरांत भी स्वामी दयानंद क्यों आता है? स्वामी जी एक दिन सायंकालीन संध्या में निमग्न थे। आंखें खुलीं तो देखा कि सामने एक संन्यासी खड़ा है। स्वामी जी कुछ कह पाते उससे पूर्व ही संन्यासी बोल पड़े-‘‘कोस्ती? उत्तर मिला-‘‘दयानंद! अहम् दयानंद: अस्ति-मैं दयानंद हूं।’’
तब वात्र्ता आगे बढ़ी। ऋषि दयानंद ने अपने आने का प्रयोजन स्पष्ट करते हुए कहा कि ‘‘महोदय! आपसे एक सहयोग प्राप्त करने यहां आया हूं।’’
कैलाश पर्वत :-‘‘कैसा सहयोग चाहते हैं आप?’’
दयानंद ने कहा कि रामानुज, वल्लभ, निम्बार्क, माध्व इन चार मतों ने सत्यानाश कर रखा है। हम इनका खण्डन करना चाहते हैं, और आपसे सहयोग के अभिलाषी हैं।
कैलाश पर्वत जी ने कहा कि निस्संदेह इन चारों ने बहुत कुछ वेद विरूद्घ कर रखा है। हम आपके साथ हैं, इनका खण्डन भी उचित होगा। पर आप भी हमारा सहयोग प्राप्त करने से पहले दो बातों पर चिंतन करें। एक तो यह कि आप मूत्र्ति पूजा का खण्डन न करें। इससे अनेकों लाभ हैं, मंदिर बनते हैं, इनमें अज्ञानी लोग पूजा करते हैं, सैकड़ों को आजीविका मिलती है। दूसरे यह कि आप पुराणों का खण्डन न करें, उन पर अनर्गल आरोप न लगाया करें।

ऋषि दयानंद ….पर इन चारों मतों की जड़ में तो मूत्र्ति पूजा ही है। जिससे यह भोले-भाले लोगों को लूटते हैं और उन्हें धोखा देते हैं। मेरा मानना है कि इस मूत्र्ति पूजा को पुराण प्रोत्साहित करते हैं, इसलिए उनका खण्डन किया जाना तो और भी अनिवार्य है। संसार को धोखे में रखना उचित नही होगा। मैं आपको भी यही कहूंगा कि जयपुराधीश राजा रामसिंह सहित अपने सभी शिष्यों को भी आप ऐसी ही शिक्षा और प्रेरणा दें। आप राजाओं में सम्मान पाने की चाह के वशीभूत होकर विपरीत मार्ग पर बढ़े चले जाते हो, जिसका आपको भारी पाप लगेगा। एक सिपाही राजकीय वेश में नियम भंग करता है, तो दुगना दण्ड पाता है, पर आप भगवा में रहकर पाप कर रहे हो…एक दिन सब पछताओगे सत्य प्रकाश करने में सहायता करो, अन्यथा आर्यजाति नष्ट हो जाएगी।

इतिहासकारों को शिक्षा
हमने यह दृष्टांत उन इतिहासकारों के लिए प्रस्तुत किया है, जो इतिहास का लेखन करते समय सत्यार्थ के प्रकाश करने से बचते रहे और अपने राजकीय नायकों के संकेत पर इतिहास में असत्य, अतार्किक और मिथ्या बातों का उल्लेख करते रहे या इतिहास को इतना तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करते रहे कि वह अपनी गरिमा ही खो बैठा। उनकी करनी का फल आज देश भोग रहा है और उनकी आत्मा इस ‘पाप’ के लिए उन्हें धिक्कार रही है।

शेरशाह सूरी का सत्य?
शेरशाह के विषय में अब्बास खां लिखता है-‘‘वह सदा उत्पीडि़त और न्याय मांगने वाले वादी के बारे में वास्तविक सच क्या है, पहले इसकी समीक्षा कर लेता था, उसने कभी उत्पीडक़ों या अत्याचारियों का पक्ष नही लिया चाहे वे उसके निकट संबंधी हों या कि उसके लाडले बेटे, चाहे वे प्रतिष्ठित अमीर हों, या उसके अपने परिवार के लोग हों, उसने उत्पीडक़ को सजा देने में न तो देरी की और न ही किसी प्रकार की दयालुता का प्रदर्शन किया।’’

 

अब्बास शेरशाह को न्यायप्रिय दिखाने के लिए सारी सीमाएं तोड़ देता है। कहता है-‘‘एक जराक्षीण मृत्यु मुख में पहुंचने ही वाली वृद्घा अपने सिर पर स्वर्णाभूषणों से भरा टोकरा रखे यात्रा पर निकली, तब भी किसी चोर या लुटेरे का यह साहस नही हुआ कि वह उस बुढिय़ा के पास फटक भी जाए। क्योंकि उन्हें ज्ञात है कि इसके लिए शेरशाह कितना बड़ा दण्ड देता है।’’

एक नही अनेकों इतिहासकारों ने शेरशाह को एक महान भवन निर्माता और राजपथ (जी.टी. रोड जैसी हजारों कि.मी. लंबी सडक़ के निर्माण का श्रेय देकर) निर्माता माना है। आज जबकि विज्ञान और तकनीकी ने पर्याप्त उन्नति कर ली है तो इस समय भी इतनी बड़ी सडक़ का निर्माण पांच वर्ष के काल में असंभव है। पर बिना किसी तर्क पर ध्यान दिये बस असत्य का महिमामण्डन हमारे तथाकथित इतिहासकार किये जाते हैं। कौन पछताएगा इनके पापों के लिए?

राजा पूरनमल की वीरता का रोचक वर्णन
हमने पिछले आलेख में रायसीन (रायसेन) के राजा पूरनमल का उल्लेख किया था। इस घटना पर प्रकाश डालते हुए पी.एन. ओक महोदय ने बड़ा ही सुंदर, रोचक और रोमांचकारी वर्णन किया है। वह अपनी पुस्तक ‘भारत में मुस्लिम सुल्तान’ भाग-2 के पृष्ठ 81, 82 पर लिखते हैं-‘‘शेरशाह बहुत दिनों से रायसेन के हिंदू सम्राट पूरनमल की सुग्रहणी रत्नावली का सतीत्व भ्रष्ट करना चाहता था। अत: शेरशाह ने (अपने इस प्रयोजन की सिद्घि के लिए) रायसेन को घेर लिया। पूरनमल की वीर हिंदू सेना ने उन घेराव करने वाले अफगान लुटेरों को इस (इतनी) सफलतापूर्वक काट डाला कि वे उनसे बहुत भयभीत हो गये। दुर्ग पर अधिकार करने तथा हिंदू दुर्ग रक्षकों को पराजित न कर सकने पर शेरशाह ने वही पुरानी म्लेच्छ युक्तियां अपनायीं-हिंदू जनता को कष्ट देना, उनकी स्त्रियों के साथ बलात्कार करना उनकी फसल तथा घरों को जला देना एवं उनके बच्चों को बहुत कष्ट देना।’’

यह था शेरशाह का न्याय
यह था शेरशाह का न्याय, संग्राम तो हो राजा से और जब राजा की सेना शेरशाह की सेना को ही काट डाले, तो राजा की सेना के आत्मरक्षार्थ किये गये इस वीरकृत्य से झुंझलाकर शेरशाह हिंदुओं के साथ ऐसे-ऐसे अत्याचार करे कि लेखनी उन्हें लिख भी नही सकती। इन रोंगटे खड़े कर देने वाले अत्याचारों से द्रवित हो पूरनमल ने दुर्ग खाली कर देने का वचन दिया। इस शर्त पर कि उसके परिवार तथा दुर्ग रक्षकों को सुरक्षापूर्वक चले जाने दिया जाएगा। शेरशाह ने अपने भृत्य कुतुब खां को आदेश दिया कि वह पूरनमल के परिवार एवं कोष को बिना छुए चले जाने देने के लिए कुरान की सौगंध खा ले। तब उन्हें एक विशेष शिविर में ठहरा दिया गया। पर इन म्लेच्छों से मिलने वाले स्वाभाविक विश्वासघात के अनुसार-‘‘रात्रि में इंसा खां हबीब को आदेश दिया गया कि वह निश्चित स्थान पर हाथियों सहित अपनी सेना तैयार करे। हसीब खां को उसने चुपके से आदेश दिया कि वह पूरनमल पर निगाह रखे कि वह भागने न पाए, और किसी भी व्यक्ति से इस विषय में बात न करें।’’ (इलियट एण्ड डाउसन, भाग-4 पृष्ठ 402)

पूरनमल ने यह जानकर कि सदा की भांति मुसलमानों ने कुरान की शपथ ताक पर रखकर लोगों की हत्या करने और हिंदू स्त्रियों को भ्रष्ट करने की ठान ली है-अपनी प्राणप्रिय पत्नी रत्नावली के शिविर में जाकर (रत्नावली हिंदू भजनों को बड़े माधुर्य के साथ गाया करती थी) उसका सिर काट दिया। तब (उसने अपने अनुयायियों के समक्ष दृष्टांत उपस्थित करने के लिए) बाहर आकर अपने साथियों से कहा-‘‘मैंने रत्नावली का वध कर दिया है, क्या आप भी अपनी पत्नियों एवं पारिवारिक सदस्यों को समाप्त करने में ऐसी ही तत्परता दिखाएंगे?….पूरनमल एवं उसके साथी महान वीरता एवं शौर्य प्रदर्शित कर सबके सब मारे गये। उनकी कुछ बची हुई पत्नियों एवं पारिवारिक सदस्यों को पकड़ लिया गया। पूरनमल की एक कन्या एवं उसके अग्रज के तीन पुत्र जीवित पकड़ लिये गये। शेष को मार डाला गया। शेरशाह ने पूरनमल की कन्या को कुछ घुमक्कड़ (यवन) भाटों को दे दिया, ताकि वे उसे बाजार में नचायें, तथा बच्चों को नपुंसक कर दिया। जिससे कि उनकी वंश वृद्घि न होने पाये।’’
(अब्बास खां की ‘तारीखे शेरशाही’ पृष्ठ 402, 403 भाग-4 इलियट एण्ड डाउसन)

इस उद्घरण में किन किन लोगों की वीरता दृष्टिगोचर हो रही है?
इस प्रश्न पर विचार करें तो राजा पूरनमल की वीरतापूर्ण देशभक्ति का शौर्य सर्वोपरि है। जिसमें स्वदेश के सम्मान और स्वसंस्कृति की रक्षार्थ अपनी प्राणप्रिय पत्नी का निज हाथों बलिदान किया और उसके पश्चात स्वयं अपने साथियों के साथ देश के लिए बलिदान हो गया।

इसके पश्चात रानी रत्नावली का शौर्य है। वह युद्घ में तो नही गयी, परंतु अपने कुल के सम्मान तथा देश की गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा की रक्षार्थ अपना बलिदान अपने पति के हाथों से कराना स्वीकार कर लिया।

तत्पश्चात राजा की सेना और सेनानायकों का बलिदान है….और अंत में राजा की पुत्री तथा पुत्रों का बलिदान भी कम नही है, जिन्होंने आजीवन कष्ट सहना तो स्वीकार किया पर निज धर्म को तिलांजलि नही दी। ऐसे महान व्यक्तित्वों के कारण ही भारत राष्ट्र की ऐतिहासिक परंपरा की सरिता आगे बढ़ी है।

तनिक कल्पना करें
पाठक वृंद! तनिक कल्पना करें कि जब शेरशाह को रत्नावली की सिरकटी लाश ही देखने को मिली होगी तो उसके हृदय में कितनी आग लगी होगी? हिंदू की वीरता और शौर्य का साक्षात उदाहरण बने राजा पूरनमल उनकी रानी एवं हजारों वीर सैनिकों के शव उसके लिए कितनी ईष्र्या एवं घृणा के पात्र बन गये होंगे?

शेरशाह सूरी हमारे वीर और शौर्य संपन्न योद्घाओं और वीरांगनाओं के लिए यही कहता होगा-‘कमबख्तो! मर गये पर मेरे दिल की हसरत को यूं ही कुचल गये….’ ऐसा कुछ कहकर वह सिर पटककर चुप रह गया होगा। इस तथ्य को इतिहास से मिटाया जा सकता है, पर एक मनोवैज्ञानिक के मनोवैज्ञानिक निष्कर्षों को नही मिटाया जा सकता।

न्यायशील शेरशाह का हिंदुओं के प्रति न्याय
राजा मालदेव के प्रति शेरशाह कितना दुराग्रही था अब हम इसका उल्लेख करेंगे। पाठकों को स्मरण होगा कि राजा मालदेव जोधपुर का शासक था। जिसके साथ हुए युद्घ का हम पूर्व पृष्ठों पर भी उल्लेख कर चुके हैं। शेरशाह इस वीर हिंदू शासक को मिटा देना चाहता था। इसलिए उसने अपने एक दरबारी के उस परामर्श को अमान्य करते हुए जिसमें उससे दक्षिण पर आक्रमण करने का आग्रह किया गया था, कहा था-‘‘तुमने सर्वथा उचित परामर्श दिया है। किंतु मेरे विचार में यह आया है कि सुल्तान इब्राहीम (लोदी) के समय से इन मूर्ति पूजकों ने इस्लाम के देश (हिंदुस्थान) को काफिरों से भर दिया है, तथा मस्जिदों और हमारी इमारतों को ढहा कर उनमें मूर्तियां रख दीं हैं तथा दिल्ली एवं मालवा पर अधिकार कर लिया है।’’

यहां पर वही तथ्य स्पष्ट हो रहा है कि हिंदू मुस्लिम विजयों को साथ के साथ समाप्त करने के लिए सचेष्ट रहते थे, एक ओर मुस्लिम सेना विजयी होकर निकलती थी और दूसरी ओर से हिंदू सेना ऐसे विजित क्षेत्रों पर यथाशीघ्र अपना अधिकार कर लेती थी। इतना ही नही हिंदू अपने उन मंदिरों या भवनों को पुन: नियंत्रण में लेने का भी प्रयास करते थे, जिन्हें मुस्लिमों के द्वारा बलात् ढहा दिया जाता था। यहां पर जिन स्थलों या भवनों को ‘हमारी इमारतें’ कहकर शेरशाह आत्मप्रशंसा कर आत्मप्रवंचना से ग्रसित दिख रहा है, वहां उन्हीं मंदिरों तथा भवनों की ओर संकेत है, जो उसके द्वारा बलात् हड़पे जा रहे थे।

राजा मालदेव महत्वपूर्ण था शेरशाह के लिए
शेरशाह ने अपनी बात निरंतर जारी रखते हुए कहा-‘‘इन काफिरों से जब तक मैं देश को साफ नही कर देता, मैं अन्य किसी ओर नही जाऊंगा, सर्वप्रथम मैं इस पतित मालदेव को निर्मूल करूंगा।’’
(अब्बास की ‘तारीखे शेरशाही’ पृष्ठ 403, 404 भाग-4 इलियट एण्ड डाउसन)

शेरशाह के इस कथन पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। वह पहले मालदेव को समाप्त करना चाहता है और तब दक्षिण जाना उचित समझता है। अभिप्राय है कि उसे ज्ञात है कि यदि तू दक्षिण में जा फंसा तो उत्तर का मालदेव सारा खेल बिगाड़ सकता है। इसलिए वह पहले उत्तर से निश्चिंत हो जाना उचित मानता है।

शेरशाह के लिए मालदेव की चुनौती
दक्षिण में मुस्लिम राज्य का विस्तार न होने का एक कारण ये भी था कि दिल्ली या आगरा के उत्तर भारतीय सुल्तानों या बादशाहों के लिए उत्तर में सदा ही किसी न किसी मालदेव ने चुनौती बने रहने का काम किया। शेरशाह के लिए मालदेव एक चुनौती बना और उसने शेरशाह की बहुत सारी शक्ति का अपव्यय यूं ही करा दिया। यदि मालदेव उसके लिए एक चुनौती ना होता तो शेरशाह की ऊर्जा ‘दक्षिणी भारत’ में ‘बम’ गिराती। इस प्रकार ‘उत्तर के मालदेवों’ ने दक्षिण को विभिन्न समयों पर सुल्तानी या बादशाही ‘बमों की वर्षा’ से बचाकर भी एक प्रकार की देशभक्ति का ही परिचय दिया था। इस तथ्य को जितना ही हम स्थापित करेंगे, उतने ही अनुपात में ‘उत्तर के मालदेवों’ के प्रति हृदय में श्रद्घा बढ़ती जाएगी।

फतेहपुर सीकरी के जयचंदेल तथा गोहा हिंदूवीर
उत्तर में जिस समय 1543-44 ई. में शेरशाह ने फतेहपुर सीकरी पर आक्रमण किया, उस समय इस क्षेत्र को यवन आक्रमण से बचाने के लिए जयचंदेल और गोहा नामक दो हिंदू वीर सामने आये। इनके पराक्रमी स्वभाव और शौर्यपूर्ण कार्यों की चर्चा दूर-दूर तक थी। शेरशाह हुमायूं को भारत से बाहर करने के पश्चात हिंदू राजाओं और हिंदू राज्यों को ही अपने अधीन करने की नीति पर चल रहा था। इसलिए उसको अपने संक्षिप्त से पांच वर्षीय शासन काल में ही हिंदुओं के व्यापक प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था। अपनी इसी योजना के अंतर्गत शेरशाह ने फतेहपुर सीकरी पर आक्रमण कर दिया।

हिंदुओं की और शेरशाह सूरी की सेनाएं
इस आक्रमण के समय शेरशाह के सैनिकों की संख्या तीन लाख से अधिक बतायी जाती है, जबकि हिंदुओं की सेना उसकी अपेक्षा अत्यल्प थी।
वीर जयचंदेल और गोहा ने अपनी अत्यल्प सेना और शत्रु के विशाल सैन्य बल की ओर तनिक भी ध्यान नही दिया, और उन्होंने शत्रु सेना से भिडऩे का संकल्प ले लिया। आंधियों में दीप जलाने का जिसका स्वभाव हो और हवाओं की दिशा परिवर्तित कर देना जिसका राष्ट्रीय चरित्र हो, उस हिंदू जाति के इन दोनों शेरों ने शेरशाह की विशाल सेना को काटना आरंभ कर दिया। शेरशाह की सेना में त्राहिमाम मच गयी, एक अफगान सैनिक ने तो शेरशाह के निकट आकर उसे भागने के लिए संकेत करते हुए, कह दिया था-‘‘चलिए, काफिर (उसका संकेत हिंदुओं के वीर सैन्य बल की ओर था) तुम्हारी सेना को समाप्त किये दे रहे हैं।’’

शेरशाह को अपने सैनिकों के नरसंहार को होते देखकर पसीना आ गया था। पर वह लड़ता रहा, भागना भी तो संभव नही था। संयोगवशात् ऐसी परिस्थितियां बनीं कि जयचंदेल और गोहा दोनों को ही मुस्लिम सेना ने घेर लिया। जिससे उखड़ी हुई अफगान सेना के पैर जम गये।

घेर लिये गये हिंदू वीर
हमारे सैनिकों ने शौर्य और पराक्रम दिखाने में तो कोई कमी नही दिखाई परंतु उनका युद्घ करने का ढंग और कुछ सामयिक परिस्थितियां ऐसी थीं कि जयचंदेल और गोहा दोनों को ही घेर लिया गया। इसका एक कारण यह भी था कि हिंदू सेना कई बार अचानक किये गये किसी आक्रमण के फलस्वरूप एकत्र कर तैयार की जाती थी उनमें से अधिकांश सैनिक अत्यंत पराक्रमी और साहसी होते थे, परंतु उन्हें युद्घ संचालन और युद्घ के क्षेत्र का कोई अनुभव नही होता था। कई बार अवैतनिक होकर भी हिंदू जनता ने सैनिक बनकर देश के लिए युद्घ किया। ऐसे उदाहरण विश्व इतिहास में दुर्लभ हैं।

वीर जयचंदेल और गोहा का बलिदान
वीर जयचंदेल और गोहा को अफगान सैनिकों ने घेरकर मार लिया। दोनों वीरों ने वीरगति प्राप्त की। फतेहपुर सीकरी के विषय में हमें जितना यह बताया जाता है कि इसका निर्माण अकबर ने कराया था इस मिथ्या धारणा की, अपेक्षा वीर जयचंदेल और गोहा के विषय में हमें कुछ नही बताया जाता।

जयचंदेल और गोहा का यद्यपि वध कर दिया गया था, परंतु इसके उपरांत भी शेरशाह भयभीत था। उसे चिंता थी कि यदि वह नही रहता तो उसके द्वारा स्थापित राज्य की दशा और दिशा क्या होती? उसको स्पष्टत: ज्ञात हो गया था कि जयचंदेल और गोहा किस माटी के बने थे और जिस माटी (भारतमाता) के वह लाल थे उसका कण-कण अपने पुत्रों के साहस और पराक्रम को देखकर अपने भाग्य पर इठला रहा था।
क्रमश:

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